जब पानी पीने की बात आती है तो कांच की बोतल या तांबे की बोतल का इस्तेमाल किया जाता है। तांबे में प्राकृतिक एंटी माइक्रोबियल गुण होते हैं जो पानी में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने में करता है। आयुर्वेद में तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने की परंपरा रही है। अगर आप लंबे समय तक तांबे के बर्तन में रखते हैं तब तांबा पानी में घुल सकता है। ज्यादा तांबा शरीर में जाने से पेट दर्द, मतली और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।
वहीं, कांच की बोतल को सबसे शुद्ध और केमिकल फ्री माना जाता है। इसमें पानी की गुणवत्ता वैसे ही बनी रहती है जैसे पहले थी। दोनों के अपने फायदे और नुकसान है। आइए जानते हैं दोनों में से सेहत के लिए कौन सी ज्यादा बेहतर है?
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तांबे की बोतल में पानी पीना
तांबे के बर्तन में पानी पीना प्राकृतिक रूप से शुद्ध माना जाता है। जब पानी तांबे के बर्तन में रखा जाता है तब तांबे से निकलने वाले कॉपर आयन पानी में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और वायरस को खत्म कर देता है। WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के मुताबिक पानी में घुलने वाला तांबा 2 mg प्रति लीटर से कम ही रहता है, यानी यह सेहत के लिए सुरक्षित है। तांबे वाला पानी यात्रा के दौरान सुरक्षित माना जाता है। यह सिस्टम एंटीबायोटिक रेजिस्टेंट बैक्टीरिया पर भी असरदार है।
आयुर्वेद के मुताबिक तांबे के बर्तन में रखा पानी पाचन सुधारने, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने, सूजन को कम करने और त्वचा के लिए फायदेमंद होता है। तांबा एक जरूरी मिनरल है जो शरीर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तांबा इम्यून सिस्टम को मजबूत करने का काम करता है। साथ ही कोलेजन के निर्माण में मदद करता है।

तांबे की बोतल में पानी रखने पर तांबा धीरे-धीरे पानी में घुलता है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है लेकिन जब लोग इसमें नींबू पानी, फलों का पानी या गर्म पानी रखते हैं तब तांबा और ज्यादा मात्रा में पानी में चला जाता है। अगर शरीर में जरूरत से ज्यादा तांबा हो जाए तो मतली, पेट में ऐंठन, दस्त, उल्टी की समस्या होने लगती है।
क्या कहती है रिसर्च?
अध्ययनों के मुताबिक अगर तांबे की बोतल में पानी को 12 घंटे से ज्यादा रखा जाए तो वह जहर की तरह काम करता है। लंबे समय में लिवर और किडनी को भी नुकसान पहुंचा सकता है। साथ ही शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ाता है।
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किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
- लिवर और किडनी की बीमारी वाले लोग को परहेज करना चाहिए।
- बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग तांबे के सेवन से जल्दी प्रभावित हो सकते हैं।
- तांबे के बोतल को नींबू और नमक के घोल से साफ करें।
- पानी की बोतल में सिर्फ रात भर से ज्यादा न रखें।
- रोजाना तांबे की बोतल से 200-300 ml से अधिक पानी न पिएं।
कांच की बोतल
कांच के कंटेनर लंबे समय तक पानी रखने के लिए सुरक्षित होते हैं। उनमें किसी प्रकार का कई केमिकल नहीं होता है। इससे म पानी का स्वाद बदलता है और न कोई जहरीला तत्व पानी में मिलता है। कांच में BPA या phthalates जैसे हानिकारक रसायन नहीं होते हैं। कांच की बोतल में लंबे समय तक फलों या जड़ी-बूटियों से बना इंफ्यूज्ड ड्रिंक रख सकते हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल के लिए टिकाऊ होता है। पर्यायवरण और सफाई के लिहास से भी बेहतर है।

माइक्रोप्लास्टिक का खतरा
नए शोध में यह बात सामने आई है कि कांच (ग्लास) की बोतलों में भरे पानी, सोडा, बीयर और जूस में भी काफी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक पाया जाता है। हैरानी की बात यह है कि कई मामलों में यह मात्रा प्लास्टिक बोतलों से भी ज्यादा यानी 1 लीटर में लगभग 100 माइक्रोप्लास्टिक कण तक हो सकती है।
कहां से आ रहा है माइक्रोप्लास्टिक?
इसका मुख्य स्त्रोत बोतल के ऊपर लगे रंगीन प्लास्टिक ढक्कन होते हैं। फैक्टरी में बनने, ढुलाई के दौरान और जब हम बोतल खोलते हैं तब ढक्कन आपस में रगड़ खाते हैं। इस रगड़ से ढक्कन के रंग और प्लास्टिक के बहुत छोटे कण टूटकर पानी में मिल जाते हैं। आप अपनी लाइफस्टाइल के हिसाब से चयन करें।