ट्रांसजेंडर: संसद से इतिहास के पन्नों तक, कहानी अनसुनी क्यों रही?
ट्रांसजेंडर विधेयक चर्चा में है। संसद से यह पास हो गया है। विधेयक पर देश में हंगामा बरपा है, ट्रांसजेंडर समुदाय नाराज है। फ्राइडे रिलीज के इस अंक में पढ़िए कहानी ट्रांसजेंडर समुदाय की।

अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे लोग, Photo Credit: Khabargaon
ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट बिल, 2026 पास संसद के दोनों सदनों से से पारित हो गया है। अब इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा और उनके दस्तखत के बाद यह कानून बन जाएगा। नए विधेयक को लेकर विपक्ष के कई दलों ने ऐतराज जताया है। विपक्ष का कहना है कि बिना ट्रांसजेंडर समुदाय से बातचीत किए, सरकार विधेयक लेकर आई है, जो उनके अधिकारों को छीनती है।
ट्रांसजेंडर तबके का कहना है कि सरकार ने ट्रांसजेंडर की परिभाषा जैविक और शारीरिक संकेतकों के आधार पर कर दी है, जबकि एक व्यक्ति, स्त्री, पुरुष या थर्ड जेंडर, क्या महसूस करता है, यह उसकी निजी राय है। केंद्र सरकार का पक्ष है कि इससे, ट्रांसजेंडर समुदाय में होने वाली जबरिया घुसपैठ रुकेगी, उन्हें ज्यादा अधिकार मिलेंगे।
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेन्द्र कुमार ने इस विधेयक की तारीफ की है। उन्होंने कहा है कि विधेयक का मकसद, समुदाय को सुरक्षा और लाभ देना है। लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचे, इसलिए सटीक परिभाषा तय करनी जरूरी है। ट्रांस समुदाय को ऐतराज है कि व्यक्तिगत, लैंगिक पहचान में सरकारी घुसपैठ क्यों की गई है।
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किन दलों ने ऐतराज जताया है और क्यों?
प्रियंका गांधी, सांसद, कांग्रेस:-
मुझे सच में लगता है कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे इसे स्टैंडिंग कमिटी के पास नहीं भेज रहे हैं। समुदाय को लगता है कि यह बिल उनकी पहचान को मिटा देगा। यह बहुत-बहुत जरूरी था कि उनसे सलाह ली जाती। यह बिल, उचित सलाह-मशविरे के बाद ही लाया या पास किया जाता। मुझे लगता है कि यह बहुत ही अनुचित है कि पूरे समुदाय को ऐसा महसूस हो रहा है कि उनसे कोई सलाह नहीं ली गई है। उनके संदर्भ में इतना बड़ा फैसला लिया जा रहा है। काश सरकार ने उनकी बात सुनी होती और इसे स्टैंडिंग कमिटी के पास भेजा होता।
कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कझगम, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरद पवार), शिवसेना (UBT), आरजेडी, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने विधेयक का विरोध किया है। विपक्ष का कहना है कि यह विधेयक, ज्यादा क्रूर और दमनकारी है। सु्प्रीम कोर्ट ने NALSA जजमेंट 2014 में जो कहा था, उस फैसले का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक पहचान को 'स्व निर्धारण' का अधिकार दिया था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब था कि आप तय करेंगे, आप ट्रांस, बाईसेक्सुअल, लेस्बियन, गे, क्वीर क्या अपने आपको को समझते हैं। किस लैंगिक खांचे में आप खुद को देखना चाहते हैं, यह अधिकार सिर्फ आपका होगा।'
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आनंद भदौरिया, सांसद, समाजवादी पार्टी:-
यह ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ पूरी तरह से विश्वासघात है। वे इसका विरोध कर रहे थे। सदन के अंदर विपक्ष के सभी सदस्यों ने जोर देकर कहा कि इस बिल को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा जाए। यह बिल समाज के एक वर्ग के खिलाफ है। उनकी जो आशंकाएं हैं, वे आने वाले समय में कहीं न कहीं सच साबित होंगी। सरकार ने सदन में कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया, इसलिए पूरे विपक्ष ने वॉकआउट कर दिया।
कांग्रेस सांसद ज्योतिमणि ने आरोप लगाया कि बिल ट्रांसजेंडर समुदाय से बिना परामर्श के लाया गया है और इसमें मेडिकल बोर्ड के जरिए पहचान तय करना असंवैधानिक है।
विपक्ष क्या चाहता है?
विपक्ष ने मांग की है कि बिल को स्थायी समिति को भेजकर समुदाय से व्यापक परामर्श किया जाए। बिना ट्रांस समुदाय से बातचीत के इस विधेयक को पास करना, उन पर जबरन थोपने जैसा है। कानूनी तौर पर इसका दुरुपयोग और दोहन हो सकता है।
सरकार क्यों बचाव कर रही है?
हेमांग जोशी, सांसद, BJP:-
विपक्ष को हर बात का विरोध करने की बुरी आदत पड़ गई है, फिर चाहे मामला समाज के हित का ही क्यों न हो। यह एक ऐसा बिल था जिसका सभी को एकमत होकर समर्थन करना चाहिए था; विपक्ष ने अपनी बातें रखीं, लेकिन जब वोटिंग की बारी आई तो वे सदन से बाहर चले गए। आज यह बिल सर्वसम्मति से पास हो गया है।
सरकार और बीजेपी ने बिल का समर्थन करते हुए कहा कि स्व-निर्धारित पहचान से आरक्षण और अन्य लाभों का दुरुपयोग हो सकता है। विधेयक में कहा गया है कि यह कानून, अलग-अलग जेंडर पहचान, खुद से घोषित की गई लैंगिक पहचान को शामिल नहीं करता है। यह केवल, पांरपरिक रूप से भेदभाव का शिकार ट्रांस समुदाय के हितों की रक्षा कर रहा है। विधेयक में बच्चों पर होने वाले अपराधों के लिए गंभीरता के अनुसार दंड का प्रावधान भी किया गया है।
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ट्रांसजेंडर समुदाय को एतराज क्या है?
'पहचान पर खतरा है विधेयक'
ट्रांस समुदाय का कहना है कि नए विधेयक में सरकार ने लोगों से अपना जेंडर खुद चुनने का अधिकार छीन लिया है। विधेयक में स्त्री या पुरुष या तीसरे लिंग के तौर पर अपनी पहचान खुद चुनने वाले प्रावधान को हटा दिया गया है। नया विधेयक, 'सेल्फ-परसीव्ड जेंडर आइडेंटिटी' को ही हटा रहा है, जो गलत है। इस विधेयक के आने के बाद देशभर में ट्रांसजेंडर समुदाय में गुस्सा है।
NALSA का फैसले को पलटने पर ऐतराज
सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट विशाल अरुण मिश्र ने कहा, 'साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने NALSA फैसले में कहा था कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति अपनी लैंगिक पहचान खुद तय कर सकते हैं। स्त्री, पुरुष या थर्ड जेंडर, खुद को जिस भी रूप में वे देखते हैं, उन्हें यह तय करने का अधिकार है कि उनकी लैंगिक पहचान क्या होगा। उन्हें पुरुष, महिला या थर्ड जेंडर में से कोई भी चुनने की आजादी है। इसके लिए कोई सर्जरी या मेडिकल टेस्ट जरूरी नहीं है। 2026 का नया संशोधन विधेयक इस फैसले के खिलाफ जाता दिख रहा है।'
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विशाल अरुण मिश्रा, एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड, सुप्रीम कोर्ट:-
ट्रांसजेंडर विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा बदल दी गई है। अब इसमें सिर्फ वे लोग शामिल होंगे जिनकी समस्या जन्मजात, सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से है। ट्रांसमेन, ट्रांसवुमेन और जेंडरक्वीर लोगों को बाहर कर दिया गया है।
जेंडरक्वीर कम्युनिटी क्या है?
जेंडरक्वीर उन लोगों को कहते हैं, जिनकी लैंगिक पहचान, पुरुष, महिला या किसी बाइनरी में फिट नहीं होती है। इस समुदाय के लोग, पुरुष, महिला, बाइसेक्सुअल, नॉन बाइनरी या जेंडर नॉन कन्फर्मिंग के तौर पर खुद को समझते हैं। समुदाय के लोग स्त्री, पुरुष, तीसरे लिंग से इतर अपनी पहचान मानते हैं।
'अधिकारी तय करेंगे, आपका स्त्री, पुरुष या ट्रांस हैं'
नए ट्रांसजेंडर विधेयक में साफ-साफ कहा गया है कि अलग-अलग लैंगिक रुझान वाले, स्वघोषित ट्रांसजेंडर को ट्रांसजेंडर नहीं माना जाएगा। साल 2019 के कानून में जहां ट्रांसजेंडर समुदाय को यह अधिकार था कि वह तय करे कि उसकी लैंगिक पहचान क्या होगी, वह उसी आधार पर अपना लिंग चुनकर जिला मजिस्ट्रेट से प्रमाणपत्र ले सकता था। नए विधेयक में यह अधिकार खत्म हो गया है। अब जिला मजिस्ट्रेट मेडिकल बोर्ड की सलाह पर फैसला करेगा कि आपकी लैंगिक पहचान क्या होगी। आपकी जेंडर आइडेंटिटी, अब डॉक्टर और अधिकारी तय करेंगे, आप खुद नहीं तय कर सकते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2025 में जेन कौशिक मामले में 2019 के कानून की आलोचना की थी। जेन कौशिक, पेशे से शिक्षक हैं। जब उन्होंने बताया कि वह ट्रांस समुदाय से हैं तो स्कूलो ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लैंगिक पहचान के आधार पर किसी को उसकी नौकरी से नहीं निकाला जा सकता है। कोर्ट ने जुर्माना भी लगाया था।
सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि यह कागजी कानून बनकर रह गया है, सरकारें और संस्थान दोनों इसे नहीं मान रहे हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा था कि केंद्र और राज्य सरकारें ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट, 2019 और 2020 के नियमों को ठीक से लागू करने में नाकाम रहीं हैं।
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ट्रांस समुदाय को पीड़ित बनाकर पेश कर रही सरकार
ट्रांसजेंडर विधेयक में सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि विधेयक में ट्रांसजेंडर समुदाय को पीड़ित बनाकर पेश कर रही है। ट्रांस समुदाय ने इस समुदाय का हिस्सा होने चुना है, उन्हें बराबरी का हक चाहिए, वे पीड़ित नहीं हैं। सरकार का कहना है कि इससे ट्रांसजेंडर समुदाय की सुरक्षा होगी। समुदाय का आरोप है कि विधेयक ट्रांसजेंडर लोगों को पीड़ित के रूप में पेश कर रहा है। इससे उनकी गरिमा और स्वतंत्रता दोनों पर असर पड़ेगा।
सरकार नया कानून क्यों लाई है?
सरकार का तर्क है कि पुराना कानून अस्पष्ट था। शादी, संपत्ति और परिवारिक कानून जैसे मुद्दों में अड़चनें आ रहीं थीं। आलोचकों का कहना है कि समस्या का जैसा हल निकाला गया है, वह ट्रांस समुदाय के हितों पर प्रहार है। लोकसभा में यह विधेयक 23 मार्च 2026 को पास हो गया है। अब राज्यसभा में जाने वाला है। ट्रांस समुदाय इस बिल कि विरोध में है। समुदाय के लोग इस बदलाव को अपनी पहचान पर हमला मान रहे हैं। उन्होंने इसका विरोध तेज कर दिया है। कई राज्यों में नए विधेयक को लेकर प्रदर्शन भी हुए है।
एक नजर में पूरा विधेयक समझिए, जिस पर बवाल मचा
लोकसभा में 13 मार्च को ट्रांसजेंडर विधेयक पेश हुआ था। मंगलवार को इसे लोकसभा ने पास कर दिया। यह विधेयक, 2019 के ट्रांसजेंडर कानून में बदलाव लेकर आया है।
ट्रांसजेंडर की नई परिभाषा: ट्रांसजेंडर विधेयक में ट्रांसजेंडर की परिभाषा बदली गई है। ट्रांसमैन, ट्रांसवुमन और जेंडरक्वियर को ट्रांसजेंडर की परिभाषा से बाहर किया गया है। अब सिर्फ हिजड़ा, किन्नर, अरावानी, जोगता जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले लोगों, जन्म से शारीरिक विशेषताओं वाले लोगों को ट्रांसजेंडर माना जाएगा।
- शारीरिक आधार पर पहचान: जिन लोगों के जननांगों, हार्मोन और क्रोमोसोम की वजह से शारीरिक बदलाव दिख रहे हों, उन्हें इस समुदाय में रखा गया है। जिन लोगों को जबरन ट्रांसजेंडर बनाया गया है, प्राइवेट पार्ट काटा गया है, हार्मोन थेरेपी या सर्जरी की गई है, उन्हें ट्रांसजेंडर कहा जाएगा।
- जेंडर के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट: यह विधेयक साफ कहता है कि सेक्सुअल ओरिएंटेशन या अपनी धारणा के आधार पर कोई व्यक्ति ट्रांसजेंडर नहीं माना जाएगा। पहचान प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार अब सिर्फ जिला मजिस्ट्रेट के पास के पास नहीं रहेगा। पहले चीफ मेडिकल ऑफिसर की अध्यक्षता में मेडिकल बोर्ड की सिफारिश जरूरी होगी।
- सर्जरी के लिए भी बदल गए नियम: बोर्ड जांच के बाद ही प्रमाणपत्र जारी होगा। इस प्रमाणपत्र के आधार पर जन्म प्रमाणपत्र और अन्य सरकारी दस्तावेजों में पहला नाम बदला जा सकेगा। अगर कोई व्यक्ति सर्जरी कर जेंडर बदलता है तो उसे नया प्रमाणपत्र लेना अनिवार्य होगा। अस्पताल को सर्जरी की जानकारी जिला मजिस्ट्रेट को देनी होगी।
- जबरन ट्रांसजेंडर बनाना अपराध: बिल में जबरन ट्रांसजेंडर बनाने के खिलाफ नई और कड़ी धाराएं जोड़ी गई हैं। जबरन ट्रांसजेंडर बनाने के लिए अपहरण करने या गंभीर चोट पहुंचाने पर गड़ी सजाएं तय की गईं हैं। अगर यह काम कोई वयस्क पीड़ित के साथ होता है तो दोषी को 10 साल से आजीवन कारावास और कम से कम 2 लाख जुर्माना देना होगा। अगर पीड़ित बच्चा तो है जबरन ट्रांस बनाने वाले समुदाय को आजीवन कारावास की सजा होगी, कम से कम 5 लाख जुर्माना लगेगा।
- भीख मंगवाना, बंधुआ मजदूरी अपराध: अगर कोई जबरन भीख मंगवाता है या बंधुआ मजदूरी कराता है तो भी कड़ी सजा मिलेगी। अगर पीड़ित वयस्क है तो 5 से 10 साल की सजा, कम से कम 10 लाख का जुर्माना देना होगा। अगर पीड़ित बच्चा है तो 10 से 14 साल की सजा मिल सकती है, कम से कम 3 लाख रुपये का जुर्माना लग सकता है।
LGBTQIA+ समुदाय है क्या?
- लेस्बियन: महिला जब, महिलाओं के प्रति आकर्षित हो।
- गे: पुरुष, जब पुरुष के प्रति आकर्षित हो।
- बाइसेक्सुअल: महिला और पुरुष, दोनों में रुचि हो।
- ट्रंसजेंडर: ऐसे लोग, जिनकी लैंगिक पहचान, जन्म के पहचान से अलग हो।
- क्वीर: स्त्री, पुरुष, तीसरे लिंग की बाइनरी से अलग जो अपना अस्तित्व देखते हों।
- इंटरसेक्स: शारीरिक वजहों से स्त्री और पुरुष किसी एक दायरे में फिट न होना।
- एसेक्शुअल: ऐसे लोग, जिन्हें सेक्स में कोई दिलचस्पी नहीं होती है।
ट्रांसजेंडर शब्द का इतिहास क्या है?
जब से मानव सभ्यता है, तब से ट्रांसजेंडर अस्तित्व में हैं। भारतीय धर्म ग्रंथों में यह समुदाय, वैदिक काल से है। रामायण और महाभारत की कहानियों में इनका जिक्र आता है। इक्ष्वाकु, शाक्य, चंद्रवंशी, मौर्य वंश, गुप्त वंश, मुगल, चोल, चालु और मराठा जैसे साम्राज्यों के दौरान भी यह समुदाय रहा है। मिस्र जैसे देशों में 1200 ईसा पूर्व तक, इनका विवरण मिलता है।
किट हेयम अपनी किताब, 'बिफोर वी वर ट्रांस: ए न्यू हिस्ट्री ऑफ जेंडर' में लिखते हैं, 'ट्रांस समुदाय, तब भी था, जब प्राचीन मेसोपोटामिया की सभ्यता अपने चरम पर थी। तब मेसोपोटामिया में गाला पुजारी होते थे, जो होते तो पुरुष थे लेकिन महिलाओं के वेष में रहते थे। बेबीलोनियन ग्रंथ बताते हैं कि देवता एन्की ने देवी इनन्ना के लिए गीत रचे थे। भारतीय महाद्वीप में हजारों साल से 'किन्नर समुदाय' रहता है। उत्तरी अमेरिका में लोग लोग इस समुदाय को 'टू-स्पिरिट' के नाम से जानते थे। हवाई में यह समुदाय माहू कहलाता था, प्राचीन ग्रीस में 'हेर्माफ्रोडाइटस' भी इसी समुदाय का हिस्सा थे।
किट हेयम, ट्रांस इतिहासकार:-
जेंडर डायवर्सिटी मानव इतिहास का अभिन्न हिस्सा है। अफ्रीका के कुछ समुदायों में जेंडर फ्लुइडिटी सामान्य थी, लेकिन यूरोपीय उपनिवेशवाद ने इसे दबाया और अपराध बता दिया। ब्रिटिश कानूनों ने भारत में हिजड़ों को हाशिए पर धकेला। एक तरफ पश्चिमी बाइनरी थोपी गई लेकिन दूसरी तरफ डिजिटल प्लेटफॉर्म के उदय से पुरानी विविधताएं वापसी कर रहीं हैं।
ट्रांस सर्जरी की शुरुआत कैसे हुई?
'बिफोर वी वर ट्रांस: ए न्यू हिस्ट्री ऑफ जेंडर' में किट हेयम लिखते हैं, '19वीं से 20वीं सदी में पश्चिमी चिकित्सा ने ट्रांस पहचान को मानसिक रोग बताया था। जब दुनिया इस दकियानूसी सोच में जकड़ी थी, तब डॉ. मैग्नस हिर्शफेल्ड ने जर्मनी में और डॉ. हैरी बेंजामिन ने अमेरिका में हार्मोन थेरेपी और सर्जरी की राह खोली।
साल 2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जेंडर को लेकर होने वाली दुविधा को मानसिक बीमारी की सूची से हटाया था। ट्रांस पेंटर और आंदोलनकारी लिली एल्बे ने 1930 के दशक में, पहली बार जेंडर कन्फर्मेशन सर्जरी कराई थी। सर्जरी से पहले वह पुरुष थीं और उन्होंने गेर्डा गॉटलीब से शादी की थी।
डॉ. मैग्नस हिर्शफेल्ड पहले सर्जन बने, जिन्होंने यह कारनामा किया। वह वैजिनोप्लास्टी कराने वाली शुरुआती महिलाओं में से एक रहीं हैं। एल्बे पूरी तरह से महिला होना चाहती थीं, 1931 में उन्होंने अपनी चौथी गर्भाशय प्रत्यारोपण सर्जरी और वेजाइनल कैनाल बनवाने के लिए सर्जरी कराई। 13 सितंबर 1931 को जर्मनी के ड्रेसडेन में हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई। तब से लेकर अब तक, जेंडर चेंज के बाद पुरुषों के मां बनने से जुड़े शोध तो हो रहे हैं लेकिन सफलता नहीं मिली है।
कैसे ट्रांजेंडर समुदाय को मिली पहचान?
क्रिस्टीन जोग्रेनसेन उन शुरुआती लोगों में से एक थीं, जिन्होंने ट्रांस समुदाय के हक के लिए आवाज उठाई। वह अमेरिका में सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी के लिए जानी जाती हैं। 1944 तक, वह पुरुष थीं, जोर्गेनसेन, अमेरिकी सेना में शामिल थीं। पुरुष के तौर पर उन्होंने सेक्स चेंज सर्जरी पर शोध किया, वह 1950 के दशक में मशहूर हो गईं थीं। उनकी आत्मकथा, 'क्रिस्टीन जोर्गेनसेन, अ पर्सनल ऑटोबायोग्राफी' आज भी लोग पढ़ते हैं।
साल 1969 तक मार्शा पी जॉनसन और सिल्विया रिवेरा की अगुवाई में स्ट्रीट ट्रांसवेस्टाइट एक्शन रेवोल्यूशनरीज (STAR) की नींव पड़ी। धीरे-धीरे अमेरिका और यूरोप से निकलकर ट्रांस आंदोलन, पूरी दुनिया में फैल गया। अब यह समुदाय, अपने अधिकारों को लेकर मुखर हो रहा है।
साल 1969 में न्यूयॉर्क के स्टोनवाल पर पुलिस ने ट्रांस लोगोंको पकड़ने के लिए छापेमारी की। लोग पुलिसिया उत्पीड़न पर भड़क गए और समाज के लोग आगे आए। 6 दिनों तक विरोध प्रदर्शन हुए, दंगे हुए। एक साल बाद, 28 जून 1970 को पहली प्राइड परेड, क्रिस्टोफर स्ट्रीट लिबरेशन डे मार्च निकाली गई। यह मार्च, LGBTQ समुदाय के अधिकारों और गर्व का प्रतीक है। जून को प्राइड मंथ कहा जाता है।
ट्रांस समुदाय को कैसे देखती रही है दुनिया?
ट्रांस समुदाय, समाजिक उपेक्षा का शिकार सैकड़ों साल तक रहा। किसी समाज में इन्हें अपराधी माना गया,कहीं इन्हें नगर के सबसे कोने में बसाया गया। समुदाय का एक बड़ा हिस्सा देह व्यापार और भिक्षावृत्ति में शामिल रहा। आज भी सामजिक तौर पर यह समुदाय हाशिए पर है।
सामाजिक भेदभाव, यौन उत्पीड़न की खबरें आती हैं, दब जाती हैं। इसे ऐसे आप समझ सकते हैं कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो 2022-23 के आंकड़े बातते हैं कि 'ट्रांसजेंडर पर्सन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट से जुड़ा सिर्फ एक केस दर्ज हुआ था। 2022 में हत्या के सिर्फ 9 केस दर्ज हुए, अपहरण के 1 केस दर्ज हुए हैं। अखबारों की हेडलाइन, अलग आंकड़े देते हैं।
क्या चाहता है ट्रांस समुदाय?
- विवाह का अधिकार: साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने 'सेम सेक्स मैरिज' को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया था।
- बच्चा गोद लेने का अधिकार: मौजूदा कानूनों के हिसाब से सेंट्रल एडॉप्टेशन रिसोर्स अथॉरिटी, ट्रांसजेंडर जोड़ों को कानूनी रूप से बच्चा गोद लेने का अधिकार नहीं देता है।
- जेंडर तय करने का अधिकार: साल 2026 में जो विधेयक सरकार लेकर आई है, उसमें अब ट्रांस व्यक्ति, खुद को ट्रांस मान ही नहीं सकता है। इसके लिए उसे मेडिकल बोर्ड की मंजूरी लेनी होगी।
- आरक्षण का अधिकार: NALSA फैसले में सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के बावजूद, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अभी तक ट्रांसजेंडर समुदाय को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष आरक्षण नहीं मिलता है।
- उत्पीड़न के विरुद्ध अधिकार: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के लिए सजा अधिकतम 2 से 3 साल है। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की तुलना में यह बेहद कम है।
- संपत्ति और विरासत का अधिकार: उत्तराधिकार कानूनों में 'बेटा' और 'बेटी' का संपत्ति पर अधिकार होता है। ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं है। अगर उन्हें संपत्ति चाहिए तो बेटा या बेटी के तौर पर ही मिल सकता है, उनकी स्वतंत्र पहचान के आधार पर नहीं।
वे देश, जहां ट्रांसजेंडरों को मिला है उनका अधिकार
'LGBT इक्वेलिटी इंडेक्स' में आइसलैंड, नॉर्वे, उरुग्वे, स्पेन, डेनमार्क, माल्टा, चिली, जर्मनी, एंडोरा और क्यूबा जैसे देश, टॉप 10 उदार देशों में शुमार हैं, जहां ट्रांस सहजता से रहते हैं।
शादी का अधिकार किन देशों में है?
नीदरलैंड ने सबसे पहले समलैंगिक विवाहों को मंजूरी दी। स्पेन, बेल्जियम, नॉर्वे, स्वीडन, आइसलैंड, पुर्तगाल, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, फिनलैंड, माल्टा, ऑस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड, एस्टोनिया जैसे देशो में समलैंगिक विवाह को वैध माना जाता है। अमेरिका, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेंटीना, ब्राजील, उरुग्वे, कोलंबिया, इक्वाडोर, कोस्टा रिका, चिली, मैक्सिको और क्यूबा में भी समलैंगिक विवाह वैध माने जाते हैं। एशिया में थाइलैंड और ताइवान जैसे देशों में समलैंगिक विवाद वैध हैं। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का भी रुख उदार है।
भारत का हाल क्या है?
सुप्रीम कोर्ट की वकील रुपाली पंवार बताती हैं, 'भारत में समलैंगिक या ट्रांसजेंडर शादियों को कानूनी इजाजत नहीं है। अवैध भी नहीं हैं। दो वयस्क लोग एक साथ रह सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने शादी की इजाजत से जुड़ी एक याचिका पर कहा था कि इससे विरासत और संपत्ति से जुड़े कई नियम उलझ जाएंगे। कोर्ट ने समलैंगिक विवाहों पर अंतिम निर्णय सरकार पर छोड़ दिया है। भारत में अभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। बीजेपी, नैतिक रूप से समलैंगिकता का विरोध करती है। फिलहाल भारत में ट्रांस अधिकारों के लिए बड़े बदलावों की जरूरत है।'
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