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साढ़े 4 साल बाद भी स्वीकार नहीं कर पा रहे किसान, नैनो यूरिया हिट है या फ्लॉप?

किसान पैदावार बढ़ाने के लिए लंबे समय से IFFCO के चार साल पहले लॉन्च किए गए नैनो यूरिया को लेकर चर्चा के बावजूद सरकार किसानों को इसके इस्तेमाल के लिए पूरी तरह राजी नहीं कर पाई है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Sora

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खेती की पैदावार बढ़ाने के लिए किसान लंबे समय से यूरिया के इस्तेमाल पर भरोसा करते आए हैं। सरकार भी किसानों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से यूरिया पर कई तरह की सब्सिडी देती है, ताकि उनकी फसल की उपज बेहतर हो सके। इसी कड़ी में पिछले कुछ वर्षों से नैनो यूरिया के इस्तेमाल को लेकर भी काफी चर्चा होती रही है। देश की सबसे बड़ी उर्वरक कंपनी इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर को-ऑपरेटिव (IFFCO) ने करीब चार साल पहले नैनो यूरिया नाम से एक नया नाइट्रोजन फर्टिलाइजर लॉन्च किया था। कंपनी का दावा था कि यह पूरी तरह सुरक्षित और किसानों की पैदावार बढ़ाने में मदद करेगा। हालांकि, इतने साल बीत जाने के बावजूद सरकार किसानों को इसके इस्तेमाल के लिए पूरी तरह राजी नहीं कर पाई है।

 

नैनो यूरिया को लेकर हुई कई रिसर्च में यह दावा किया गया है कि यह किसानों के लिए उतना प्रभावी साबित नहीं हो रहा है। IFFCO के दावों के विपरीत, इससे फसलों की उपज पर नकारात्मक असर पड़ने की बात सामने आई है। बीते शीतकालीन सत्र में सरकार ने संसद में यह भी स्पष्ट किया था कि किसानों पर नैनो यूरिया के इस्तेमाल को लेकर किसी तरह का दबाव नहीं डाला जा रहा है।

 

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सरकार इस्तेमाल पर जोर क्यों दे रही है?

नैनो यूरिया, यूरिया की एक लिक्विड फॉर्म है जिसे नैनो तकनीक की मदद से बनाया गया है। पारंपरिक यूरिया के मुकाबले इसके कण इतने छोटे होते हैं कि ये सीधे पौधों की पत्तियों के छिद्रों के जरिए अंदर पहुंच जाते हैं। सरकार नैनो यूरिया को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। साथ ही इससे होने वाले फायदे को लेकर कई दावे कर रही है। भारत सरकार यूरिया पर भारी सब्सिडी देती है। 'नमो ड्रोन दीदी' जैसी योजनाओं के जरिए छिड़काव की समस्या को हल करने का प्रयास कर रही है।

 

सरकार का कहना है कि इसके आने से सरकार का सब्सिडी पर होने वाला खर्च कम होगा क्योंकि इसकी एक छोटी बोतल एक पूरी बोरी के बराबर काम करती है। सरकार यूरिया पर अपने आयात की निर्भरता को कम करना चाहती है। उनका कहना है कि स्वदेशी नैनो यूरिया से भारत 'आत्मनिर्भर' बनेगा।

 

कई खोज से यह पता चला है कि दानेदार यूरिया के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी एसिडिक हो जाती है और जमीन बंजर होने लगती है। सरकार का तर्क है कि नैनो यूरिया सीधे पौधे पर काम करती है जिससे मिट्टी खराब नहीं होती। साथ ही 45 किलो की बोरी उठाना और स्टोर करना मुश्किल है जबकि 500ml की बोतल को आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है जिससे ट्रांसपोर्टेशन और स्टोरेज में काफी आसानी होगी।

 

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किसान क्यों कर रहे हैं विरोध?

सरकार के तमाम तर्कों और फायदों को गिनवाने के बावजूद जमीन पर कई किसान नैनौ यूरिया को लेकर खुश नहीं है। इसके पीछे उनके कई तर्क है जैसे इसके छिड़काव में मेहनत और काफी खर्चा होगा। दानेदार यूरिया को किसान हाथ से खेत में फेंक देते हैं लेकिन नैनो यूरिया के लिए स्प्रे मशीन की जरूरत होती है और इसमें मजदूरी ज्यादा लगती है। सबसे बड़ा सच यह है कि नैनो यूरिया, दानेदार यूरिया को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता। पौधों को शुरुआती बढ़त के लिए जमीन में नाइट्रोजन चाहिए होती है जो नैनो यूरिया नहीं दे सकता। किसान को बोरी खरीदनी ही पड़ती है।

 

कुछ कृषि विशेषज्ञों और किसानों का मानना है कि नैनो यूरिया अकेले पौधे की 'नाइट्रोजन' की जरूरत पूरी नहीं कर सकता। किसानों को डर है कि अगर उन्होंने दानेदार यूरिया बंद कर दिया, तो उनकी फसल की पैदावार गिर जाएगी। कई जगहों पर किसानों ने शिकायत की है कि जब वे दुकान पर दानेदार यूरिया की बोरी खरीदने जाते हैं तो दुकानदार उन्हें मजबूरी में नैनो यूरिया की बोतल भी साथ में खरीदने को मजबूर करते हैं। किसानों को अभी तक इसके प्रयोग के सही समय और तरीके की पूरी जानकारी नहीं है, जिससे उन्हें जैसे परिणाम की उम्मीद है वह नहीं मिल पा रहा है।

IFFCO के दावे और उस पर सवाल

IFFCO ने 2022 में घोषणा की थी कि 2025 तक नैनो यूरिया के लिए 10 प्लांट स्थापित किए जाएंगे। इस योजना के तहत कंपनी नैनो यूरिया के अलावा जिंक, सल्फर जैसे उत्पाद बनाने की बात कर रही थी। अब तक कुछ प्लांट्स को शुरू किया गया है। कंपनी ने इसको लेकर दावा किया था कि 250 ग्राम की मात्रा वाला एक नैनौ यूरिया बोतल जिसमें मात्र 20 ग्राम नाइट्रोजन होता है वह 21 किलोग्राम नाइट्रोजन रखने वाले 45 किलो के पारंपरिक यूरिया के एक बोरे के बराबर है।

 

रिसर्च करने वाली संस्था ने कहा कि साइंटिफिक प्रुफ के आधार पर नैनो यूरिया की क्वालिटी और विशेषता पर अभी भी स्पष्टता नहीं है। उनका कहना है कि अगर ऐसा होता तो नैनो यूरिया में मौजूद नाइट्रोजन पारंपरिक यूरिया की तुलना में फसलों में नाइट्रोजन इस्तेमाल करने की क्षमता को 1000 गुना बढ़ा देता।

 

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IFFCO ने इसके लॉन्च के समय यह भी दावा किया था कि इससे न केवल अच्छी फसल पैदावर हासिल होगी बल्कि पर्यावरण के पड़ने वाले असर भी कम होंगे। इसके उलट यह कहा जा रहा है कि जो कुछ भी उम्मीदें IFFCO के जरिए दिखाई जा रही है वह वास्तविकता से काफी दूर हैं। इसके चलते किसानों को फसल उपज में काफी नुकसान हो सकता है जो कि एक गंभीर खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय को भी नुकसान पहुंचाएगा।

 

नाइट्रोजन फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए एक बहुत जरूरी कंपाउंड है लेकिन मानव गतिविधियों के कारण इसका जरूरत से ज्यादा उपयोग होने लगा है, जिससे कई तरह की पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो रही हैं। खेती से जुड़े शोधकर्ताओं का कहना है कि नाइट्रोजन का अत्यधिक इस्तेमाल एक गंभीर मुद्दा बन चुका है और इसे नियंत्रित करने की तत्काल जरूरत है। वहीं, नैनो यूरिया के फायदों को लेकर अभी तक ठोस और प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है इसलिए इसके वास्तविक प्रभाव और व्यवहार को लेकर स्थिति साफ नहीं हो पाई है।

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