भारत हाल के कुछ साल में, जब-जब लिपुलेख दर्रे पर कोई फैसला लेता है, नेपाल की तरफ से कड़ी आपत्ति दर्ज कराई जाती है। अपने पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह ही नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह का भी रुख ऐसा ही है। नेपाल ने एक बार फिर लिपुलेख दर्रे को लेकर अपनी आपत्ति जताई, जिसे भारत ने एक सिरे से खारिज कर दिया।
नेपाल ने कैलाश मानसरोवर यात्रा को उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से कराए जाने पर विरोध जताया था। भारत ने कहा कि नेपाल का इस इलाके पर दावा न तो उचित है और न ही किसी ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है।
नेपाल सरकार ने रविवार को भारत और चीन को राजनायिक स्तर पर चेतावनी भेजकर लिपुलेख दर्रे से यात्रा कराने पर आपत्ति दर्ज की थी। नेपाल का कहना था कि लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी पर उसका अधिकार है और भारत को वहां कोई गतिविधि नहीं करनी चाहिए।
विदेश मंत्रालय ने क्या कहा है?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नेपाल के दावे को साफ शब्दों में खारिज किया है। उन्होंने कहा है, 'भारत का रुख हमेशा से साफ और तर्क संगत रहा है। ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं।'
रणधीर जायसवाल, प्रवक्ता, विदेश मंत्रालय:- लिपुलेख दर्रा साल 1954 से ही कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक रास्ता रहा है। यह कोई नई बात नहीं है। भारत नेपाल के साथ सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए तैयार है और सीमा संबंधी लंबित मुद्दों को संवाद के जरिए सुलझाने को तैयार है।
लिपुलेख दर्रा। Photo Credit: PTI
नेपाल को यह खटकता क्यों है?
नेपाल, लिपुलेख दर्रे को अपना मानता है। भारत कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख का इस्तेमाल करता रहा है। नेपाल का दावा है कि ब्रिटिश काल के दौरान साल 1816 में भारत और नेपाल के बीच सुगौली संधि हुई थी। यह संधि, महाकाली नदी के पूर्व में स्थित, लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा पर नेपाल को संप्रभुता का हक देती है।
जब भारत ने इस इलाके में मानसरोवर लिंक रोड का उद्घाटन किया था, तब नेपाल ने ऐतराज जताया था। नेपाल का कहना था कि यह क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन है। साल 2020 में नेपाल ने एक नया नक्शा जारी कर दिया था, जिस पर भारत ने ऐतराज जताया था।
नेपाल का कहना है कि अगर जमीन, नेपाल की है तो भारत कैसे बिना सहमति के निर्माण या किसी गतिविधि की इजाजत दे सकता है। यह निर्माण अंतररराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है। दोनों देशों के बीच, यह सीमा विवाद, दशकों से है।
जून से अगस्त तक कैलाश मानसरोवर यात्रा होने वाली है। कुल 20 बैच इस यात्रा पर जा सकते हैं। हर बैच में करीब 50 तीर्थयात्री होंगे। 10 बैच लिपुलेख दर्रे से और 10 बैच सिक्किम के नाथू ला दर्रे से जाएंगे। यात्रा 2025 में 5 साल के अंतराल के बाद फिर शुरू हुई थी। गलवान विवाद के बाद चीन और भारत के रिश्ते बेहद तल्ख हो गए थे, जिसका असर यात्रा पर पड़ा था।