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टैरिफ का जवाब मेटल से! चीन का वह फैसला जिसने बढ़ाई ट्रंप की परेशानी?

चीन ने अब एक ऐसी चाल चली है जिससे अमेरिका की परेशानी बढ़ सकती है। चीन ने रेयर अर्थ मेटल्स के एक्सपोर्ट पर सख्ती कर दी है। इन मेटल से बड़े-बड़े हथियारों से लेकर चिप और सेमीकंडक्टर बनाए जाते हैं।

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डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग। (AI Generated Image)

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अमेरिका के साथ चल रहे ट्रेड वॉर के बीच चीन ने एक बड़ा फैसला लिया है। अमेरिका ने 245% टैरिफ लगाया तो 'जैसे को तैसा' जवाब देते हुए चीन ने रेयर अर्थ मेटल्स के एक्सपोर्ट को लेकर सख्ती कर दी है। यह रेयर अर्थ मेटल्स वह हैं, जिनसे मोबाइल से लेकर मिसाइल तक बनाई जाती हैं।


1990 के दशक से ही इन रेयर अर्थ मेटल्स के क्षेत्र में चीन का दबदबा है। दुनियाभर में रेयर मेटल की 85 से 95 फीसदी मांग चीन ही पूरी करता है। अब बताया जा रहा है कि चीन से होने वाले इन मेटल्स का एक्सपोर्ट को रोक दिया है।

 

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चीन ने किया क्या है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप महीनेभर से चीन पर टैरिफ पर टैरिफ लगाए जा रहे हैं। बदले में चीन भी अमेरिका पर टैरिफ बढ़ाता जा रहा है। अब अमेरिका ने चीन के इम्पोर्ट पर 245% और चीन ने अमेरिका के इम्पोर्ट पर 125% टैरिफ लगा दिया है। मगर अब चीन ने इस ट्रेड वॉर में टैरिफ नहीं, बल्कि 'मेटल' को हथियार बना लिया है।


दरअसल, चीन ने 7 रेयर अर्थ मेटल को एक्सपोर्ट करने के लिए लाइसेंसी सिस्टम बना दिया है। इसका मतलब हुआ कि इन मेटल को अब चीन से बाहर भेजना है तो उसके लिए एक्सपोर्ट लाइसेंस लेना होगा। चीन ने 4 अप्रैल से यह नया सिस्टम शुरू कर दिया है।


चीन ने अभी जिन 7 रेयर अर्थ मेटल्स के एक्सपोर्ट के लिए लाइसेंस जरूरी किया है, उनमें- सैमेरियम, गैडोलिनियम, टर्बियम, डिस्प्रोसियम, ल्यूटेशियम, स्कैंडियम और यट्रियम शामिल हैं। यह वह मेटल हैं, जिनसे बड़े-बड़े हथियार बनाए जाते हैं। चीन ने ऐसा इसलिए किया है, क्योंकि उसने परमाणु हथियारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि पर दस्तखत किए हैं, जो उसे इन मेटल के 'दोहरे उपयोग' पर रोक लगाने का अधिकार देता है।

 

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मगर यह रेयर अर्थ मेटल हैं क्या?

रेयर अर्थ मेटल्स असल में वह 17 दुर्लभ खनिज होते हैं, जो जमीन के नीचे होते हैं। इनका प्रोडक्शन करना और प्रोसेस करना काफी मुश्किल और महंगा होता है। 


इनमें 17 खनिज- सीरियम, डिस्प्रोसियम, एर्बियम, यूरोपियम, गैडोलिनियम, होल्मियम, लैंथनम, ल्यूटेटियम, नियोडिमियम, प्रेसियोडियम, प्रोमेथियम, सैमेरियम, स्कैंडियम, टेरबियम, थूलियम, यटरबियम और यट्रियम हैं। यह चांदी के रंग के होते हैं। 


इन्हें 'रेयर' या 'दुर्लभ' इसलिए नहीं कहा जाता है, क्योंकि इनका भंडार बहुत कम है, बल्कि इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन्हें जमीन से निकालना न सिर्फ महंगा होता है, बल्कि प्रोसेस करना भी बहुत मुश्किल होता है। इन 17 खनिजों में से बहुत से ऐसे हैं, जो धरती पर बहुत सारी मात्रा में मौजूद हैं। हालांकि, इनमें चीन सबसे बड़ा खिलाड़ी है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, दुनियाभर में इन रेयर अर्थ मेटल्स का 61% प्रोडक्शन और 92% प्रोसेसिंग चीन में ही होती है। इसका मतलब हुआ कि इन रेयर अर्थ मेटल्स की सप्लाई चेन पर चीन का कंट्रोल है।

 

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अमेरिका पर क्या होगा इसका असर?

इन 17 रेयर अर्थ मेटल्स से चिप, सेमीकंडक्टर और बड़े-बड़े हथियार बनाने के लिए किया जाता है। इन रेयर अर्थ मेटल्स की प्रोसेसिंग में चीन माहिर है। चीन को यह बात पता है, इसलिए उसने इनके एक्सपोर्ट पर सख्ती कर दी है। 


यह अमेरिका के लिए बड़ा झटका है। वह इसलिए, क्योंकि अमेरिकी सरकार के आंकड़े बताते हैं कि 2020 से 2023 के बीच अमेरिका की रेयर अर्थ मेटल्स की 70% जरूरतें चीन ने ही पूरी की थी। यह रेयर अर्थ मेटल मिसाइल, रडार और मैग्नेट बनाने के लिए जरूरी होते हैं।


सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के मुताबिक, अमेरिका में बनने वाले F-35 लड़ाकू विमान, मिसाइलें और प्रिडेटर UAV के लिए यह अर्थ मेटल काफी अहम हैं। CSIS का कहना है कि यह फैसला ऐसे समय लिया गया है, जब चीन तेजी से अपने हथियारों का जखीरा बढ़ाता जा रहा है। अमेरिका की तुलना में चीन में हथियार और गोला-बारूद का उत्पादन 5-6 गुना ज्यादा तेजी से हो रहा है। 


सिर्फ डिफेंस ही नहीं, बल्कि चीन के इस फैसले से अमेरिका के मैनुफैक्चरिंग सेक्टर पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। टेस्ला जैसी ऑटो कंपनियों को अपनी चिप और मैग्नेट बनाने के लिए इन अर्थ मेटल्स की जरूरत होती है। इसके अलावा NVIDIA जैसी अमेरिकी कंपनियों को भी सेमीकंडक्टर और चिप बनाने के लिए यह मेटल्स चाहिए होते हैं। 


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