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ईरान हार क्यों नहीं मान रहा, क्या है मोजेक स्ट्रेटजी? जिसने ट्रंप को फंसा दिया

ईरान की मोजेक स्ट्रैटजी इजरायल और अमेरिका पर भारी पड़ रही है। भीषण बमबारी के बावजूद ईरान के हमले थम नहीं रहे हैं। नेतन्याहू और ट्रंप जो हासिल करना चाहते थे, वह अभी तक मिला भी नहीं।

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ईरान क्यों नहीं मान रहा हार। ( Photo Credit: PTI)

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ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका को वैसे नतीजे नहीं मिल रहे हैं, जैसा डोनाल्ड ट्रंप ने सोच रखा था। अमेरिका और इजरायल को लगता था कि ईरान के नेतृ्त्व को खत्म करने के बाद देश में विद्रोह भड़क उठेगा। ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू ने उम्मीद जताई थी कि जनता सड़क पर उतरने और अपनी आजादी हासिल कर लेगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। 

 

दोनों देशों ने समन्वित तरीके से ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमला किया, ताकि ईरान पूरी ताकत से जवाब भी न दे सके, लेकिन यह रणनीति भी काम नहीं आई। 28 फरवरी को हमले के तुरंत बंद ही ईरान की 31 सैन्य कमानों ने न केवल इजरायल बल्कि खाड़ी देशों पर स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी हमलों को अंजाम दिया। 

 

14 दिन की जंग हो चुकी है। ईरान अब भी झुकने को तैयार नहीं है। सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने एक-एक मौत का बदला लेने की बात कही है। उन्होंने खाड़ी देशों को भी चेतावनी दी और कहा कि अपने यहां अमेरिका बेसों को बंद करें, नहीं अब उन देशों पर हमला किया जाएगा। ईरान अभी तक सिर्फ यहां अमेरिकी बेसों को निशाना बना रहा था।   

 

एक झटके में राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व खत्म होने के बावजूद ईरान अमेरिका को मुंहतोड़ जवाब देने में जुटा है। पूरे ईरान में 10 हजार से अधिक स्थलों पर बमबारी होने के बावजूद वह यह कैसे कर रहा है। इसके पीछे ईरान की एक डॉक्ट्रिन है। दशकों के अध्ययन के बाद ईरान ने इसे न केवल तैयार किया है, बल्कि आत्मसात भी किया। आइये समझते हैं इसी डॉक्ट्रिन के बारे में...

 

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क्या है ईरान की मोजेक डॉक्ट्रिन?

अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान में अब कोई केंद्रीय नेता नहीं है। यही कारण है कि आईआरजीसी अब सरकार के आदेश के खिलाफ काम कर रही है। हाल ही में ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने खाड़ी देशों से माफी मांगी और आगे हमला न करने की बात कही। मगर कुछ देर बाद ही आईआरजीसी ने ड्रोन और मिसाइलों से हमला कर दिया। वर्षों से ही आईआरजीसी को इसी दिन की खातिर डिजाइन किया गया था। डॉक्ट्रिन में यह है कि अगर ईरान का नेतृत्व खत्म हो जाता है तो भी आईआरजीसी स्वतंत्र तौर पर निर्णय लेगा और हमलों को अंजाम देगा। 

लड़ाई के नियम पहले से ही तय होते हैं

ईरान की इस रणनीति को मोजेक युद्ध सिद्धांत कहा जाता है। इसमें हर कमान मोजेक की टाइल्स की तरह अलग-अलग तरीके से लड़ती है। लड़ाई के नियम पहले ही तय होते हैं। यही कारण है कि मौजूदा नेतृत्व का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है।  

किसने तैयार की यह डॉक्ट्रिन?

साल 2008 में आईआरजीसी कमांडर जनरल मोहम्मद अली जाफरी ने यह सिद्धांत लागू किया था। इसके तहत आईआरजीसी को 31 प्रांतीय कोर में बांटा गया। हर कोर के पास केंद्र से बिना इजाजत के अपने क्षेत्र में जंग शुरू करने या दुश्मन के हर हमले का जवाब देने का अधिकार है। यह सिद्धांत यह तय करता है कि अगर सियासी नेतृत्व में कोई बदलाव होता है तो भी सैन्य कार्रवाई निर्बाध तरीके से जारी रहे।

अली खामेनेई पहले ही खींच चुके थे युद्ध का खाका

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अपनी हत्या से पहले अली खामेनेई ने अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इसमें उन्होंने अपनी सैन्य वसीयत लिखी थी। जिसमें यह कहा गया था कि उनकी मौत के बाद आईआरजीसी कैसे हमलों को अंजाम देगा। माना जा रहा है कि आईआरजीसी आज भी अली खामेनेई के आदेश का पालन कर रहा है। यही कारण है कि राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बयान के बाद भी खाड़ी देशों पर हमले नहीं रुके हैं। 

 

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ईरान ने कहां से लिया सबक?

मोजेक युद्ध डॉक्ट्रिन के तहत ईरान की सेना को लंबे समय तक जंग लड़ने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। ईरान अपने पड़ोसी इराक के साथ गरीब 8 सालों तक युद्ध लड़ चुका है। उसे लंबे युद्ध लड़ने का अनुभव है। अमेरिका ने जहां भी लंबा युद्ध लड़ा, वहां उसकी सेना फंस ही गई। चाहे वियतनाम युद्ध हो या अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ जंग।

 

 

 

 

2003 में इराक पर अमेरिका हमले के बाद ईरान की नींद खुली। उस हमले में अमेरिका ने एक झटके में ही सद्दाम हुसैन के शासन का पतन कर दिया था। इराक की सेना को आदेश देने वाला कोई नहीं बचा था। ईरान ने इसका अध्ययन किया और अपनी सेना को केंद्रीयकृत करने की जगह विकेंद्रीकृत किया, ताकि नेता के खत्म होने के बाद भी सेना खुद ही फैसला ले सके। 

हर यूनिट का अपना फैसला

डॉक्ट्रिन के तहत ईरान की मिसाइल फोर्स, नौसेना, बासिज यूनिट, आईआरजीसी और सेना अलग-अलग काम करती हैं। सभी यूनिट पर किसी एक शख्स का आदेश नहीं चलता है। अगर किसी एक कमान को तबाह भी कर दिया गया तो अन्य कमान अपना काम करते रहते हैं। अगर संचार बाधित हो गया तो भी कमान खुद फैसले ले सकते हैं।

 

 


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