दुनिया में कई देश ऐसे हैं जहां प्रतिनिधिक लोकतंत्र है यानी जनता अपने नेता चुनती है और नेता कानून बनाते हैं। वहीं कुछ देश ऐसे भी है जहां प्रत्यक्ष लोकतंत्र या जनमत संग्रह की ताकत पर भरोसा किया जाता है। इन देशों में सरकारें अकेले फैसला नहीं ले सकती। कोई भी फैसला जिसका वहां के लोगों से सीधा सरोकार रहता है, जनता की सीधी मंजूरी लेनी ही पड़ती है। ऐसे कई देश जैसे स्विटजरलैंड, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, ब्रिटेन और स्वीडन आदि जहां लोग नीतिगत फैसलों में जनमत संग्रह या रिफरेंडम के आधार पर निर्णय लेते हैं।
सबसे पहले समझते हैं कि जनमत संग्रह होता क्या है? जनमत संग्रह एक ऐसी प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया है जिसमें किसी देश या क्षेत्र के सभी वोटर किसी विशेष प्रस्ताव, नए कानून, संविधान संशोधन या नीतिगत मुद्दों पर सीधे मतदान करके अपना समर्थन या विरोध जताते हैं। अब जानते हैं कुछ बड़े उदाहरण जहां देश की नीतियां और संविधान सीधे नागरिकों के हाथों से तय होते हैं---
यह भी पढ़ें: 23 साल बाद इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी, टेंशन में कुर्द; ईरान खुश क्यों?
स्विट्जरलैंड
स्विट्जरलैंड दुनिया में प्रत्यक्ष लोकतंत्र का सबसे बेहतरीन और पुराना उदाहरण है। वहां के नागरिकों के पास अप्रत्याशित शक्तियां हैं। जैसे संविधान में किसी भी तरह के बदलाव या बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिए जनता की मंजूरी अनिवार्य है। अगर संसद कोई नया कानून बनाती है और देश के 50,000 नागरिक उसके खिलाफ 100 दिनों के भीतर साइन कर देते हैं तो उस कानून पर पूरे देश में वोटिंग होती है। साथ ही अगर 1 लाख लोग किसी नए कानून या संवैधानिक संशोधन के पक्ष में मत करते हैं तो सरकार को उस पर राष्ट्रीय मतदान कराना ही पड़ता है।
आयरलैंड
आयरलैंड में संविधान संशोधन के लिए जनमत संग्रह कराना कानूनी रूप से अनिवार्य है। हाल के समय में आयरलैंड ने कई बड़े सामाजिक और ऐतिहासिक फैसले संसद के बजाय सीधे जनता के वोटों के आधार पर लिए हैं। साल 2015 में आयरलैंड दुनिया का पहला ऐसा देश बना जिसने जनमत संग्रह के जरिए समलैंगिक विवाह को संवैधानिक मंजूरी दी। साथ ही साल 2018 में जनता ने भारी मतदान के जरिए देश के बेहद सख्त गर्भपात कानून को बदलने के लिए संविधान में संशोधन को मंजूरी दी।
न्यूजीलैंड
न्यूजीलैंड अक्सर बड़े नीतिगत और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर जनता से सीधे राय मांगता है। यहां अनिवार्य और सलाहकारी दोनों तरह के जनमत संग्रह होते हैं। साल 2020 के आम चुनाव के साथ जनता से पूछा गया कि क्या देश में 'एंड ऑफ लाइफ चॉइस एक्ट' लागू होना चाहिए, जिसे जनता ने बहुमत से स्वीकार किया। साल 2015-16 में देश का राष्ट्रीय ध्वज बदलने के लिए बकायदा दो चरणों में जनमत संग्रह कराया गया था हालांकि जनता ने पुराने ध्वज को ही बनाए रखने का फैसला किया।
उरुग्वे
दक्षिण अमेरिकी देश उरुग्वे में भी प्रत्यक्ष लोकतंत्र की जड़ें काफी मजबूत हैं। यहां नागरिक लोकप्रिय पहल के जरिए सीधे कानूनों को चुनौती दे सकते हैं या नए कानून ला सकते हैं। उरुग्वे की जनता ने जनमत संग्रह के जरिए अतीत में कई सरकारी कंपनियों के निजीकरण के सरकारी फैसलों को पलट दिया है।
यह भी पढ़ें: 'असली हीरो हैं कैप्टन स्मित', PM मोदी, नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप ने की तारीफ
Brexit का उदाहरण थोड़ा अलग
ब्रिटेन को अक्सर रिफरेंडम वाले देशों की सूची में रखा जाता है लेकिन इसे स्विट्जरलैंड या आयरलैंड के समान समझना सही नहीं होगा। 2016 में ब्रिटेन में EU की सदस्यता पर रिफरेंडम हुआ था। जनता ने EU छोड़ने के पक्ष में मतदान किया। लेकिन ब्रिटेन में जनमत संग्रह संसद के बनाए कानून के माध्यम से कराया गया था। यह स्विट्जरलैंड जैसी स्थायी व्यवस्था नहीं है। अभी कुछ दिन पहले खबर आई थी कि यूनाइटेड किंगडम यानी यूके टूट सकता है। आयरलैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स अपनी आजादी की योजना बना रहे हैं। अभी फिलहाल इस पर कोई फैसला नहीं हुआ है। देखना होगा कि इसका फैसला कैसे और क्या लिया जाता है?