जलवायु परिवर्तन की गर्मी अब एक वैश्विक आपातकाल का रूप ले रही है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक स्तर से 2°C ऊपर जाता है, तो साल 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी यानी 3.8 अरब लोग अत्यधिक गर्मी का सामना करेंगे। यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होगी बल्कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं और बिजली की मांग पर भी बहुत ज्यादा दबाव डालेगी।
नेचर सस्टेनेबिलिटी मैगेजीन में छपी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक अध्ययन के अनुसार, अत्यधिक गर्मी को 'साइलेंट किलर' माना गया है। इसका सबसे बुरा असर उन देशों पर पड़ेगा जो पहले से ही गर्म हैं, जैसे भारत, नाइजीरिया और इंडोनेशिया। इन देशों में करोड़ों लोगों के पास एयर कंडीशनिंग जैसे बुनियादी संसाधनों की कमी है, जिससे हीट स्ट्रोक और ऑर्गन फेल्योर जैसी गंभीर चिकित्सा स्थितियां पैदा होने का खतरा दोगुना हो जाएगा।
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2050 का हीट विजन
वैज्ञानिकों का कहना है कि जब वातावरण का तापमान शरीर के सामान्य तापमान से अधिक हो जाता है तो हमारी नेचुरल ठंडक प्रणाली जैसा की पसीना आना, काम करना बंद कर देती है। इसके परिणामस्वरूप चक्कर आना, तेज सिरदर्द, थकान और अंगों का काम करना बंद कर देना जैसी समस्याएं होती हैं। इसे 'साइलेंट किलर' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके लक्षण आपको तुरंत नहीं दिखेंगे लेकिन यह धीरे-धीरे शरीर को अंदर से खोखला कर देता है।
सबसे ज्यादा खतरे में 'हॉटस्पॉट' देश
अध्ययन के मुताबिक, गर्म देश इस संकट के केंद्र में होंगे। इनमें प्रमुख हैं, एशिया के देश जैसे भारत, फिलीपींस, बांग्लादेश, लाओस। अफ्रीका के देश नाइजीरिया, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, दक्षिण सूडान। लैटिन अमेरिका में ब्राजील।
इन देशों में आर्थिक असमानता के कारण एक बड़ा वर्ग कूलिंग तकनीक से वंचित है और आगे भी यही स्थिति रहेगी, जिससे मौतों का आंकड़ा बढ़ सकता है।
पिछले कुछ सालों में गंभीर लू के कारण भारत में हजारों मौतें हुई हैं। रातें भी अब इतनी गर्म होने लगी हैं कि इंसान का शरीर रिकवर नहीं कर पाता। देश के 11 राज्य पहले ही इसे अपनी लिस्ट में डाल चुके हैं।
ठंडे देशों की बदलती तस्वीर
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इस समस्या से केवल गर्म देश प्रभावित होंगे। हैरानी की बात यह है कि इस रिसर्च में यह खुलासा हुआ है कि कनाडा, रूस और फिनलैंड जैसे देश, जो अपनी कड़ाके की ठंड के लिए जाने जाते हैं, वे भी सुरक्षित नहीं हैं।
इन देशों में बुनियादी ढांचे की कमी है क्योंकि यहां इमारतें और ट्रांसपोर्ट सिस्टम गर्मी को रोकने के बजाय गर्मी को अंदर रखने, हीटिंग के लिए बनाई गई हैं। यूरोपीय देशों के अधिकांश घरों में एयर कंडीशनिंग नहीं है, जिससे वहां अचानक आने वाली हीटवेव अधिक घातक साबित हो रही है।
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वैज्ञानिकों के सुझाव
यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के मुख्य लेखक जीसस लिजाना के अनुसार, हमें अब 'कूलिंग' को विलासिता नहीं बल्कि एक बुनियादी जरूरत मानना होगा। इसके लिए जरूरी हैं कि हम सस्टेनेबल कूलिंग को बढ़ावा दें। ऐसे एयर कंडीशनर का विकास करें जो कम बिजली खर्च करें और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाएं।
साथ ही पैसिव कूलिंग तकनीक का इस्तेमाल करें। इमारतों को इस तरह डिजाइन करना कि वे प्राकृतिक रूप से ठंडी रहें, जैसे- सफेद छतें और बेहतर वेंटिलेशन।
ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर खड़े करें जो गर्मी से बचाव करें। सड़कों और पब्लिक प्लेस पर छायादार क्षेत्रों और वॉटर बॉडी का निर्माण करना।