छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोक कलाकार और पद्म विभूषण पुरस्कार विजेती तीजन बाई का निधन हो गया है। उन्होंने 72 वर्ष की उम्र में रायपुर के AIIMS अस्पताल में अंतिम सांस ली। तीजन बाई लंबे समय से बीमार चल रही थीं। रविवार सुबह करीब 3 बजे उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें दुनिया को अलविदा कह दिया।
तीजन बाई का निधन, कला, संगीत और साहित्य की दुनिया की बड़ी क्षति है। उन्होंने दुनिया के अलग-अलग देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उनके लोकगीत लोगों को खूब लुभाते थे। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी
ने भी उनके निधन पर शोक जाहिर कहा है और कहा है कि पंडवानी शैली को उन्होंने अलग पहचान दिलाई।
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विष्णु देव साय, मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़:-
'तीजन बाई पद्म विभूषण और पद्म श्री से सम्मानित थीं। उन्होंने पूरे देश और दुनिया में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को गौरवान्वित किया। हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।'
कौन थीं तीजन बाई?
तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में हुआ था। मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया। उन्होंने महाभारत की कहानियों को गाकर सुनाने वाली लोक कला 'पंडवानी' को नई पहचान दी। परंपरा के अनुसार महिलाएं बैठकर पंडवानी गाती थीं, लेकिन तीजन बाई ने इस नियम को तोड़ते हुए खड़े होकर 'कपालिका' शैली में प्रदर्शन करने वाली पहली महिला बनीं।
पद्म श्री से पद्म विभूषण तक का सफर कैसा था?
पचास साल से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस लोक कला को भारत के साथ-साथ एशिया, यूरोप और दुनिया के कई देशों तक पहुंचाया। उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार जैसे सम्मान मिल चुके थे। तीजन बाई ने अपनी कला से कई नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रेरणा दी।
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क्या है पंडवानी?
पंडवानी का अर्थ पांडव वाणी है। पांडवों की कथा। यह छत्तीसगढ़ की पारंपरिक नाट्यशैली है। इसके मुख्य कलाकार को रागी कहते हैं। हाथ में तंबोरा लेकर महाभारत के प्रसंगों को नाचकर और अभिनय करके सुनाया जाता है। यह अनोखी गायनशैली है। तबला, ढोलक, और मंजीरे इसके मुख्य वाद्ययंत्र हैं। तंबोरा का इस्तेमाल को गदा, धनुष और हथियार की तरह अभिनय में पेश करते हैं।
तीजन बाई ने इसमें क्या बदला था?
पंडवानी शैली की सबसे लोकप्रिय विधा वेदमती शैली है, जिसमें कलाकार बैठकर संगीतमय कथा कहता है। तीजन बाई प्रयोगधर्मी थीं। उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में खड़े होकर, जोश के साथ उछल-कूद मचाते हुए प्रयोग किया। उन्होंने जीवंत अभिनय से कापालिक शैली को फिर से जीवित कर दिया।
तीजन बाई ने इसे कैसे दी नई पहचान?
कापालिक शैली में पुरुषों का वर्चस्व था। तीजन बाई ने इसे तोड़ा। उन्होंने मंचों पर वीर रस के साथ इसे पढ़ा। इसे महिलाओं के लिए वर्जित कहा जाता रहा, उन्होंने 13 साल की उम्र में ही अपनी कला पहचान ली। उन्होंने यूरोप और एशिया के कई देशों में अपनी प्रस्तुति दी। उनकी कला को लोग मंत्रमुग्ध होकर देखते रह जाते। उनके निधन पर देशभर के कला प्रेमियों में शोक की लहर है।