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मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण; कितनी आय, कहां होता खर्च, क्या है विवाद?

भारत में लाखों मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण है जिसकी आय का बड़ा हिस्सा सरकार के पास जाता है। सरकार इसे कई बार गैर-धार्मिक कार्यों के लिए भी करती है।

Sabrimala Temple । Photo Credit: PTI

सबरीमाला मंदिर । Photo Credit: PTI

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भारत की लगभग 80 प्रतिशत भारी-भरकम आबादी के लिए मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक केंद्र रहे हैं। ऐसे में मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का मुद्दा लंबे समय से विवादों का केंद्र रहा है। हाल ही में, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर को अपने नियंत्रण में लेने के लिए "उत्तर प्रदेश श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास अध्यादेश, 2025" लागू किया, जिसे राज्यपाल की मंजूरी भी मिल चुकी है। इस अध्यादेश के तहत 18 सदस्यों वाला एक ट्रस्ट बनाया गया है, जिसमें 11 नामित और 7 पदेन सदस्य शामिल हैं, जैसे मथुरा के डीएम और एसएसपी। इस कदम से मंदिर के प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ गया है, जिसे लेकर विश्व हिंदू परिषद (VHP) और अन्य हिंदू संगठनों ने विरोध जताया है। यह कदम उस व्यापक बहस का हिस्सा है, जिसमें मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन माना जा रहा है, जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं।

 

मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का इतिहास ब्रिटिश काल से शुरू होता है, जब 19वीं सदी में अंग्रेजों ने मंदिरों की संपत्ति को नियंत्रित करने के लिए कई कानून बनाए। स्वतंत्र भारत में भी यह सिलसिला जारी रहा, खासकर हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1951 के जरिए। ऐसे में खबरगांव आपको भारत में मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की प्रकृति, नियंत्रित मंदिरों की संख्या, उनकी आय और खर्च, प्रशासन की प्रक्रिया, अन्य धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण की स्थिति, और इससे जुड़े कानूनी और सामाजिक विवादों का विस्तृत विश्लेषण कर रहा है।

 

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ब्रिटिश काल से ही मंदिरों पर नजर

भारत में मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की शुरुआत ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में हुई। 19वीं सदी में, अंग्रेजों ने मंदिरों को सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव और धन व संपत्ति के खजाने के रूप में देखा। 1810 से 1817 तक, बंगाल, मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसियों में कई कानून बनाए गए, जिन्होंने मंदिर प्रशासन में हस्तक्षेप का अधिकार सरकार को दिया। 1863 में धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम ने मंदिरों का नियंत्रण समितियों को सौंपा, लेकिन सरकारी निगरानी बनी रही। 1925 में मद्रास हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम ने मंदिरों की संपत्ति और प्रशासन पर सरकारी नियंत्रण को औपचारिक रूप दिया। स्वतंत्र भारत में, 1951 में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम ने राज्यों को मंदिरों की संपत्ति, आय, और प्रशासन नियंत्रित करने का अधिकार दिया।

 

कितने मंदिर सरकारी नियंत्रण में?

2011 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में लगभग 9 लाख सनातन हिंदू मंदिर हैं। इनमें से करीब 4 लाख मंदिर 15 राज्यों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकारी नियंत्रण में हैं। तमिलनाडु में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR&CE) के तहत 35,000 मंदिर हैं, जो देश में सबसे ज्यादा हैं। आंध्र प्रदेश में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (TTD) जैसे निकाय तिरुपति मंदिर को चलाते हैं, जिसका नेतृत्व राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी करते हैं। कर्नाटक, केरल, और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी हजारों मंदिर सरकारी बोर्डों या ट्रस्टों के अधीन हैं।

 

मंदिरों की आय और खर्च

मंदिरों की आय मुख्य रूप से भक्तों के दान, भूमि के किराए, और अन्य गतिविधियों से आती है। उदाहरण के लिए तिरुमला तिरुपति मंदिर की सालाना आय 3,000-4,000 करोड़ रुपये है। 1933 से सरकारी नियंत्रण में होने के कारण इसका अब तक का राजस्व 1.8-2 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। वहीं केरल के शबरीमला मंदिर की बात करें तो इसकी सालाना आया 300-4000 करोड़ रुपये है। इस पर 1950 से सरकारी नियंत्रण है। महाराष्ट्र के शिरडी साईं मंदिर की सालाना आय़ लगभग 300 करोड़ रुपये है, जो कि 1922 से सरकारी नियंत्रण में है।


प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक में 1997 से 2002 के बीच मंदिरों से 391 करोड़ रुपये की आय हुई, जिसमें से केवल 21.4% (84 करोड़) मंदिरों के रखरखाव पर खर्च हुआ। 46% (180 करोड़) मदरसों और हज के लिए, और 11.2% (44 करोड़) चर्चों के लिए खर्च हुआ। इसी तरह से तमिलनाडु में मंदिरों की आय का 14% प्रशासनिक शुल्क, 4% ऑडिट शुल्क, 25-40% कर्मचारियों के वेतन, और 4-10% 'कॉमन गुड फंड' में जाता है। एक आंकड़े के मुताबिक 65-70% आय गैर-मंदिर उद्देश्यों, जैसे सरकारी योजनाओं (मुफ्त भोजन, विवाह), में खर्च होती है।

 

कुल मिलाकर, दक्षिण भारत के मंदिरों के पास 24 लाख एकड़ कृषि भूमि और 100 करोड़ वर्ग फुट शहरी औद्योगिक भूमि है। हालांकि, सरकारी नियंत्रण के कारण इस संपत्ति का बड़ा हिस्सा या तो अवैध कब्जे में चला गया या गैर-धार्मिक कार्यों में खर्च हुआ। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में 1986-2017 के बीच मंदिरों की 50,000 एकड़ भूमि पर अवैध कब्जा हुआ।


कैसे होता है सरकारी प्रशासन

मंदिरों का प्रशासन सरकारी बोर्डों या ट्रस्टों के जरिए होता है, जिनमें सरकारी अधिकारी या सरकार द्वारा नियुक्त लोग शामिल होते हैं। तमिलनाडु HR&CE विभाग मंदिरों की आय, खर्च, और ट्रस्टी नियुक्तियों को नियंत्रित करता है। वहीं आंध्र प्रदेश में TTD जैसे निकाय मंदिरों का प्रबंधन करते हैं, लेकिन प्रमुख की नियुक्ति राज्य सरकार करती है। इसी तरह से उत्तर प्रदेश के बांके बिहारी मंदिर के लिए नया ट्रस्ट बनाया गया है, जिसमें सरकारी अधिकारी शामिल हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। इन बोर्डों का तर्क है कि वे भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन रोकते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि सरकारी हस्तक्षेप से मंदिरों की परंपराएं और आध्यात्मिकता प्रभावित होती हैं।

 

अन्य धार्मिक संस्थाओं की क्या है स्थिति

हिंदू मंदिरों के विपरीत, अन्य धार्मिक संस्थाएं जैसे मस्जिदें, चर्च, और गुरुद्वारे ज्यादातर स्वायत्त हैं यानी कि इन पर सरकार का नियंत्रण नहीं है। मस्जिदों का प्रबंधन वक्फ बोर्ड के तहत होता रहा है, जो मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा चलाया जाता है। सरकार का सीधा हस्तक्षेप इसमें नहीं होता। हालांकि, वक्फ बोर्ड में कई तरह के बदलावों के बाद अब इसका स्वरूप भी बदलेगा। चर्च की बात करें तो इस प्रबंधन और संचालन ईसाई समुदाय के ट्रस्ट या संगठन स्वतंत्र रूप से प्रबंधन करते हैं और गुरुद्वारे का प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (SGPC) और दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी (DSGMC) जैसे स्वायत्त निकायों द्वारा किए जाते हैं जिनका चुनाव सिखों द्वारा किया जाता है। जैन और बौद्ध मंदिरों पर भी कुछ राज्यों में सीमित सरकारी नियंत्रण है, लेकिन हिंदू मंदिरों की तुलना में यह कम है। यह असमानता संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 26 (धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन की स्वतंत्रता) का उल्लंघन मानी जाती है।

 

कानूनी और अन्य विवाद

मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को लेकर कई कानूनी और सामाजिक विवाद हैं। आलोचकों का कहना है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन है। शिरूर मठ केस (1954) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धार्मिक संस्थाओं को अनुच्छेद 26 के तहत अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार है, बशर्ते यह सार्वजनिक व्यवस्था के खिलाफ न हो। इसी तरह से चिदंबरम नटराज मंदिर केस (2014) में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का आदेश दिया, लेकिन कई राज्यों ने इसका पालन नहीं किया।

 

आय का दुरुपयोग

इसके अलावा मंदिरों की संपत्ति या उसके द्वारा प्राप्त आय का एक बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा गैर-धार्मिक कार्यों में या यहां तक कि दूसरे धर्मों के लिए खर्च किया जाता है जो कि विवाद का एक विषय है। उदाहरण के लिए कर्नाटक में मंदिर के प्राप्त धन का मदरसों और हज के लिए खर्च करने का मामला सामने आया था जिससे हिंदू धर्म के लोगों में असंतोष पैदा हुआ। इसके अलावा तिरुपति मंदिर के प्रसाद में मिलावट के हालिया विवाद ने भी सरकारी प्रबंधन पर सवाल उठाए।

 

मूर्तियों और संपत्ति की चोरी

तमिलनाडु में मंदिरों की 50,000 एकड़ भूमि पर अवैध कब्जा और श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर से 200 करोड़ रुपये के गहनों की चोरी ने सरकारी कुप्रबंधन को उजागर किया। इसके अलावा खाली मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण होना धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर भी सवाल खड़े करता है। इसी को आधार बनाकर विश्व हिंदू परिषद जैसे कई हिंदू संगठन मंदिरों को स्वायत्त करने की मांग कर रहे हैं। कर्नाटक में 2024 में कांग्रेस सरकार ने 1 करोड़ रुपये से अधिक आय वाले मंदिरों पर 10% कर लगाने का प्रस्ताव दिया, जिसका बीजेपी ने विरोध किया।

 

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मंदिरों की आर्थिक भूमिका

मंदिर भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। 2022 में काशी विश्वनाथ धाम में 10 करोड़ से ज्यादा तीर्थयात्री आए, जिससे होटल, परिवहन, और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा मिला। चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का आधार है। धार्मिक क्षेत्र 35 करोड़ लोगों को रोजगार देता है, जो केंद्र और राज्य सरकारों की कुल नौकरियों (3.5 करोड़) से 10 गुना ज्यादा है।

 

मंदिर को मुक्त कराने की मुहिम

विश्व हिंदू परिषद सहित अन्य कई हिंदूवादी संगठन मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग कर रहे हैं। #FreeHinduTemples अभियान सोशल मीडिया पर कई बार ट्रेंड किया। हिंदू संगठनों का कहना है कि मंदिरों का प्रबंधन भक्तों और संप्रदायों को सौंपा जाना चाहिए।

 

मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का मुद्दा न केवल धार्मिक स्वतंत्रता, बल्कि संवैधानिक समानता और आर्थिक पारदर्शिता से जुड़ा हुआ माना जाता  है। बांके बिहारी मंदिर जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि सरकारें मंदिरों के प्रबंधन में हस्तक्षेप बढ़ा रही हैं। जबकि अन्य धार्मिक संस्थाएं स्वायत्त हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बावजूद, मंदिरों की संपत्ति के दुरुपयोग और कुप्रबंधन के कई मामले सामने आए हैं।

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