भारत को लंबे समय से दुनिया की 'डायबिटीज की राजधानी' कहा जाता रहा है लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके पीछे के ठोस आनुवंशिक कारणों का खुलासा किया है। एक नई रिसर्च के अनुसार, भारतीयों में मौजूद कुछ विशिष्ट डीएनए अनुक्रम उन्हें पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में इस बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं, भले ही उनका बॉडी मास इंडेक्स (BMI) कम हो।
इस खोज में यह सामने आया है कि भारतीयों का शरीर फैट को अलग तरह से स्टोर करता है, जिससे 'लीवर' और 'पैनक्रियाज' के आसपास चर्बी जमा होने की संभावना बढ़ जाती है। यह आनुवंशिक प्रवृत्ति शरीर की इंसुलिन का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की क्षमता को कम कर देती है, जिससे कम उम्र में ही टाइप-2 डायबिटीज का खतरा पैदा हो जाता है।
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क्या है यह नई खोज?
भारतीयों में टाइप-2 डायबिटीज होने का खतरा यूरोपीय लोगों के मुकाबले छह गुना अधिक होता है। हाल ही में हुए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भारतीय परिवारों की कई पीढ़ियों का विश्लेषण किया और पाया कि हमारे जीन इस बीमारी के लिए बड़े पैमाने पर जिम्मेदार हैं। इस शोध की खास बात यह है कि इसमें कुछ ऐसे 'दुर्लभ जीन बदलाव' देखे गए हैं जो दुनिया की किसी और आबादी में नहीं मिलते।
आमतौर पर माना जाता है कि डायबिटीज होने में 50% हाथ हमारी लाइफस्टाइल का होता है और 50% हमारे आनुवंशिक कारणों का। लेकिन इस रिसर्च ने दिखाया है कि कुछ परिवारों में ये जीन इतने प्रभावी होते हैं कि हेल्दी लाइफस्टाइल के बावजूद वे बीमारी का कारण बन सकते हैं।
'कोडिंग' और 'नॉन-कोडिंग' जीन
रिसर्च करने वालों ने एक दिलचस्प बात यह बताई कि जीन दो तरह से काम करते हैं। एक होते हैं 'कोडिंग जीन', जो शरीर के लिए प्रोटीन बनाने का नुस्खा तैयार करते हैं। दूसरे होते हैं 'नॉन-कोडिंग जीन', जो यह निर्देश देते हैं कि उस नुस्खे का इस्तेमाल कब और कैसे करना है। इसमें पाया गया कि भारतीयों में ये दोनों ही वेरिएंट्स डायबिटीज की शुरुआत और जटिलता को तय कर रहे हैं।
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आनुवंशिक कारक
अध्ययन में पाया गया है कि भारतीयों में 'किफायती जीन' की थ्योरी काम करती है, जो पुराने समय में अकाल के दौरान ऊर्जा बचाने के काम आती थी लेकिन आज की सुस्त जीवनशैली में यह डायबिटीज का कारण बन रही है। शोधकर्ताओं ने कई ऐसे 'म्यूटेशन' की पहचान की है जो विशेष रूप से दक्षिण एशियाई लोगों में पाए जाते हैं और ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित करने वाले तंत्र को प्रभावित करते हैं।
लाइफस्टाइल और जीन
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ जीन ही जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि जब ये आनुवंशिक कारक खराब खान-पान और फीजिकल एक्टीविटी की कमी से मिलते हैं, तो रिस्क कई गुना बढ़ जाता है। भारतीयों में मांसपेशियों का कम वजन और पेट की अधिक चर्बी इस समस्या को और गंभीर बना देती है।
जैसे कैंसर के अलग-अलग प्रकारों के लिए अलग इलाज होता है, वैसे ही अब डायबिटीज के मरीजों को भी उनके जीन की बनावट के आधार पर 'पर्सनलाइज्ड' या सटीक इलाज दिया जा सकेगा। आने वाले समय में उन बच्चों में डायबिटीज रोकने में मदद करेगा जिनके परिवारों में यह बीमारी पीढ़ियों से चली आ रही है।