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26 जनवरी पर देते हैं 21 तोपों की सलामी, दगने वाला गोला जाता कहां है?

गणतंत्र दिवस पर हर साल 21 तोपों की सलामी दी जाती है। इन 21 तोपों से दगने वाले गोले किसी को भी दिखाई नहीं देते लेकिन धमाके की आवाज जरूर सुनाई देती है।

 21 top ki salami

21 तोपों की सलामी, Photo Credit: Social Media

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हर साल 26 जनवरी को जब देश गणतंत्र दिवस मनाता है, तो दिल्ली के कर्तव्य पथ पर होने वाले कार्यक्रम में 21 तोपों की सलामी दी जाती है। आजकल दिल्ली में गणतंत्र दिवस की तैयारियां चल रही हैं और दिल्ली वलों को यही 21 तोपों की आवाज सुनाई देती है। गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में 21 तोपों की सलामी जब दी जाती है तो वहां देशभक्ति का माहौल हो जाता है। 21 तोपों की सलामी उस समय दी जाती है जब राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं। झंडे के फहराते ही आसमान में तोपों की आवाज गूंजती है लेकिन लोगों को इन तोपों की सिर्फ आवाज ही सुनाई देती है, इन तोपों से दगने वाले गोलों का किसी को पता नहीं चलता। 

 

21 तोपों की सलामी को सम्मान का सबसे ऊंचा प्रतीक माना जाता है, जो किसी देश के राष्ट्राध्यक्ष या खास राष्ट्रीय अवसर पर दिया जाता है। भारत में गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति को यह सलामी दी जाती है। इस दौरान भारतीय सेना की विशेष टुकड़ी ऐतिहासिक तोपों से सलामी देती है। इसके अलावा कुछ खास मौकों पर जैसे किसी अन्य देश के राष्ट्राध्यक्ष के भारत आने पर भी 21 तोपों की सलामी दी जाती है। अब लोगों के मन में एक सवाल जरूर उठता है कि यह गोले जाते कहां हैं और क्या इससे कोई नुकसान नहीं होता। 

 

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कहां जाते हैं गोले?

गणतंत्र दिवस पर दी जाने वाली 21 तोपों की सलामी में असली गोले का इस्तेमाल नहीं होता। इसमें 'ब्लैंक राउंड' यानी खाली गोला दागा जाता है। इस गोले में बारूद तो होता है लेकिन उसके आगे कोई ठोस धातु या विस्फोटक नहीं लगाया जाता। इसका मकसद सिर्फ तेज आवाज पैदा करना होता है। इस आवाज के जरिए मेहमान यानी राष्ट्रपति के प्रति सम्मान जताया जाता है। जब सेना के जवान ब्लैंक राउंड दागते हैं तो केवल बारूद जलता है और गैस बाहर निकलती है। इससे जोरदार धमाके की आवाज आती है। इसमें कोई गोला हवा में उड़कर आगे नहीं जाता है। यही कारण है कि इस गोले से किसी को चोट लगने या नुकसान का खतरा नहीं होता।

धमाके में नहीं निकलता कोई गोला

21 तोपों की सलामी में असली गोले का इस्तेमाल नहीं होता। जब तोप से ब्लैंक राउंड दागा जाता है, तो उसमें से आग की लपट और धुएं का गुबार बाहर निकलता है। यह धुआं कुछ ही सेकेंड में हवा में घुल जाता है। अन्य गोलों में धमाके के बाद गोला गिरता है। आमतौर पर युद्ध में इस तरह के गोलों का इस्तेमाल होता है लेकिन यह उन तोपों से अलग है। इस तोप में कोई ठोस धातु नहीं होती और जब उसमें कोई धातु होती ही नहीं तो तोप से धुएं के अलावा कुछ भी नहीं निकलता। 

 

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तोप के अंदर बारूद को एक खोल यानी कार्ट्रिज में रखा जाता है। तोप से फायर होने के बाद यह खोल तोप में ही रह जाता है और इसके अंदर से बारूद जलकर धमाका करता है। सलामी देने के बाद सेना के जवान इस खोल को तोप के अंदर से निकाल लेते हैं। 

किन तोपों से दी जाती है सलामी?

भारत में कई आधुनिक तोपें भी मौजूद हैं लेकिन 21 तोपों की सलामी पारंपरिक तोपों से ही दी जाती है। आमतौर पर 21 तोपों की सलामी के लिए '105 मिमी लाइट फील्ड गन' से दी जाती हैं। ये तोपें युद्ध में इस्तेमाल नहीं कि जाती यानी चलन से बाहर हो चुकी हैं। इन्हें खास मौकों पर ही इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि इनका ऐतिहासिक महत्तव है। 

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