लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और इंजीनियर सोनम वांगचुक एक बार फिर अपने अनशन को लेकर चर्चा में हैं। वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 18 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं। वह परीक्षा पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, लगातार उपवास के कारण उनकी सेहत बिगड़ रही है। उनका वजन करीब 8.5 किलोग्राम कम हो चुका है और समर्थक लगातार उनसे अनशन समाप्त करने की अपील कर रहे हैं।
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब वांगचुक ने भूख हड़ताल का रास्ता चुना हो। इससे पहले मार्च 2024 में उन्होंने 'सेव लद्दाख' अभियान के तहत 21 दिनों का 'क्लाइमेट फास्ट' किया था। इसके बाद अक्टूबर 2024 में उन्होंने 16 दिनों तक अनशन किया। दोनों बार उनकी प्रमुख मांगें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी थीं लेकिन सरकार ने उनकी मांगें स्वीकार नहीं कीं।
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आजादी के आंदोलन से जुड़ा है अनशन का इतिहास
भारत में भूख हड़ताल या अनशन को जनता के बीच सबसे असरदार और नैतिक विरोध का तरीका बनाने का श्रेय महात्मा गांधी को दिया जाता है। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अहिंसक सत्याग्रह के तहत कई बार अनशन किया। वहीं, 1929 में शहीद भगत सिंह और उनके साथियों ने लाहौर और मियांवाली जेल में 116 दिनों तक ऐतिहासिक भूख हड़ताल की थी। आजादी के बाद भी कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकार के फैसलों के विरोध में अनशन को अपनी लड़ाई का बड़ा हथियार बनाया।
सरकार को झुकाने वाले बड़े अनशन
आजादी के बाद भी अनशन ने देश की राजनीतिक दिशा बदलने और सरकारों को फैसले बदलने पर विवश करने में बड़ी भूमिका निभाई है।
- पोट्टि श्रीरामुलु (1952): तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर इन्होंने 56 दिनों तक आमरण अनशन किया। 56 दिनों के बाद उनका निधन हो गया। उनके बलिदान के बाद सरकार को भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश का गठन करना पड़ा।
- मास्टर तारा सिंह (1961): पंजाबी भाषी राज्य की मांग को लेकर किया गया इनका 48 दिनों का अनशन आगे चलकर 1966 में पंजाब के पुनर्गठन का आधार बना।
- के. चंद्रशेखर राव (2009): अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर किया गया इनका 11 दिनों का अनशन इतना प्रभावी रहा कि केंद्र सरकार को नए राज्य के गठन की घोषणा करनी पड़ी।
- अन्ना हजारे (2011): भ्रष्टाचार के खिलाफ जंतर-मंतर पर किए गए इनके 11 दिनों के ऐतिहासिक अनशन के आगे सरकार झुकी और 'जन लोकपाल बिल' ड्राफ्ट करने के लिए संयुक्त कमेटी बनाई गई।
- मनोज जरांगे पाटिल (2023-24): मराठा आरक्षण के लिए किए गए इनके अनशन के बाद सरकार को योग्य मराठाओं को 'कुनबी प्रमाण पत्र' जारी करने का भरोसा देना पड़ा।
- जगजीत सिंह डल्लेवाल (2024-25): फसलों पर एमएसपी (MSP) की कानूनी गारंटी के लिए इनका अनशन करीब 123 दिनों तक चला, जिसके बाद केंद्र सरकार को किसान नेताओं के साथ ठोस बातचीत की मेज पर आना पड़ा।
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कुछ भूख हड़तालें रह गईं अधूरी
अधिकारों की इस लड़ाई में कई बार आंदोलनकारियों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी या मांगें पूरी तरह नहीं मानी गईं। साल 2011 में गंगा को अवैध खनन से बचाने के लिए स्वामी निगमानंद सरस्वती ने 115 दिनों का लंबा अनशन किया और अपने प्राण त्याग दिए। वहीं, मणिपुर से अफस्पा (AFSPA) हटाने के लिए इरोम शर्मिला ने 16 साल (2000-2016) तक दुनिया का सबसे लंबा भूख हड़ताल वाला संघर्ष किया, हालांकि यह कानून पूरी तरह से नहीं हट सका। इसके अलावा मेधा पाटकर ने भी 2019 में 9 दिनों तक सरदार सरोवर बांध से प्रभावित ग्रामीणों के पुनर्वास के लिए आवाज उठाई थी। नौवें दिन मध्य प्रदेश सरकार से आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने अपना अनशन खत्म किया।