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खाड़ी देशों की वो कमजोरी, जिस पर हमला कर सकता है ईरान

तमाम हमलों के बावजूद खाड़ी देश ईरान को जवाब देने से बच रहे हैं। इसकी पीछे उनकी एक बड़ी रणनीतिक कमजोरी हो सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या ईरान इस कमजोरी पर हमला करेगा।

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अमेरिका-इजरायल और ईरान जंग। ( Photo Credit: PTI)

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ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनई ने अपने पहले संदेश में खाड़ी देशों को बड़ी धमकी दी है। इसमें खाड़ी देशों को अपने यहां अमेरिकी सैन्य बेस बंद करने की सलाह दी और कहा कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो उन पर हमला जारी रहेगा।

 

अपने संदेश में मोजतबा ने अमेरिका और उसके खाड़ी सहयोगियों के खिलाफ नया मोर्चा खोलने की भी चेतावनी दी। यह वह मोर्चा होगा, जहां दुश्मन कमजोर होगा। जहां उसकी सुरक्षा खतरे में होगी। उस क्षेत्र को ईरान आने वाले समय में अपना निशाना बना सकता है।

 

मोजतबा ने कहा कि ईरानी अधिकारी युद्ध को उन अन्य मोर्चों तक ले जाने की संभावना पर विचार करने में जुटे हैं, जहां दुश्मन कमजोर स्थिति में है। दुश्मन के कम अनुभव और असुरक्षित मोर्चों का अध्ययन किया गया है। अगर युद्ध चलता रहता है तो इन मोर्चों को सक्रिय किया जाएगा।

 

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ईरान का पहला हथियार

मोजतबा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने के पक्ष में हैं। इसे रणनीति के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं, ताकि अमेरिका पर अधिक दबाव बनाया जा सके। दरअसल, कुवैत, कतर, बहरीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान समेत खाड़ी के देशों का अधिकांश समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होता है। स्ट्रेट के बंद होने निर्यात को भारी झटका लगा है। ड्रोन और मिसाइल हमलों के कारण हवाई यातायात भी बाधित है। दुनियाभर में ऊर्जा संकट खड़ा हो गया है। खाड़ी देशों के अलावा अन्य देश भी अमेरिका पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। यही कारण है कि अमेरिका ने रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी है, ताकि वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखा जा सके।

खाड़ी देशों की सबसे बड़ी कमजोरी 

ईरान के हमले के कारण कतर समेत कई खाड़ी देशों ने गैस उत्पादन करना बंद कर दिया है। इससे जहां एक ओर इन देशों की अर्थव्यवस्था को झटका, वहीं दुनियाभर के अन्य देशों में एलपीजी संकट खड़ा हो गया है। ऊर्जा के बाद अब खाड़ी देशों के भोजन और पानी पर ईरान की नजर है। अगर ईरान ने इस पर हमला किया तो पूरे खाड़ी इलाके में हड़कंप मचना तय है। इसका संकेत ईरान ने बहरीन में स्थित एक वाटर डिसेलिनेशन प्लांट पर हमला करके दे दिया है। 

 

मौजूदा समय में फारस की खाड़ी के तट पर 400 से अधिक वाटर डिसेलिनेशन प्लांट हैं। इन प्लांटों को खाड़ी देशों की लाइफलाइन कहा जाता है। अभी तक ईरान ने इन पर हमला नहीं किया है। मगर युद्ध अधिक दिनों तक चला तो ईरान रणनीतिक तौर पर यहां भी हमला कर सकता है, ताकि खाड़ी देशों के जरिये अमेरिका पर दबाव बनाया जा सके।

 

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वाटर डिसेलिनेशन प्लांट पर कौन कितना निर्भर?

60 और 70 के दशक में खाड़ी देशों ने बड़ी संख्या में वाटर डिसेलिनेशन प्लांट का निर्माण किया। खाड़ी देशों के पास दुनियाभर की वाटर डिसेलिनेशन का करीब 60 फीसद क्षमता है। सऊदी अरब का करीब 70 फीसद तक पेयजल इन्हीं प्लांटों से आता है। संयुक्त अरब अमीरात की निर्भरता करीब 90 फीसद तक है।

 

ओमान में 86 और कुवैत में 90 प्रतिशत पीने का पानी वाटर डिसेलिनेशन प्लांट से आता है। अगर ईरान इन पर हमला करता है तो यह विनाशकारी साबित हो सकता है। कतर और बहरीन बेहद छोटे देश हैं। इनके पास पानी के रणनीतिक रिजर्व भी व्यापक नहीं है। हमले की स्थिति में उनका पीने योग्य पानी जल्द ही खत्म होने का खतरा होगा।

सऊदी अरब में आ सकती तबाही!

खेती किसानी, उद्योग के अलावा तेल रिफाइनरियों में भारी मात्रा में ताजा पानी इस्तेमाल होता है। गर्मी आने के साथ ताजे पानी की मांग और भी बढ़ेगी। सबसे अधिक ताजा पानी पीने में खर्च होता है। दूसरे स्थान पर औद्योगिक क्षेत्र का नंबर आता है। सबसे कम पानी खाड़ी देशों में खेती किसानी पर लगता है। सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी यह है कि जुबैल स्थित वाटर डिसेलिनेशन प्लांट से सऊदी अरब का 90 फीसद पानी मिलता है। मतलब यह है कि हर 10 लीटर में 9 लीटर पानी इसी प्लांट से आता है। अगर ईरान यहां हमला करता तो तबाही आना तय है।


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