आज सुबह
सोनम वांगचुक
को पुलिस ने जबरन प्रोटेस्ट साइट से हटाकर सफदरजंग अस्पताल में शिफ्ट कर दिया। वांगचुक दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक के खिलाफ 20 दिनों से भूख हड़ताल कर रहे थे। आज सुबह जबरदस्ती पुलिस उन्हें सफेद चादर के पीछे छिपाते हुए ले जाती दिखी। करीब 42 साल पहले (1984) में ऐसा ही एक अनशन सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल ने किया था। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लेह पहुंचकर सोनम वांग्याल के अनशन को खत्म कराया था।
आज सोनम वांगचुक को जब जबरिया प्रोटेस्ट साइट से हटाया गया तो 1984 की ये घटना चर्चा में आ गई। इस घटना के बाद लोग वांग्याल के अनशन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिक्रिया की तुलना मौजूदा सरकार के रुख से कर रहे हैं।
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42 साल पुरानी अनशन की कहानी
करीब 42 साल पहले, 1984 में सोनम वांगचुक के पिता और लद्दाख के नेता दिवंगत सोनम वांग्याल ने लद्दाख के समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल किया था। उस समय इंदिरा गांधी खुद लेह पहुंची थीं। उन्होंने वांग्याल से मुलाकात कर उनकी मांग पर सकारात्मक कदम उठाने का भरोसा दिया था। इसके बाद सोनम वांग्याल ने अपना अनशन खत्म कर दिया। ऐतिहासिक अभिलेखों में यह जानकारी मिलती है।
आज सोनम वांग्याल का 1984 का अनशन फिर चर्चा में आ गया। आज सोनम वांगचुक के साथ हुए व्यवहार क दौरान कई नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने 1984 की घटना को याद किया। लोग उस समय इंदिरा गांधी के रवैये और मौजूदा सरकार के रुख की तुलना करते हुए अपनी-अपनी राय सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं।
इंदिरा गांधी ने दिया उनकी मांग पर विचार का भरोसा
सोशल मीडिया पर उस दौरान की तस्वीर भी शेयर की जा रही हैं, जब इंदिरा गांधी अनशन पर बैठे सोनम वांग्याल से मुलाकात की थी। उस समय इंदिरा गांधी ने वांग्याल को भरोसा दिया था कि उनकी मांग पर विचार किया जाएगा। इसके बाद वह अनशन खत्म करने के लिए तैयार हो गए थे। साल 1989 में लद्दाख के समुदायों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा भी मिल गया था।
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पवन खेड़ा ने भी सरकार के रवैये पर उठाए सवाल
वांग्याल और वांगचुक के आंदोलनों के प्रति सरकारों की प्रतिक्रिया की तुलना पवन खेड़ा ने भी सार्वजनिक रूप से की। जंतर-मंतर पर वांगचुक से मुलाकात के बाद उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करना संविधान प्रदत्त अधिकार है। अनशन कर रहे लोगों से संवाद करना सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने लिखा, ‘1984 में इंदिरा गांधी ने यही किया था। 2011 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने भी यही किया था।’