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पश्चिम बंगाल में SIR की जांच करेगा NIA, सुप्रीम कोर्ट ने दिए आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामले की जांच को NIA को सौंप दिया है। कोर्ट ने पुलिस और राज्य अधिकारियों के खिलाफ लगे गंभीर आरोपों पर गौर करते हुए यह आदेश दिया है।

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सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया । Photo Credit: PTI

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में न्यायिक अधिकारियों के साथ हुई घटना की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दी है। यह घटना पिछले हफ्ते विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) ड्यूटी के दौरान कालीचक गांव में हुई थी, जहां सात न्यायिक अधिकारियों को नौ घंटे से ज्यादा समय तक बंधक बनाकर रखा गया। कोर्ट ने कहा कि राज्य पुलिस पर गंभीर आरोप हैं, इसलिए केंद्र की स्वतंत्र एजेंसी को जांच करनी चाहिए।

 

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने इस मामले को सुओ मोटो (स्वतः संज्ञान) में लिया था। कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पत्र के आधार पर कोर्ट ने त्वरित कार्रवाई की। घटना 1 अप्रैल को हुई, जब न्यायिक अधिकारी मतदाता सूची संशोधन से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहे थे।

 

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पुलिस पर गंभीर आरोप

आज सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रारंभिक रिपोर्ट देखी और फैसला लिया कि राज्य पुलिस पर गंभीर आरोप हैं, इसलिए आर्टिकल 142 के तहत कोर्ट ने एनआईए को 12 एफआईआर की जांच सौंप दी। ये एफआईआर स्थानीय पुलिस ने दर्ज की थीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चाहे एफआईआर में एनआईए एक्ट के शेड्यूल्ड अपराध हों या न हों, एनआईए जांच कर सकती है।

 

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने बताया कि तीन घटनाएं सीधे न्यायिक अधिकारियों से जुड़ी थीं। एक में अधिकारी को जगह पहुंचने से रोका गया, दूसरी में स्थल पर घेराव किया गया। कुल 12 एफआईआर में से नौ आसपास की जगहों पर ब्लॉकेज से जुड़ी थीं। 24 आरोपियों को परेशान करने वाले के रूप में पहचाना गया है, जिनमें पांच का आपराधिक इतिहास है और 24 संदिग्ध पार्टी कार्यकर्ता हैं। कुल 432 लोगों की पहचान हुई है और उनके कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच चल रही है।

 

कोर्ट ने निर्देश दिया कि स्थानीय पुलिस सभी कागजात, केस डायरी और सबूत एनआईए को सौंप दे। एनआईए को जरूरत पड़ने पर लॉजिस्टिकल मदद भी दी जाए। अब तक गिरफ्तार दो मुख्य आरोपी मोफाकेरुल इस्लाम और मौलाना मुहम्मद शाहजहां अली कादरी को एनआईए को सौंप दिया जाए और उनकी पूछताछ एनआईए करे। जांच के दौरान अगर नए अपराध या ज्यादा लोग शामिल पाए गए तो एनआईए और एफआईआर दर्ज कर सकती है।


जांच रिपोर्ट कोलकाता के एनआईए कोर्ट में दाखिल की जाएगी। तब तक एनआईए को समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट को स्टेटस रिपोर्ट देनी होगी।

 

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राज्य सरकार पर सवाल

कोर्ट ने राज्य प्रशासन पर तीखी टिप्पणी की। कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है, लेकिन यहां ‘पूरी तरह विफलता’ दिखी। न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट की मदद की मांग पर ‘स्पष्ट निष्क्रियता’ रही। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यह घटना चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है, जो आपराधिक अवमानना के दायरे में आ सकती है।

 

पहले की सुनवाई में कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए केंद्र की फोर्स बुलाई जाए। एसआईआर प्रक्रिया जारी रखने और अधिकारियों तथा उनके परिवारों की सुरक्षा के लिए तुरंत कदम उठाए जाएं। सार्वजनिक पहुंच को नियंत्रित किया जाए।

क्या था मामला?

1 अप्रैल को कालीचक-2 ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिस (बीडीओ ऑफिस) में सात न्यायिक अधिकारी, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं, दोपहर करीब 3:30 बजे से घिर गए। एक बड़ी भीड़ ने उन्हें घेर लिया और रात के 12 बजे के बाद ही छोड़ा। इस दौरान उन्हें खाना और पानी भी नहीं दिया गया। जब उन्हें निकाला जा रहा था, तब उनकी गाड़ियों पर पत्थर और बांस के डंडों से हमला किया गया।

 

कोर्ट ने राज्य प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाया। कहा गया कि हाईकोर्ट प्रशासन की मदद की मांग पर शाम 8:30 बजे तक कोई खास कार्रवाई नहीं हुई। मुख्य सचिव का मोबाइल नंबर व्हाट्सएप सुविधा वाला नहीं था, जिससे बातचीत में दिक्कत हुई। कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, जिला मजिस्ट्रेट और एसपी की भूमिका को ‘बहुत निंदनीय’ बताया। कोर्ट ने कहा कि यह घटना न्यायिक अधिकारियों को डराने और चुनावी प्रक्रिया में दखल देने की कोशिश लगती है।


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