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2011 vs 2026: अन्ना आंदोलन के समय कांग्रेस ने जो किया, वैसी ही गलती कर रही BJP?

साल 2011 के बाद 2026 में भी दिल्ली की सड़कों पर जोरदार प्रदर्शन जारी है। सत्ताधारी पार्टी अलग है लेकिन एक बार फिर से वैसी ही गलतियां की जा रही हैं।

manmohan singh and narendra modi

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, Photo Credit: ChatGPT

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जगह देश की राजधानी दिल्ली है। दिल्ली में भी खास जंतर-मंतर। समय में लगभग 15 साल का अंतर है और सत्ता में बैठी पार्टी भी दूसरी है। साल 2011 में सत्ता में कांग्रेस थी और अब भारतीय जनता पार्टी है। एक चीज ठीक वैसी ही हो रही है और वह है सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन। तब भ्रष्टाचार को लेकर सत्ता विरोधी लहर उठ खड़ी हुई थी और इस बार पेपर लीक के मुद्दे को लेकर सत्ता के खिलाफ जबरदस्त आवाज बुलंद हो रही है। तब सत्ताधारी पार्टी ने एक के बाद एक गलतियां कीं और विरोध को संभाल नहीं पाई। सोमवार को जिस तरह प्रदर्शनकारियों से डील किया गया और उन पर लाठीचार्ज हुआ, उसके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि सत्ताधारी पार्टी बीजेपी भी अब वैसी ही गलतियां कर रही है जैसी कांग्रेस ने 2011 में की थी।

 

पहले तो राजधानी दिल्ली में हो रहे प्रदर्शन को बिल्कुल नजरअंदाज करना, संवाद स्थापित न करना, मामले को बिगड़ने देना और आखिरी वक्त में संभालने की कोशिश में बल प्रयोग करना। ये सब दिल्ली ने साल 2011 में भी देखा था और यही सब दिल्ली अब 2026 में देख रही है। दोनों बार यह देखा गया कि विरोध प्रदर्शन किसी पारंपरिक संगठन या फिर पार्टी के बैनर तले नहीं हुए। शायद इसी के चलते दोनों बार सत्ताधारी पार्टी ने इसे हल्के में लिया और जब तक गंभीरता समझ आती, तब तक देर हो चुकी थी। 


शुरुआती चूक

दोनों ही बार यह हुआ कि आंदोलन नए बैनर तले हुआ। 2011 में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले शुरू हुआ आंदोलन लोकपाल की मांग को लेकर हुआ था। तब कांग्रेस के कई नेता इसे सिरे से खारिज करते थे, संसद सत्र के दौरान आंदोलन का मजाक उड़ाया गया था और UPA सरकार में शामिल कई दलों ने तो लोकपाल की जरूरत पर ही सवाल खड़े हुए थे। नतीजा यह हुआ कि आंदोलन से जुड़ी टीम को समय मिला और प्रचार-प्रसार के जरिए वह अपनी बात को एक बड़े वर्ग तक पहुंचाने में कामयाब हो गई।

 

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इस बार बीजेपी सरकार ने भी यही किया। जब NEET पेपर लीक को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अगुवाई में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू हुए तो इसे हल्के में लिया गया। सरकार ने बाहर से तो बयानबाजी जारी रखी लेकिन CJP से किसी भी तरह का संपर्क करने की कोशिश नहीं की गई। इसका असर हुआ कि CJP ने अपना यह आंदोलन देश के कई शहरों में भी पहुंचाया। इंटरनेट पर पहले ही चर्चित हो चुकी इस पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल्स पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने आग में घी डालने का काम कर दिया। 

कम आंकने वाली गलती

अन्ना आंदोलन के समय इंडिया अगेंस्ट करप्शन के साथ जुड़े चेहरों में कोई बड़ा राजनेता नहीं था। ऐसे में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने कम आंका। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता अब बताते हैं कि सरकार को बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह प्रदर्शन इतना बड़ा हो जाएगा। सोशल मीडिया की ताकत को भी तत्कालीन सरकार ने हल्के में लिया था और उसे खारिज कर रही थी। नतीजा हुआ कि सोशल मीडिया के दौर में 'भ्रष्टाचारी सरकार' वाला नैरेटिव तेजी से आगे बढ़ा और शुरुआत में कम मीडिया कवरेज को बावजूद लोग इससे जुड़ने लगे।

 

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इस बार जब अभिजीत दीपके पहली बार जंतर-मंतर पर आए और भीड़ कम आई तब मौजूदा बीजेपी सरकार को लगा कि यह मामला हल्का ही रहेगा और उसे इसके लिए चिंता करने की जरूरत नहीं है। बाद में सोनम वांगचुक के आने और उनकी भूख हड़ताल के लगातार जारी रहने के बाद नैरेटिव बदला। आखिर में सोनम वांगचुक को उठाने के बाद तक सरकार को लगा था कि काम हो गया। हालांकि, वहीं से मामला पलट गया और देखते ही देखते भीड़ कई गुना बढ़ गई। 

संवाद में कमी

2011 में लोकपाल की मांग कर रही टीम अन्ना से शुरुआती कुछ दिनों में सीधा संवाद नहीं किया गया था। मामला बिगड़ने के बाद संवाद शुरू हुआ और बातचीत में लंबा वक्त गया। अप्रैल 2011 में कांग्रेस सरकार ने मांगें मानने का वादा तो कर दिया लेकिन लोकपाल को लेकर उसका रवैया लचर रहा। नतीजा हुआ कि अन्ना हजारे फिर से अनशन पर बैठ गए और इस बार आंदोलन और जोरदार हो गया।

 

अभिजीत दीपके की टीम की अगुवाई में 6 जून से ही जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन शुरू हो गए थे। 28 जून से सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर थे लेकिन सरकार की ओर से प्रदर्शनकारियों से कोई बातचीत नहीं की गई। ना तो सत्ता पक्ष का कोई नेता जंतर-मंतर गया और ना ही प्रदर्शनकारियों में से किसी को बुलाया गया। जब 20 जुलाई को प्रदर्शन तेज हो गए और भीड़ बढ़ गई तब जाकर सरकार ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश शुरू की।

अड़ियल रवैया बना मुसीबत

अन्ना आंदोलन के समय भी सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बात नहीं बन पा रही थी। सरकार की ओर से लगे मैनेजर्स किसी भी सूरत में प्रदर्शनकारियों को राजी नहीं कर पा रहे थे और बातचीत में देरी के चलते मामला बढ़ता जा रहा था। ऊपर से कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इससे दूरी बनाकर चल रहा था। सरकार की छवि अड़ियल बन रही थी कि सरकार तवज्जो नहीं दे रही है और वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कुछ करना ही नहीं चाहती है।

 

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इस बार नीट का पेपर लीक होने के बाद शुरुआत से ही सरकार की ओर से इसे टालने की कोशिश हुई। दबाव बढ़ने के बाद सीबीआई जांच और गिरफ्तार के आदेश दिए गए। उस पर भी NTA की ओर से कहा गया कि पेपर लीक नहीं हुआ कुछ हिस्सा लीक हुआ। फिर CBSE के पोर्टल में गड़बड़ी और री-नीट के एलान में हुई देरी ने भी युवाओं का गुस्सा बढ़ा दिया। नतीजा हुआ कि कई बच्चों ने आत्महत्या कर ली और यह मामला बेहद गंभीर हो गया।

ट्रिगर प्वाइंट 

अन्ना आंदोलन के समय सरकार की ओर से सबसे बड़ी चूक थी कि उसने एक ट्रिगर प्वाइंट दे दिया। जब अन्ना हजारे अगस्त 2011 में भूख हड़ताल शुरू करने वाले थे तब पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तिहाड़ जेल भेज दिया। इस घटना ने आंदोलन को गरम कर दिया और रामलीला मैदान में अपार भीड़ जुटने लगी। देखते ही देखते यह नेशनल मीडिया का मुख्य मुद्दा बन गया और सरकार चौतरफा घिर गई।

 

इस बार जंतर-मंतर पर चल रहा धरना तब तक काफी शांत रहा जब तक कि सरकार ने रिऐक्ट नहीं किया था। सरकार की ओर से सोनम वांगचुक को जिस तरह से जंतर-मंतर से उठाकर अस्पताल भेजा गया, उसने ट्रिगर प्वाइंट का काम किया। यह संदेश गया कि अब सरकार जोर जबरदस्ती पर उतर आई है। 20 जुलाई को संसद मार्च पहले से प्रस्तावित था और उससे ठीक पहले हुई इस घटना ने लोगों को आंदोलित कर दिया और देखते ही देखते इतनी भीड़ आ गई जिसका किसी ने भी अंदाजा नहीं लगाया था।

 

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ये घटनाएं दिखा रही हैं कि 2011 और 2026 में साल का अंतर जरूर है लेकिन सत्ताधारी पार्टी की ओर से कमोबेश वैसी ही गलतियां हो रही हैं और मामला बिगड़ता जा रहा है। अभी तक सरकार की ओर से आश्वासन नहीं दिया गया है कि वह एक भी मांग मानने को तैयार भी है या नहीं। इसका असर हो रहा है कि मामला दिन ब दिन गर्म होता जा रहा है और गुस्सा बढ़ रहा है।  

 


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