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ईरान इफेक्ट: हर साल लाखों की जान लेने वाले ईंधन की तरफ क्यों लौट रही दुनिया?

कोयले की वजह से हर साल लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। दुनियाभर में प्रदूषण का स्तर बढ़ता है। मगर ईरान युद्ध ने दुनिया को एक बार फिर कोयले की तरफ लौटने पर मजबूर कर दिया है।

Iran War News

प्रतीकात्मक फोटो। (AI Generated Image)

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ईरान युद्ध के कारण दुनिया को अब दोबारा कोयले की तरफ लौटना पड़ रहा है। जर्मनी ने कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों को शुरू करने का संकेत दिया है। गंभीर ईंधन संकट के बाद एशिया के कई देश कोयले पर अपनी निर्भरता बढ़ाने लगे हैं। होर्मुज की खाड़ी बंद होने से न केवल एशियाई देशों बल्कि पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट खड़ा हो गया है। कई देशों ने अपने यहां राशनिंग सिस्टम लागू किया है। कुछ जगहों पर अतिरिक्त छुट्टी का ऐलान किया गया है। कई देशों ने अपने नागरिकों को घरों पर ही रहने की सलाह दी।

 

तमाम संकटों के बीच दुनिया को कोयले में उम्मीद की किरण दिख रही है। अब तमाम देश एक बार फिर इस तरफ लौट रहे हैं। मगर वर्षों से जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के खिलाफ चल रही मुहिम को इससे बड़ा झटका लगेगा।

 

तेल संकट के बीच वियतनाम, थाईलैंड और फिलीपींस कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से उत्पादन बढ़ा रहे हैं। भारत में भी कोयले का उपयोग बढ़ाया गया है। इंडोनेशिया अपने घरेलू स्तर पर उत्पादित कोयले का सहारा ले रहा है। दुनिया में सबसे अधिक कोयले का निर्यात इंडोनेशिया ही करता है। वहां की सरकार ने घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देने का ऐलान किया है। ऐसे में इंडोनेशियाई कोयले पर निर्भर देशों को दोहरी मार पड़ सकती है। एक तरफ जहां उन्हें तेल नहीं मिल रहा है तो दूसरी तरफ इंडोनेशिया से कोयले की आपूर्ति भी बाधित हो सकती है।

 

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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वियतनाम ने कोयला आयात बढ़ा दिया है। मगर इंडोनेशिया से उतना कोयला नहीं मिल पा रहा है, जितनी उसकी जरूरत है। अब अमेरिका और लाओस से कोयला खरीदने का प्लान है। उधर, दक्षिण कोरिया ने कोयले से बिजली बनाने पर लगी रोक को हटा लिया है। जापान ने भी कोयले से बिजली का उत्पादन शुरू कर दिया है।

 

थाईलैंड ने कोयला आधारित दो बिजली संयंत्रों को दोबारा चालू करने का फैसला किया है। एलएनजी और तेल की कमी के कारण भीषण गर्मी में पाकिस्तान भी कोयले से अधिक बिजली बनाने पर विचार कर रहा है। इटली चरणबद्ध तरीके से कोयले से चलने वाले प्लांट को बंद करने की समय सीमा बढ़ाकर 2038 कर दी है। वहीं जर्मनी कोयले से बिजली बनाने की तैयारी में है। दुनियाभर में बढ़ती कोयले की मांग के कारण न्यूकैसल कोयले की कीमत में करीब 13 फीसद का इजाफा हुआ है। मौजूदा समय में इसकी कीमत 134 डॉलर प्रति टन के आसपास है।

एलएनजी पर निर्भरता पड़ी भारी?

दुनियाभर के देशों ने पर्यावरण प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के उद्देश्य से कोयले से दूरी बनाई। उसकी जगह द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) का इस्तेमाल बढ़ाया। करीब 25 फीसद एलएनजी की शिपमेंट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होती है। युद्ध से एक दिन पहले यानी 27 फरवरी को यहां से कुल 147 जहाज गुजरे। 28 फरवरी को यह संख्या घटकर 80 रह गई। मौजूदा समय में सिर्फ चार-पांच जहाज ही गुजर पा रहे हैं। अब एलएनजी की कमी से निपटने की खातिर दुनियाभर के देश कोयले की तरफ लौट रहे हैं।

कोयला कौन सा नया संकट लाएगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान युद्ध खत्म नहीं हुआ और ऊर्जा संकट जारी रहा तो दुनियाभर में कोयले का इस्तेमाल चरम पर पहुंच सकता है। नतीजा यह होगा कि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के खिलाफ जंग विफल साबित होगी। वर्षों से दुनिया धरती का तापमान समयोजित करने की कोशिश में जुटी है। कोयले के अधिक इस्तेमाल से धरती को गर्म करने वाली गैसों में इजाफा होगा। बड़े शहरों में धुंध और प्रदूषण बढ़ेगा। 

दुनिया से चालक कैसे निकला चीन?

भारत में भीषण गर्मी में 270 गीगावाट बिजली की मांग होती है। मौजूदा समय में देश के पास तीन महीने का पर्याप्त कोयला भंडार है। चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोयले का उपभोक्ता है। चीन 2021 से ही रिकॉर्ड स्तर पर कोयले से बिजली बना रहा है। ऊर्जा संकट के बाद इसके इस्तेमाल में और इजाफा होने की उम्मीद है।

 

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कितना घातक है कोयला?

कोयला दुनिया का सबसे प्रदूषित जीवाश्म है। क्लाइमेट काउंसिल के मुताबिक कोयला ग्रीनहाउस गैस प्रदूषण बढ़ाता है। इसके जलाने से हवा, पानी और जमीन में जहरीले व कैंसरकारी पदार्थ जम जाते हैं। इससे बच्चों में अस्थमा, हृदय और फेफड़ा से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं। 2013 में चीन में कोयले के कारण 366,000 मौतें हुईं। भारत में सालाना करीब 169,000 लोगों की जान जाती है। 2020 में वैश्विक स्तर में वायु प्रदूषण के कारण 42 लाख लोगों की मौत हुई। इनमें से 80 फीसद जानें मानव के पैदा किए प्रदूषण ने लीं। 


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