सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क्रिकेट एडमिनिस्ट्रेशन और पॉलिटिक्स के पुराने खिलाड़ी अनुराग सिंह ठाकुर को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के कामों में हिस्सा लेने पर पर लगा बैन हटा दिया है। इस फैसले से बीसीसीआई के पूर्व प्रेसिडेंट के भारतीय क्रिकेट में वापसी का रास्ता साफ हो गया है।
सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने डॉक्ट्रिन ऑफ प्रोपोर्शनलिटी का जिक्र किया। कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी मामले में सजा उतनी ही कड़ी होनी चाहिए जितनी जरूरी हो। अपने ऑर्डर में, बेंच ने कहा, 'लाइफटाइम बैन लगाने का कोई इरादा नहीं है, और न ही इस मामले में यह जरूरी है।'
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कोर्ट ने अपने 2 जनवरी 2017 के फैसले के पैराग्राफ 25(ii) में संशोधन करते हुए कहा कि अनुराग ठाकुर अब BCCI के नियमों और प्रक्रियाओं के तहत बोर्ड के कामकाज में हिस्सा लेने के लिए स्वतंत्र होंगे।
9 साल बाद मिली राहत
अनुराग ठाकुर के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने लगभग नौ वर्षों तक इस प्रतिबंध का सामना किया है, जो काफी लंबा समय है। इसे आगे जारी रखना उनके लिए अन्यायपूर्ण होगा। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए यह भी ध्यान में रखा कि अनुराग ठाकुर पहले ही अपनी गलतियों के लिए बिना शर्त माफी मांग चुके हैं, जिसे अदालत ने पहले ही मंजूर कर लिया था। इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि अब प्रतिबंध को और खींचने की कोई जरूरत नहीं है।
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क्या था पूरा विवाद?
विवाद की शुरुआत साल 2017 में हुई थी, जब जस्टिस लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू करने को लेकर खींचतान चल रही थी। अनुराग ठाकुर पर आरोप था कि उन्होंने आईसीसी (ICC) को पत्र लिखकर सुधारों को रोकने के लिए हस्तक्षेप करने को कहा था। इसके बाद उन पर अवमानना और झूठा बयान देने के आरोप लगे थे, जिसके कारण उन्हें बीसीसीआई अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा था और उन पर कामकाज में हिस्सा लेने से रोक लगा दी गई थी।