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US सेना में 'Don't Ask Don't Tell' नीति क्या थी, विवाद क्यों हुआ?

अमेरिका में Don't Ask Don't Tell नीति लागू हुई थी जिसकी वजह से LGBTQ+ समुदाय को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। क्या थी यह नीति, समझिए।

 'Don't Ask Don't Tell' policy USA

अमेरिकी सेना, Photo Credit: AI Generated pic

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अमेरिका की सेना में अब ट्रांसजेंडर लोगों को शामिल नहीं किया जाएगा। देश की सेना ने इसका आधिकारिक ऐलान कर दिया है। इसके तहत अब सेना में ट्रांसजेंडर लोगों को नियुक्त नहीं किया जाएगा। राष्ट्रपति ट्रंप ने जैसे ही सत्ता संभाली वैसे ही देश में कई अहम फैसले लिए।

 

ट्रंप ने इस पर प्रतिबंध लगाने वाले एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए है। ट्रंप के इस फैसले से लगभग 11,500 ट्रांसजेंडर सेवा सदस्य प्रभावित होंगे। डिस्क्रिमिनेशन, कोई कानूनी सुरक्षा नहीं और Don't Ask, Don't Tell नीति के कारण ट्रांसजेंडर समुदाय को कई चुनौतियोंका सामना करना पड़ा है। 

 

70 के दशक से भेदभाव 

दरअसल, 1960-70 के दशक में ट्रांसजेंडर लोगों को सरकारी और निजी नौकरियों में भारी भेदभाव का सामना करना पड़ता था। अधिकत्तर राज्यों में ट्रांस लोगों के लिए नौकरी पाना मुश्किल था, क्योंकि नियोक्ता उन्हें आसानी से मना कर सकते थे।

 

वहीं, अमेरिकी सेना में LGBTQ+ समुदाय के सदस्यों को खुलकर अपनी पहचान बताने की अनुमति नहीं थी। इसे Don't Ask Don't Tell नीति के अंदर लागू किया गया था। यह एक अमेरिकी सैन्य नीति थी, जो समलैंगिक सैनिकों के सेना में खुले तौर पर सेवा देने पर बैन लगाती थी। यह नीति 1993 में तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल में लागू हुई थी जिसे 2011 में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हटा दिया था। 

 

यह भी पढ़ें: अमेरिकी सेना में भर्ती नहीं होंगे ट्रांसजेंडर्स, US आर्मी ने लगाया BAN

 

ऐसे में DADT नीति आखिर में थी क्या और इसे क्यों लागू किया गया था। वहीं, इसके हट जाने के बाद क्या हुआ? 

'Don't Ask Don't Tell' नीति

Don't Ask यानी सैन्य अधिकारियों को यह पूछने की अनुमति नहीं थी कि कोई सैनिक समलैंगिक है या नहीं।

Don't Tell यानी LGBTQ+ सैनिकों को अपनी लैंगिक पहचान  को छिपाना पड़ता था।

Don't Pursue यानी सेना को समलैंगिक सैनिकों के खिलाफ जांच नहीं करनी थी, जब तक कि कोई ठोस सबूत न मिले।

 

ऐसे में समलैंगिक सैनिकों को सेना में सेवा देने की अनुमति थी लेकिन वे अपनी पहचान जाहिर नहीं कर सकते थे। अगर वे खुले तौर पर समलैंगिक होने की बात स्वीकार करते तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता था। 

 

DADT नीति क्यों लागू की गई थी?

1990 के दशक की शुरुआत में अमेरिकी सेना में समलैंगिकों के लिए खुलकर सेवा देना पूरी तरह प्रतिबंधित था। बिल क्लिंटन प्रशासन सेना में LGBTQ+ लोगों को शामिल करने का समर्थन करते थे लेकिन सैन्य नेताओं ने इसका विरोध किया। कई विरोध के तहत 'Don't Ask, Don't Tell' लागू की गई, जिससे LGBTQ+ सैनिकों को सेवा देने की सीमित अनुमति मिली। हालांकि, यह LGBTQ+ सैनिकों के लिए भेदभावपूर्ण नीति बनी रही, क्योंकि उन्हें अपनी पहचान छिपानी पड़ती थी। 

इस नीति से क्या-क्या प्रभाव पड़े?

'Don't Ask, Don't Tell' नीति से 1994 से 2011 के बीच लगभग 13 हजार LGBTQ+ सैनिकों को निकाल दिया गया था। इस नीति की वजह से LGBTQ+ सैनिक मानसिक दबाव में रहते थे और अपनी असली पहचान छिपाने को मजबूर थे। कई अनुभवी और कुशल सैनिक केवल लैंगिक पहचान की वजह से बाहर कर दिए गए। 

 

यह भी पढ़ें: ट्रंप-मस्क का छंटनी प्लान, नौकरी से निकाले जाएंगे 9 हजार से ज्यादा लोग

कब इस नीति को हटाया गया? 

2008 में बराक ओबामा ने राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान सभी से वादा किया कि वह इस नीति को हटा देंगे। 2010 में अमेरिकी कांग्रेस ने DADT को खत्म करने के लिए कानून पारित किया और 20 सितंबर, 2011 को इस नीति को आधिकारिक तौर से समाप्त कर दिया गया।

 

बता दें कि इस नीति को खत्म करने के बाद LGBTQ+ सैनिक खुले तौर पर अपनी पहचान के साथ सेना में सेवा देने लगेंगे। अमेरिकी सेना में Diversity & Inclusion पर जोर दिया जाने लगा। इसके अलावा 2016 में ट्रांसजेंडर लोगों को भी सेना में शामिल होने की अनुमति मिल गई थी। हालांकि, 2017 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ट्रांसजेंडर लोगों की भर्ती पर रोक लगा दी थी लेकिन 2021 में जो बाइडेन प्रशासन ने इसे फिर से बहाल कर दिया। अब दोबारा से ट्रंप ने इस नीति के साथ-साथ ट्रांसजेंडर लोगों की सेना में भर्ती पर भी रोक लगा दी है। 

 

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