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300 AQI में रहने का मतलब है जिंदगी के 7.5 साल पर चली कैंची

WHO के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति लगातार 300 से अधिक AQI वाले प्रदूषण में रहता है तो उसकी औसत उम्र 7 से 9 साल तक कम हो सकती है। इससे संबंधित एक और रिसर्च आई है जो इस बात को और पुख्ता करती है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Sora

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अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक ऐसे इलाके में रहता है, जहां एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) लगातार 300 से ऊपर रहता है, तो उसकी औसत उम्र करीब 7.5 साल तक कम हो सकती है। यह कोई अनुमान नहीं है, बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट में सामने आई बात है। WHO के अनुसार, ज्यादा प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की उम्र 7 से 9 साल तक घट रही है। यानी खराब हवा सीधे तौर पर इंसान की सेहत और जीवनकाल पर असर डालती है।


उससे भी खतरनाक बात यह है कि खराब हवा को लेकर एक और रिपोर्ट आई है जिसमें कहा गया है कि यह समस्या से न केवल फेफड़ो के कैंसर का खतरा बढ़ाता है बल्कि यह भी तय करता है कि आपको किस किस्म का कैंसर हो सकता है। बार्सिलोना इंस्टीट्यूट और अमेरिकन कैंसर सोसायटी के रिसर्च में पाया गया है कि अलग-अलग प्रदूषक फेफड़ों के अलग-अलग हिस्सों पर वार करते हैं।

 

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प्रदूषण और कैंसर का सीधा संबंध

WHO के अनुसार, वायु प्रदूषण में मौजूद बहुत छोटे या महीन कण शरीर के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं। जब बॉडी के सेल्स इन जहरीले कणों के संपर्क में बार-बार आते हैं, तो उनमें असामान्य वृद्धि होने लगती है, जो अंततः ट्यूमर और कैंसर का रूप ले लेती है। भारत में AQI का अक्सर 300 के पार जाना एक डरावनी सच्चाई है।

 

यह रिसर्च इसलिए भी खास है क्योंकि अब तक माना जाता था कि प्रदूषण बस बीमारी फैलाता है लेकिन अब यह साफ हो गया है कि हवा में मौजूद गैसों और धूल के कणों का मिजाज अलग-अलग होता है। करीब 25 सालों तक चले इस अध्ययन में 1 लाख 20 हजार से ज्यादा लोगों की सेहत पर नजर रखी गई, जिससे पता चला कि प्रदूषण के सूक्ष्म कण (PM 2.5) फेफड़ों के हर हिस्से के लिए घातक हैं जबकि नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसी गैसें सबसे आम फेफड़े का कैंसर, एडेनोकार्सिनोमा के लिए जिम्मेदार पाई गईं।

खतरे की जद में कौन है?

इस समस्या के कारण सबसे पहले बच्चे इसका प्रकोप झेलते हैं। उनके फेफड़े पूरी तरह बने नहीं होते, जिससे प्रदूषण का असर उन पर सबसे ज्यादा होता है। इस कारण यह सिर्फ सांस की बीमारी बनकर ही नहीं रह जाती बल्कि इससे ज्यादा खतरनाक रूप ले लेती है। जहरीली हवा शरीर में अंदरूनी सूजन पैदा करती है, जिससे शरीर के महत्वपूर्ण अंग समय से पहले बूढ़े होने लगते हैं।

 

बच्चों के बाद आते हैं बुजुर्ग। बीमारियों से लड़ने की क्षमता इनकी बहुत कम होती है जिस कारण ये बेहद संवेदनशील होते हैं। गर्भवती महिलाएं भी इससे अछूती नहीं है। जहरीली हवा का सीधा असर फीटस के विकास पर पड़ता है। 


वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (AQLI) की रिपोर्ट के अनुसार, जो WHO के मानकों पर आधारित है, उच्च प्रदूषण वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की उम्र 7 से 9 साल तक घट रही है। 300 AQI का स्तर होने पर हवा में PM2.5 की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो दिल की बीमारी, स्ट्रोक और फेफड़ों के कैंसर का मुख्य कारण बनती है।

 

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कौन सा प्रदूषक है किस कैंसर का 'साझेदार'?

  • PM 2.5: ये छोटे कण फेफड़ों के लगभग हर तरह के मुख्य कैंसर जैसे एडेनोकार्सिनोमा और स्क्वैमस सेल आदि का खतरा बराबर रूप से बढ़ाते हैं।
  • नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂): यह गैस एडेनोकार्सिनोमा कैंसर का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरी है।
  • ओजोन (O₃): इसका सीधा संबंध 'लार्ज सेल कार्सिनोमा' से पाया गया है।
  • सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂): रिसर्च कहती है कि अगर कैंसर के शुरुआती मरीज इस गैस के संपर्क में रहते हैं, तो उनके बचने की संभावना काफी कम हो जाती है।

भारत के लिए खतरे की घंटी

इस रिसर्च के नतीजे भारत के लिए किसी बड़े अलर्ट से कम नहीं हैं। आंकड़ों की मानें तो भारत की लगभग पूरी आबादी उस हवा में सांस ले रही है जो WHO के मानकों से बहुत ज्यादा जहरीली है। उत्तर भारत के राज्यों जैसे दिल्ली, यूपी, बिहार, पंजाब आदि राज्यों में स्थिति इतनी खराब है कि प्रदूषण लोगों की जिंदगी के करीब 7.5 साल कम कर रहा है।

 

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब समय आ गया है जब डॉक्टरों को मरीज का इलाज करते समय इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि वह किस तरह के वातावरण में रह रहा है। साफ हवा सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं है बल्कि यह कैंसर जैसे जानलेवा मर्ज से बचने की पहली सीढ़ी है।


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