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GDP Gowth: शहरी और सर्विस सेक्टर से आई ग्रोथ, गांव-किसान पीछे क्यों रह जाते हैं?

GDP के मामले में शहर और सर्विस सेक्टर की तुलना में गांव और किसान पीछे क्यों रह जाते हैं। इसके पीछे की वजहें क्या हैं?

India GDP growth

सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit-Chat GPT

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भारत की अर्थव्यवस्था अप्रैल-जून तिमाही में 7.8% की रफ्तार से बढ़ी, जो पिछले साल की इसी तिमाही के 6.9% से ज्यादा है। यह आंकड़ा रिजर्व बैंक के 7% व ब्लूमबर्ग सर्वे के 7.3% के अनुमान से भी आगे। सरकार इसे बड़ी उपलब्धि बता रही है। इस ग्रोथ का ज्यादातर हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर यानी शहरों से आया, जबकि अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी अब भी केवल 17% पर टिकी है। यह सरकार के 25 फीसदी के लक्ष्य से बहुत पीछे है। 

 

दूसरी ओर विपक्ष का दावा है कि बेरोजगारी 50 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है, हर छठा युवा बेरोजगार है, और खुदरा महंगाई भी बीते 19 में सबसे ज्यादा है। ऐसे में रसोई का बजट और गांव-किसान की हालत उतने ही सवालों में घिरी है। ऐसे में आइए समझने की कोशिश करते हैं कि GDP के मामले में शहर और सर्विस सेक्टर की तुलना में गांव और किसान पीछे क्यों रह जाते हैं। 

 

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कैसे कैलकुलेट होती है GDP? 

जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद, किसी देश में एक तय समय यानी तीन महीने की तिमाही या पूरे साल में बनने वाली सारी चीजों (उत्पादन) और सर्विस की कुल कीमत को कहते हैं। आसान भाषा में कहें तो किसान ने अनाज उगाया, फ़ैक्ट्री ने मोबाइल बनाया, बैंक ने लोन दिया, दुकानदार ने सामान बेचा, इन सबकी कीमत जोड़ दें, उसे ही GDP कहा जाता है। 

 

इसे कैलकुलेट करने का एक आम फ़ॉर्मूला है- GDP = C + I + G + (X - M)। इसमें सबसे पहला हिस्सा है उपभोग (C)। लोग अपनी कमाई से जो कुछ खरीदते हैं, राशन, कपड़ा आदि, जीडीपी में इसका हिस्सा सबसे बड़ा होता है। दूसरा है निवेश (I), यानी कंपनियां और सरकार नई फैक्ट्री, मशीन, सड़क और इमारत बनाने में जितना पैसा लगाती हैं। 

 

तीसरा हिस्सा है सरकारी खर्च (G), यानी सरकार स्कूल, अस्पताल, पुलिस, सेना और अलग-अलग योजनाओं पर जो खर्च करती है। आखिरी हिस्सा है निर्यात घटा आयात (X-M), यानी भारत ने बाहर जितना सामान बेचा, उसमें से बाहर से जितना खरीदा, वह घटा दिया जाता है। इन चारों को जोड़ने पर जो कुल रक़म निकलती है, वही जीडीपी होती है।

 

एक और तरीका भी है, जिसमें उत्पादन के आधार पर कैलकुलेट किया जाता है। इसमें खेती, मैन्युफैक्चरिंग यानी फैक्ट्री और सर्विस सेक्टर यानी बैंक, आईटी, दुकानें, हर सेक्टर में कुल कितना उत्पादन हुआ, उसे जोड़ा जाता है। दोनों तरीके अलग-अलग रास्ते से चलते हैं, हालांकि आखिर में जीडीपी का लगभग एक जैसा ही आंकड़ा देते हैं।

 

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गांव और किसान के लोग क्यों रह जाते हैं पीछे?

अगर फॉर्मूला देखेंगे तो जीडीपी में सबसे बड़ा हिस्सा उपभोग यानी लोगों का खर्च (C) होता है। यहीं से गांव-शहर का असली फर्क दिखता है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के आधिकारिक घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (HCES 2023-24) के मुताबिक, भारत के गांव में औसत मासिक प्रति व्यक्ति खर्च (MPCE) 4,122 रुपये था, जबकि शहरी भारत का यह आंकड़ा 6,996 रुपये था। 

 

सरकारी योजनाओं से मुफ़्त मिलने वाली चीजों (जैसे राशन) की कीमत जोड़ने पर यह आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्रों में 4,247 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 7,078 रुपये हो जाता है। यानी एक शहरी व्यक्ति का औसत खर्च, गांव के व्यक्ति के मुकाबले लगभग 70% ज़्यादा है। हालांकि यह अंतर साल 2011-12 के 84% से घटा है।

 

इसी सर्वे के मुताबिक भारत की सबसे गरीब 5% आबादी का औसत मासिक खर्च गांव में महज 1,677 रुपये और शहर में 2,376 रुपये है। वहीं सबसे अमीर 5% आबादी गांव में औसतन 10,137 रुपये और शहर में 20,310 रुपये खर्च करती है।

 

इसके अलावा, शहरी परिवारों की आमदनी ज्यादातर नौकरी, बिजनेस और सर्विस सेक्टर से आती है, तो उनका खर्च भी स्थिर रहता है। मोबाइल, गाड़ी, बाहर खाना, मनोरंजन जैसी चीजों पर भी इनका खर्च होता है। वहीं गांव में बड़ी आबादी की कमाई खेती पर टिकी है, जो मौसम, बारिश और फसल की कीमत जैसी अनिश्चित चीजों पर टिकी है। ऐसे में कमाई अनिश्चित होने से खर्च भी सीमित रहता है।  

 

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और भी हैं कारण

पहली वजह: अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 17% है, जबकि सरकार का लक्ष्य 25% का है। यही वह सेक्टर है जो गांव-कस्बों में सबसे ज्यादा नौकरियां दे सकता है। इसके पीछे रहने से गांव के लोगों के लिए खेती के बाहर रोजगार के मौके कम रह जाते हैं।

 

दूसरी वजह: जीडीपी के आंकड़े मुख्यत रजिस्टर्ड और टैक्स भरने वाले कारोबारों पर टिके होते हैं। जबकि गांव के छोटे कारोबारी, खेतिहर मजदूर और दिहाड़ी मजदूर अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं, जिनका योगदान ठीक से मापा ही नहीं जाता है।  

 

तीसरी वजह: इसके अलावा, विपक्ष के मुताबिक खुदरा महंगाई 19 महीने के उच्चतम स्तर पर है। चीनी, प्याज़, टमाटर, दाल, तेल, चावल, दूध जैसी रोज़मर्रा की चीज़ें महंगी हुई हैं, जिसका सबसे ज़्यादा असर सीमित आमदनी वाले गांव के परिवारों पर पड़ता है।

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