संविधान बनाने में 15 महिलाओं का भी योगदान, किसने, क्या कहा था?
भारतीय संविधान को लागू किए जाने की वर्षगांठ पर हर साल भारत अपना गणतंत्र दिवस मनाता है। क्या आप इस संविधान के निर्माण में महिलाओं की भूमिका जानते हैं?

संविधान सभा के सदस्य, Photo credit -AI Sora
26 जनवरी 2026 को भारत का हर नागरिक 77 वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। इसी दिन साल 1950 में भारत का संविधान लागू हुआ था। संविधान के लागू होते ही भारत आधिकारिक रूप से एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना। भारत के संविधान निर्माताओं ने एक ऐसा प्रभावशाली और दूरदर्शी संविधान तैयार किया, जो आज 77 साल बाद भी प्रासंगिक बना हुआ है। इससे यह साफ होता है कि संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्रता से पहले ही यह कल्पना कर ली थी कि आने वाले दशकों में भारत किस दिशा में आगे बढ़ेगा। इसी दूरदृष्टि के कारण इतना मजबूत और स्थायी संविधान बन सका।
भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ था लेकिन इसके बाद लगभग ढाई साल तक देश अंग्रेजी कानून व्यवस्था के तहत ही चलता रहा। 26 नवंबर 1949 को संविधान बन गया था। जिसे 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया। आज 2026 तक यह संविधान पूरी तरह बदला नहीं गया है, हालांकि समय-समय पर आवश्यक संशोधन किए गए हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारतीय संविधान विश्व के सबसे सशक्त और प्रभावशाली संविधानों में से एक है।
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अब सवाल यह उठता है कि आखिर वे संविधान निर्माता कौन थे, जिनके योगदान से इतना बेहतरीन संविधान बन पाया। भारतीय संविधान सभा में कुल 299 सदस्य शामिल थे। इन सदस्यों ने अपने ज्ञान, अनुभव और समर्पण से संविधान का निर्माण किया। संविधान सभा की एक विशेष बात यह थी कि इसमें 15 प्रतिभाशाली महिलाएँ भी शामिल थीं, जिन्होंने संविधान निर्माण में अमूल्य योगदान दिया। इन महिलाओं की भूमिका को अक्सर इतिहास में कम आंका गया है, जबकि उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा।
संविधान निर्माण में महिलाओं की भूमिका
संविधान सभा में महिलाओं की संख्या भले ही केवल 15 थी लेकिन उनका योगदान किसी भी दृष्टि से पुरुष सदस्यों से कम नहीं था। इनमें दलित महिला दक्षायनी वेलायुधन से लेकर जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित और राज घराने से आने वाली राजकुमारी अमृत कौर तक शामिल थीं। इन सभी महिलाओं ने अपने विचारों और अनुभवों से संविधान रूपी माला में महत्वपूर्ण कड़ियां जोड़ी।
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1. दक्षायनी वेलायुधन
दक्षायनी वेलायुधन संविधान सभा की एकमात्र दलित महिला सदस्य थीं। वह केवल 34 साल की उम्र में संविधान सभा की सदस्य बनीं। उन्होंने संविधान में जातिगत भेदभाव की समाप्ति और सामाजिक समानता पर विशेष बल दिया। दक्षायनी वेलायुधन एक ऐसे भारत की कल्पना करती थीं जहां समाज स्वतंत्र हो और जाति, वर्ग और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। उन्होंने संविधान सभा में कहा था, 'हम अस्पृश्यता से संबंधित प्रावधानों के बिना संविधान की कल्पना भी नहीं कर सकते, विशेषकर तब जब मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अंबेडकर स्वयं अस्पृश्य समुदाय से आते हैं।'
2. सुचेता कृपलानी
सुचेता कृपलानी स्वतंत्र भारत की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत थीं। वह 1963 में भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। 1963 से 1967 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। संविधान सभा में उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और राजनीतिक अधिकारों के लिए विशेष प्रावधानों पर जोर दिया।
3. हंसा मेहता
हंसा मेहता ने इंग्लैंड से पत्रकारिता और समाजशास्त्र की पढ़ाई की थी। वह एक प्रसिद्ध नारीवादी समाज सुधारक थीं। वह संविधान सभा की उन पहली महिलाओं में थीं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वह यूनेस्को की सदस्य भी रहीं। संविधान सभा में उन्होंने स्त्री-पुरुष समान अधिकार और समान नागरिकता पर विशेष बल दिया।
4. बेगम एजाज रसूल
बेगम एजाज रसूल संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं। वह पर्दा प्रथा का विरोध करती थीं। उन्होंने एक बार यह साफ तौर पर कहा था कि वह ऐसे घरों में नहीं जाएंगी जहां महिलाओं को पर्दे में रखा जाता है। संविधान सभा में उन्होंने स्त्री-पुरुष समानता और समान अधिकारों की वकालत की।
5. सरोजिनी नायडू
सरोजिनी नायडू एक प्रसिद्ध कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी और महिला अधिकारों की समर्थक थीं। वह कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं और महात्मा गांधी की निकट सहयोगी थीं। संविधान सभा में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया।
6. विजयलक्ष्मी पंडित
विजयलक्ष्मी पंडित, पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। वह भारत की पहली महिला कैबिनेट मंत्री बनीं। संविधान सभा में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अनुभवों के आधार पर भारत के लिए उपयुक्त प्रावधान सुझाए और महिलाओं की स्थिति मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया।
7. अम्मू स्वामीनाथन
अम्मू स्वामीनाथन मद्रास से संविधान सभा की सदस्य थीं। उन्होंने कहा था कि यह संविधान 40 करोड़ भारतीयों के सपनों को पूरा करने वाला दस्तावेज है।उन्होंने इस बात पर बल दिया कि केवल अधिकार लिख देना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें व्यवहार में भी लागू किया जाना चाहिए।
8. रेणुका रे
रेणुका रे ने संविधान सभा में प्रगतिशील तर्क पेश किया था। उन्होंने महिलाओं के आरक्षण का विरोध किया, यह मानते हुए कि आरक्षण महिलाओं के विकास में बाधा बन जाएगा है।
9. लीला राय
लीला राय ने बंगाल प्रांतीय कांग्रेस महिला संगठन की स्थापना की। वह महिलाओं के सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की प्रबल समर्थक थीं। संविधान सभा में उन्होंने महिलाओं की सामाजिक स्थिति को सशक्त बनाने पर जोर दिया।
10. एनी मस्कारेन
एनी मस्कारेन केरल से थीं और आगे चलकर केरल की पहली महिला सांसद बनीं। संविधान सभा में उन्होंने मजदूर वर्ग के अधिकारों की वकालत की।
11. दुर्गाबाई देशमुख
दुर्गाबाई देशमुख बचपन से ही समाजसेवा में सक्रिय थीं। वह पद्म विभूषण से सम्मानित की गईं। संविधान सभा में उन्होंने महिलाओं के लिए विशेष अधिकारों की माँग की।
12. कमला चौधरी
कमला चौधरी एक प्रसिद्ध लेखिका और समाजसेविका थीं। वह लोकसभा सदस्य और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की उपाध्यक्ष भी रहीं। उन्होंने संविधान में सामाजिक न्याय और महिला सशक्तीकरण की जोरदार पैरवी की।
13. पूर्णिमा बनर्जी
पूर्णिमा बनर्जी कांग्रेस की सचिव थीं और समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थीं। उन्होंने कमजोर वर्गों और महिलाओं के सामाजिक न्याय पर बल दिया।
14. मालनी चौधरी
मालनी चौधरी कांग्रेस की सक्रिय सदस्य थीं। संविधान सभा में उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला अधिकारों का समर्थन किया।
15. राजकुमारी अमृत कौर
राजकुमारी अमृत कौर एक राजघराने से थीं लेकिन सामाजिक कार्यों में गहरी रुचि रखती थीं। वह गोपाल कृष्ण गोखले से प्रेरित थीं। संविधान सभा में उन्होंने महिला अधिकारों, स्वास्थ्य और छुआछूत हटाने पर विशेष जोर दिया।
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