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जिसे मिला, उस पर लगे 'दाग', शिक्षा मंत्रालय 'काजल की कोठरी' है?

स्मृति ईरानी से धर्मेंद्र प्रधान तक, 2014 से अब तक देश ने 5 शिक्षा मंत्रियों को देखा है। उनसे जुड़े विवाद क्या रहे, क्यों विदाई हुई, पढ़ें रिपोर्ट।

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स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल, धर्मेंद्र प्रधान और प्रह्लाद जोशी। Photo Credit: ChatGPT

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एक पुरानी कहावत है, 'काजल की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय एक लीक काजल की लागि है पै लागि है।' अर्थ है कि अगर संगत बुरी है तो बेदाग निकलना मुश्किल है। भारत में जिसने भी शिक्षा विभाग की कमान संभाली, बिना दाग लगे बाहर नहीं आया। वजह यह है कि बुनियादी स्तर पर इतनी कमियां हैं कि कोई भी कुर्सी पर बैठे, पेपर लीक की घटनाएं थमती नहीं हैं। 

नरेंद्र मोदी सरकार में न रक्षा मंत्री बदले, न वित्त मंत्री बदलीं, न गृह मंत्री बदले, न ही सड़क एवं परिवहनमंत्री। दो-दो बार से लोगों को उन्हीं का मंत्रालय मिल रहा है। यह सच है कि भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इन पदों पर है लेकिन कभी गौर किया है कि कितने शिक्षा मंत्री देश में बदले गए? ऐसा कोई मंत्री नहीं, जिसके कार्यकाल में पेपर लीक न हुआ हो।

साल 2014 से लेकर 2026 तक, नरेंद्र मोदी सरकार में शिक्षा मंत्रालय, किस-किस के पास रहा, क्या ट्रैक रिकॉर्ड रहा, विवाद क्या रहे, आए जानते हैं- 

साल 2014-16: स्मृति ईरान, ढाई साल में ही बदला विभाग 

केंद्रीय शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी ने 26 मई 2014 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद की शपथ ली। 5 जुलाई 2016 को उनका विभाग बदल गया। 2 साल 39 दिन ही वह इस पद पर रह पाईं। विवाद, उनके प्रदर्शन को लेकर ही नहीं हुआ, निजी वजहों से हुआ। स्मृति ईरानी की शिक्षा पर हमेशा से सवाल उठे है। उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर कांग्रेस नेता अजय माकन और एक्टिविस्ट मधु किश्वर जैसे लोगों ने सवाल उठाए।

कहा गया कि वह ग्रैजुएट भी नहीं हैं और महज 12वीं पास हैं। सवाल उठा कि क्या वह देश शिक्षा मंत्रालय को संभालने के लिए सक्षम हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की चार-वर्षीय स्नातक योजना को वापस लेने के फैसले पर भी हंगामा हुआ। रोहित वेमुला की खुदकुशी और जेएनयू में कथित देश विरोधी नारों की वजह से भी सवाल उठे। कोई बड़ा पेपरलीक नहीं हुआ लेकिन विवाद भी कम नहीं रहे। 

साल 2016-19: प्रकाश जावडेकर, विवाद पर विवाद

स्मृति ईरानी का मंत्रिमंडल बदल दिया गया। 2 साल 229 दिनों का कार्यकाल रहा। नरेंद्र मोदी कैबिनेट के चमकते सितारे भी रहे लेकिन यह विभाग इससे ज्यादा उनके नियंत्रण में नहीं रहा। प्रकाश जावड़ेकर का भी कार्यकाल विवादों से भरा रहा है। उनके कार्यकाल में साल 2018 में CBSE का परीक्षा से पहले पेपर लीक हो गया था, 10वीं और 12वीं के पेपर बाजार में मिल रहे थे।

विवाद बढ़ा तो परीक्षा दोबारा करानी पड़ी और विपक्ष ने मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई। उनके कार्यकाल में जेएनयू में लंबे समय तक कुलपति की नियुक्ति और छात्र आंदोलनों को लेकर टकराव होता रहा। नई शिक्षा नीति (NEP) के मसौदे में उनके विभाग ने देरी भी की। उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को भंग कर नया नियामक हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (HECI) लाने की कवायद की थी। 

विश्वविद्यालयों और शिक्षाविदों ने आपत्ति जताई थी। उन्हीं के कार्यकाल में इंस्टिट्यूशन ऑफ एमिनेंस (IoE) योजना के तहत जियो इंस्टिट्यूट  को'उत्कृष्टता संस्थान' दिया गया था। वह भी विवादों से बचे नहीं। 

साल 2019-2021: रमेश पोखरियाल भी नहीं बेदाग निकले

नरेंद्र मोदी, जब दूसरी बार प्रधानमंत्री बने, तब रमेश पोखरियाल को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली। उनका कार्यकाल 30 मई 2019 से लेकर 7 जुलाई 2021 तक चला। 2 साल 38 दिनों के कार्यकाल में कई ऐसे विवाद रहे जिनकी वजह से उन पर आंच आई। 

रमेश पोखरियाल 'निशंक' की डिग्री पर ही सवाल उठे। श्रीलंका की कोलंबो स्थित 'ओपेन इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी' ने 90 के दशक में उन्हें शिक्षा में योगदान के लिए डी-लिट की उपाधि दी थी। कुछ वर्षों बाद विज्ञान में योगदान के लिए एक और डी-लिट डिग्री उसी विश्वविद्यालय से मिली, जबकि यह विश्वविद्यालय श्रीलंका में विदेशी या घरेलू विश्वविद्यालय के तौर पर पंजीकृत ही नहीं था।

रमेश पोखरियाल के नाम के आगे डॉ. लगाने को लेकर भी सवाल उठे। उनके कार्यकाल में जुलाई 2020 में लागू हुई नई शिक्षा नीति (NEP 2020) पर हिंदी थोपे जाने और तीन भाषा नीति को लेकर गैर हिंदी भाषी राज्यों ने विरोध किया। यह वही दौर था, जब कोविड महामारी भी आ गई। ऑनलाइन शिक्षा और परीक्षाओं को लेकर उनके फैसले भी विवादित रहे। JEE और NEET की परीक्षा समय पर कराने को लेकर सवाल उठे। अगली कैबिनेट में उन्हें जगह नहीं मिली।

साल 2021-2026: धर्मेंद्र प्रधान, अंत बुरा, तो सब बुरा

धर्मेंद्र प्रधान ने रमेश पोखरियाल के बाद शिक्षा मंत्रालय का पद संभाला और 2014 से अब तक, सबसे लंबा कार्यकाल भी उन्हें मिला। 5 साल 18 दिन तक, वह नरेंद्र मोदी की दूसरी और तीसरी सरकार में मंत्री रहे। उनके राजनीतिक करियर पर सबसे बड़ा दाग भी लगा। उनकी सरकार में लगातार 2 बार NEET का पेपर लीक हुआ। 25 जुलाई 2026 को लंबे आंदोलन के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। 

पेपर लीक के खिलाफ देशभर में छात्रों का व्यापक आंदोलन हुआ और जंतर-मंतर पर पेपर लीक व गड़बड़ी के विरोध में छात्र संगठनों का प्रदर्शन लगातार जारी रहा, जिसके चलते चौतरफा दबाव में आकर उन्हें पद छोड़ना पड़ा। यह किसी मोदी सरकार के मंत्री का वर्षों बाद दबाव की वजह से इस्तीफा देने का मामला था।

धर्मेंद्र प्रधान से जुड़े विवाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में देशभर में एक महीने से उनके खिलाफ आंदोलन हो रहे थे, उनके इस्तीफे की मांग हो रही थी। उनके कार्यकाल में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली, UGC के नियमों, NCERT की पाठ्यपुस्तकों में किए गए बदलावों को लेकर हंगामा हुआ।

धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में गैर बीजेपी शासित राज्यों में भाषा का टकराव बढ़ा। विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव के प्रस्ताव पर राज्यों की भूमिका कमजोर होने को लेकर भी हंगामा हुआ। 2026 में लागू CBSE की ऑन-स्क्रीन मूल्यांकन प्रणाली में तकनीकी खामियों और अंकन गड़बड़ियों को लेकर भी विवाद हुआ। राष्ट्रीय शिक्षा नीति और पीएम श्री स्कूल योजना को लेकर भी विवाद हुआ। आखिर उन्हें लंबे विवाद के बाद इस्तीफा देना पड़ा। 

प्रह्लाद जोशी से क्या हैं उम्मीदें?

केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने शिक्षा मंत्रालय की कमान 26 जुलाई 2026 को संभाली है। पेपर लीक की चुनौती उनके सामने भी आएगी। लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या सिर्फ चेहरा बदल जाने से शिक्षा विभाग का भ्रष्ट्राचार खत्म हो जाएगा? अभी उनके कार्यकाल का पहला दिन है, उनके सामने शिक्षा विभाग की कई चुनौतियां हैं, जिनके चलते, धर्मेंद्र प्रधान को कुर्सी छोड़नी पड़ी है। 

 


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