'सतलुज' के चलते फिर चर्चा में आए, इतने विवादों में क्यों रहे KPS गिल?
दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' पर फिलहाल रोक लगा दी गई है लेकिन इस फिल्म से एक बार फिर से KPS गिल चर्चा में आ गए हैं। पंजाब में आतंकवाद खत्म करने वाले इस अधिकारी का नाम कई विवादों से जुड़ा है। पढ़िए पूरी कहानी।

KPS गिल, Photo Credit: Social Media
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा पर बनी फिल्म 'सतलुज' को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाने के बावजूद यह फिल्म डाउलोड लिंक्स के जरिए पूरे पंजाब में देखी जा रही है। इस फिल्म के कारण केपीएस गिल एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं। फिल्म में एक किरदार दिया गया है जिसे 1990 के दशक में उस भूमिका में दिखाया गया है जिसमें उस समय केपीएस गिल थे। केपीएस गिल को 1990 के दशक में पंजाब में फैले आतंकवाद की कमर तोड़ने वाले अधिकारी के रूप में जाना जाता है लेकिन फिल्म में उनके किरदार को मानवाधिकारों का उल्लंघन कर फर्जी एनकाउंटर करवाने वाले अधिकारी के रूप में पेश किया गया है।
केपीएस गिल के जीवन में कई बड़े विवाद रहे हैं और वह दिल्ली से पंजाब तक कई बार विवादों के कारण सुर्खियों में भी रहे। केपीएस गिल के साथ कई कहानियां जुड़ती हैं। ये कहानियां जितनी अच्छी हैं उतनीं हीं बुरी भी हैं। एक तरफ जहां उन्हें असम के हालात सुधारने का श्रेय दिया जाता है वहीं दूसरी तरफ पंजाब में खालिस्तानियों का नेटवर्क नष्ट करने के लिए भी जाना जाता है। लेकिन उसी पंजाब में जसवंत सिंह खालड़ा (सतलुज फिल्म के मुख्य किरदार) जैसे एक्टिविस्ट्स भी थे जो केपीएस गिल और उनकी पुलिस पर हजारों निर्दोष सिख लड़कों को मारने का इल्ज़ाम भी लगाते रहे और आखिरकार जसवंत खालड़ा भी उन्हीं सिख युवकों की तरह एक दिन लाश बन गए।
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शुरुआती जीवन
29 दिसंबर 1934 को अविभाजित पंजाब के लाहौर में रछपाल सिंह गिल और अमृत कौर के घर एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया कंवर पाल सिंह गिल। जो आगे चलकर के.पी.एस. गिल के नाम से मशहूर हुए। के.पी.एस. गिल के पिता सरदार रछपाल सिंह गिल सिंचाई विभाग में एक सिविल इंजीनियर थे। रछपाल सिंह का पैतरिक गांव यूं तो पंजाब के लुधियाना जिले में था लेकिन जब केपीएस गिल पैदा हुए उस वक्त उनकी पोस्टिंग लाहौर में थी। भारत की आज़ादी के बाद रछपाल सिंह गिल ने भाखड़ा नंगल हाइड्रो पावर कॉम्प्लेक्स जैसी कई प्रमुख परियोजनाओं पर काम किया।
इधर केपीएस गिल धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे। जिन केपीएस गिल से आंतकवादी और अपराधी थर थर कांपते थे वो अपने बचपन में काफी डरपोक थे। अंधेरे से उन्हें डर लगता था कि अंधेरे में भूत उन्हें पकड़ लेगा। इसी डर से वह रात के अंधेरे में वॉशरूम जाने से भी डरते थे। बहरहाल, केपीएस गिल जब स्कूल जाने की उम्र में पहुंचे तो उनके पिता की पोस्टिंग शिमला में हो गई। यहीं St. Edward's School में केपीएस गिल का दाखला करा दिया गया।
पुलिस में आने का मन क्यों बनाया?
स्कूली पढाई पूरी करने के बाद केपीएस गिल ने पंजाब यूनिवर्सीटी से इंग्लिश में ग्रेजुशन की पढाई मुकम्मल की लेकिन गिल ये अभी तक तय नहीं कर पाए थे कि उन्हें ज़िंदगी में आगे क्या करना है? इसी दौरान उनके कॉलेज में एक ऐसी घटना हुई जिसने उन्हें पुलिस की नौकरी ज्वाइन करने के लिए प्रेरित किया। कहा जाता है कि ग्रेजुएशन के दौरान गिल एक ठेले पर जलेबी खाने गए तभी वहां किसी और शख्स की ठेले वाले बुज़र्ग के साथ कहासुनी हो गई और उसने बुज़ुर्ग को पीटना शुरू कर दिया… गिल ने जब बीच बचाव करने की कोशिश की तो उस शख्स ने गिल से कहा कि 'लड़ाई तुझसे नहीं हुई। तू बीच में क्यों पड़ रहा है। तू थानेदार है क्या?” ये सुनकर केपीएस गिल के मुंह से बेसाख्ता निकला, 'हां, मैं थानेदार हूं।' बस यहीं से गिल को पुलिसवाले की अहमियत समझ आई और उन्होंने भी पुलिस सर्विल ज्वाइन करने की ठान ली।
असम में मिली पोस्टिंग
1955 में केपीएस गिल की ग्रैजुएशन कंप्लीट हुई और साल 1958 में पहले ही प्रयास में UPSC कर वो एक IPS बने और उसी साल उन्हें असम-मेघालय कार्डर अलॉट हुआ। यहीं पर उन्होंने अपने करियर के शुरूआती 28 साल नौकरी की। शुरूआत में उनकी पोस्टिंग एक ट्रेनी के तौर पर असम के तिनसुखिया थाने में हुई। इसी दौरान का एक किस्सा राहुल चंदन अपनी किताब 'KPS Gill: The Paramount Cop' में बताते हैं कि पहली बार जब थाने पहंचे तो देखा कि मेज पर कई पासपोर्ट पड़े हैं। जब उन्होंने पासपोर्ट्स के पन्ने पलटे तो हर पासपोर्ट के साथ पांच-पांच रुपये का नोट नत्थी था। ये पासपोर्ट विदेशी नागरिकों के थे।
उस दौर में जो लोग विदेश से आते थे उन्हें पास के थाने जाकर पासपोर्ट को वेरिफाई करवाना पड़ता था। गिल को पांच रुपए का चक्कर समझ नहीं आ रहा था उन्होंने थानेदार से पूछा तो उसने जुबान पर ताला जड़ लिया। ऐसे में उन लोगों को बुलाया गया जिनके पास्पोर्ट थे। जब गिल ने उनसे पूछा कि ये पांच रूपए पासपोर्ट के साथ नत्थी क्यों हैं तो उन्होंने बताया कि उन्हें बताया गया था कि अगर पासपोर्ट के साथ पांच रूपए नत्थी कर दो तो थानेदार उनसे उल्टे-सीधे सवाल पूछकर परेशान नहीं करेगा और पासपोर्ट भी तुरंत वेरिफाई कर देगा। केपीएस गिल ये सुनकर चौंके और उन्होंने पासपोर्ट के साथ नत्थी रूपयों को थानेदार से वापस करवाया और उसे फटकार लगाते हुए सबके पासपोर्ट वेरिफाई करने के लिए कहा।
गिल पर लगा हत्या का आरोप
ट्रेनिंग मुकम्मल करने के बाद 1961 में केपीएस गिल को असम के नगांव जिले का SP नियुक्त किया गया। नगांव तब के ईस्ट पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश के साथ बॉर्डर शेयर करता है। बॉर्डर बेल्ट होने के कारण नगांव में घुसपैठ काफी बड़ी समस्या थी। राहुल चंदन अपनी किताब में लिखते हैं कि पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी भारत आ चुके थे। राज्य सरकार ने प्रशासन को अवैध प्रवासियों को पकड़ने का आदेश दिया था और इस आदेश के पालन की जिम्मेदारी केपीएस गिल के सर पर थी। गिल नगांव के गांव-गांव गश्त लगाते और स्थानीय लोगों से घुसपैठियों की पहचान करने में मदद करने के लिए अपील करते। उन्होंने पूरे इलाके का चप्पा-चप्पा छान मारा और पूर्वी पाकिस्तान से आए हजारों अवैध प्रवासियों को पकड़कर दोबारा उन्हें पूर्वी पाकिस्तान भेज दिया। जब यह बात पूर्वी पाकिस्तान पहुंची कि भारत सरकार उनके लोगों को अपने देश से निकाल रही है, तो वहां अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर अत्याचार शुरू हो गए। इसके जवाब में असम में कुछ हिंदू संगठनों ने स्थानीय मुसलमानों को परेशान करना शुरू कर दिया, जिससे तंग आकर स्थानीय मुसलमानों ने केपीएस गिल से मदद मांगी। गिल ने अपने ड्राइवर से कहा कि मेरी जीप के पीछे एक ट्रॉली अटैच करो। फिर उन्होंने उस ट्रॉली में अनाज भरवाया और उन तमाम इलाकों में गए जहां-जहां मुसलमानों को परेशान किया जा रहा था। उन्होंने अनाज बांटा और नवगांव के मुसलमानों को आश्वासन दिलाया कि उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। गिल तब तक उन इलाकों का भ्रमण करते रहे जब तक हालात काबू में नहीं आ गए।
केपीएस गिल की असम में पोस्टिंग के दौरान कुछ वाकए ऐसे भी हुए जो विवाद की शक्ल में उनके साथ ताउम्र जुड़े रहे। एक छात्र नेता की हत्या का इल्ज़ाम केपीएस गिल पर लगा। असम में रहते हुए गिल के सामने अवैध प्रवासियों की समस्या एक बड़ी चुनौती बनी रही। वाकया साल 1979 के दिसंबर महीने का है। अगले साल फरवरी महीने में लोकसभा चुनाव होने वाले थे और तब के.पी.एस. गिल प्रमोट होकर DIG बन चुके थे। असम के छात्र सड़कों पर थे और उन्हें लग रहा था कि सरकार बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों को वोट देने का अधिकार दे रही है। ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU.) इस प्रोटेस्ट को लीड कर रही थी। 10 दिसंबर 1979 को असम चुनावों के लिए पर्चा भरा जा रहा था। कांग्रेस ने असम के बरपेटा लोकसभा सीट से पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की पत्नी बेगम अबीदा अहमद को अपना कैंडिडेट घोषित किया था। अबीदा अहमद इस दिन अपना पर्चा भरने के लिए निकलीं लेकिन छात्र सड़कों पर थे। अबीदा अहमद को पर्चा भरने से रोकने की कोशिश कर रहे थे। उनकी सुरक्षा के लिए पुलिस बल तैनात था, जिसका नेतृत्व केपीएस गिल कर रहे थे। अबीदा अहमद ने पर्चा तो भर दिया लेकिन छात्रों का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था।
इसी बीच पुलिस ने भीड़ को काबू में करने के लिए लाठी चार्ज शुरु कर दिया। ये सब चल ही रहा था तभी अचानक एक खाई से 22 साल के एक नौ़जवान छात्र की लाश बरामद हुई। ये लाश असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के छात्र नेता खर्गेश्वर तलुकदार की थी। के.पी.एस. गिल पर हत्या के आरोप लगे। यह खबर फैलते ही पूरा असम से भड़क उठा। इस एक मौत ने अवैध प्रवासन के मुद्दे को तुल दे दी, जो अगले छह सालों तक भड़कती रही। साल 1985 में राजीव गांधी ने छात्रों के साथ अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर एक समझौता किया। इस समझौते को असम एकॉर्ड के नाम से जाना जाता है। इसमें तय किया गया कि 24 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से असम में आने वाले सभी अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें डिपोर्ट किया जाएगा। 1 जनवरी 1966 से 24 मार्च 1971 के बीच आने वालों की पहचान विदेशी अधिनियम के तहत की जाएगी। उन्हें 10 वर्षों के लिए वोट देने का अधिकार निलंबित किया जाएगा, लेकिन अन्य सभी नागरिक अधिकार प्रदान किए जाएंगे। इससे छात्रों की मुख्य मांगें पूरी हो गईं और आंदोलन समाप्त हो गया। बहरहाल, खर्गेश्वर की मौत का मामला अदालत तक पहुंचा. के.पी.एस. गिल पर हत्या का आरोप था कि उन्होंने छात्र को बुरी तरह पीटा था। लेकिन असम पुलिस की तरफ से कहा जाता रहा कि इसकी मौत केपीएस गिल ने नहीं की थी। उस वक्त असम में माहौल ऐसा था कि कोई भी वकील या विटनेस केपीएस गिल के केस में अपीयर होने को तैयार नहीं था जिसके बाद इस मामले को दिल्ली हाई कोर्ट शिफ्ट किया गया। आखिरकार सबूतों के अभाव में केपीएस गिल को बरी कर दिया गया।
दहकता पंजाब और सुपरकॉप की शुरुआत
इधर 1980 के शुरुआती दशक से ही पंजाब में खालिस्तान की मांग तेजी पकड़ चुकी थी। जगह-जगह से हिंसा की खबरें आ रही थीं। नौजवान आतंक का रास्ता अख्तयार कर रहे थे। अब केपीएस गिल के करियर में एक ऐसा चैप्टर जुड़ने वाला था जिसने केपीएस गिल का पुलिसिंग करियर दुनिया भर में विख्यात कर दिया। साल 1981 के सितंबर महीने की बात है पंजाब केसरी समूह के संस्थापक लाला जगत नारायण की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई। इसी तरह 25 अप्रैल 1983 को पंजाब के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DIG) ए.एस. अटवाल को स्वर्ण मंदिर परिसर की सीढ़ियों पर गोली मार दी गई और इन सबके पीछे था खालिस्तान आंदोलन का पोस्टर बॉय बन चुके जरनैल सिंह भिंडरवाले। उस दौर में भिंडरवाले का खौफ इतना ज्यादा था कि ए.एस. अटवाल की लाश स्वर्ण मंदिर की सीढ़ियों पर ही पड़ी रही, लेकिन कोई भी पुलिस अधिकारी उसे उठाने की हिम्मत नहीं कर पाया।
साल 1984 तक आते-आते भिंडरवाला ने स्वर्ण मंदिर को ही अपना ठिकाना बना लिया था। केंद्र में बैठी कांग्रेस सरकार पर उस वक्त भिंडरवाला को संरक्षण देने के आरोप लग रहे थे फिर अचानक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर को भिंडरवाले और उनके समर्थकों से खाली करवाने का आदेश दे दिया। इस अभियान को 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' नाम दिया गया। 3 जून 1984 को भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर को चारों ओर से घेर लिया और 6 जून 1984 के दिन सेना ने स्वर्ण मंदिर के भीतर घुसे भिंडरवाले और उनके समर्थकों को मार गिराया। लेकिन इस ऑपरेशन को अंजाम देने में करीब 83 भारतीय सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी और करीब 493 आम लोगों की भी मौत हो गई।
उधर पंजाब में भिंडरवाले के मारे जाने के बावजूद खालिस्तानी आतंकवादी खत्म नहीं हुए थे। बड़ी संख्या में पंजाब के भीतर सिख नौजवान आतंक की राह चुन रहे थे। पूरा पंजाब खून की होली खेल रहा था और इन सब घटनाओं को दूर से देख रहे थे के.पी.एस. गिल. उस समय वो जम्मू में बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) में इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (IG) के पद पर तैनात थे। पंजाब में बढ़ते आतंकवाद को देखकर गिल के मन में बस एक ही बात चल रही थी कि किसी भी तरह अपने सूबे को आतंक की आग से बचाना है। केपीएस गिल की ये तमन्ना पूरी हो गई और सितंबर 1984 में गिल को पंजाब आर्म्ड पुलिस का इंस्पेक्टर जनरल बना दिया गया। उन्हें बढ़ते आतंकवाद पर नियंत्रण पाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। गिल ने काम शुरू किया ही था कि 31 अक्टूबर 1984 को खबर आई कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके दो सिख बॉडीगार्ड्स ने गोली मार दी। इस घटना के बाद देशभर में सिख-विरोधी दंगे शुरु हो गए। पंजाब में खालिस्तानी आतंकियों की तादाद पहले की तुलना और भी तेजी बढने लगी।
केपीएस गिल जब पंजाब भेजे गए थे उस वक्त पंजाब का पुलिस सिस्टम चरमराया हुआ था। इधर ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पंजाब में भारी संख्या में सेना तैनात की गई थी। केपीएस गिल का मानना था कि सेना पंजाब की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती। सेना के पास स्थानीय इनपुट्स नहीं होते। सेना सिर्फ आदेश पर गोलियां चलाती हैं। ग्राउंड पर जानकारी इकठ्ठा करना पुलिस और थाने की जिम्मेदारी है। गिल कई इंटरव्यू में बताते हैं कि जब वो पहली बार पंजाब पहुंचे तो उन्होंने देखा कि किसी भी पुलिस अधिकारी में आतंकियों का सामना करने की हिम्मत नहीं थी। इसलिए आतंकियों के खिलाफ की गई जांचों का डॉक्यूमेंटेशन भी नहीं था। गिल ने सबसे पहले पुलिस के मनोबल को बढ़ाने की पहल की, जहां-जहां आतंकी हमले हो रहे थे, वहां पुलिस अब घटनाओं को दर्ज करने लगी।
ये सब चल ही रहा था कि सूबे में साल 1985 में विधानसभा चुनाव हुए। पंजाब तब के गवर्नर अर्जुन सिंह चाहते थे कि केपीएस गिल को पूरी तरह पंजाब में आतंकवाद ख़त्म करने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाए। उन्हें सूबे का डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (डीजीपी) बनाया जाए। चुनाव के बाद राज्य में अकाली दल की सरकार बनी। सूबे के नए मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला चाहते थे कि हरगोबिंदर सिंह धालीवाल को पंजाब का डीजीपी बनाया जाए। राज्यपाल अर्जुन सिंह केपीएस गिल के पक्ष में थे। अंत में धालीवाल ही पंजाब के नए डीजीपी बने। केपीएस गिल बताते हैं कि धालीवाल यूं तो उनके दोस्त थे लेकिन कुछ दिनों बाद गिल से असहज महसूस करने लगे। ये सब केपीएस गिल से देखा नहीं गया। उन्हें लगा कि मैं पंजाब से बाहर चला जाता हूं और धालीवाल पंजाब संभाल लेंगे। अपने तबादले के लिए गिल ने दिल्ली होम सेक्रेट्रिएट में अर्जी दे दी। कुछ दिनों बाद केपीएस गिल को दिल्ली बुला लिया गया। उन्हें CRPF में IG की जिम्मेदारी सौंप दी गई लेकिन उधर पंजाब की स्थिति और भी ज़्यादा बदतर हो रही थी।
सुरजीत सिंह बरनाला सरकार ने एक बैंस कमेटी बनाई। यह कमेटी उन लोगों की जांच कर रही थी जो आतंकवाद के संदेह में पकड़े गए थे। बैंस कमेटी ने पाया कि इनमें से 99 फ़ीसदी लोगों पर लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं। इस कमेटी की सिफारिश के आधार पर करीब 6000 कैदियों को जेल से रिहा कर दिया गया। गिल इस फैसले के बिल्कुल खिलाफ थे और उन्हें लग रहा था कि सुरजीत सिंह बरनाला सरकार के इस फैसले के बाद पंजाब में आतंकवाद और भी तेजी से बढ़ेगा।
फिर से पंजाब पहुंचे गिल
साल 1986 का फरवरी महीना आ चुका था। केपीएस गिल दिल्ली में एक डिनर पार्टी में आमंत्रित किए गए थे। इसमें तब के होम मिनिस्टर स्टेट अरुण नेहरू भी मौजूद थे। अरुण नेहरू तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बिलकुल करीब माने जाते थे। बातचीत के दौरान अरुण नेहरू ने केपीएस गिल से पूछा कि गिल साहब पंजाब की स्थिति के बारे में बताइए। गिल ने कहा कि आप यह बात मुझसे क्यों पूछ रहे हैं, यह तो आप सुरजीत सिंह बरनाला और उनकी सरकार में डीजीपी धालीवाल से पूछिए। अरुण नेहरू ने बात को संभालते हुए कहा कि वो सब तो ठीक है, लेकिन आप बताइए कि पंजाब की स्थिति को कैसे बेहतर किया जा सकता है। इस पर केपीएस गिल ने जवाब दिया कि इसका सीधा समाधान यही है कि पुलिस को सीधे-सीधे आतंकियों से लड़ना होगा। उनके नेटवर्क को तोड़ना होगा और दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इस मुलाकात के बाद केपीएस गिल को लगा कि शायद उन्हें पंजाब का नया डीजीपी नियुक्त किया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। धालीवाल का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं था। उनकी जगह पर पंजाब के नए डीजीपी Julio Francis Ribeiro को बनाया गया था।
डिनर पार्टी के लगभग तीन महीने बाद केपीएस गिल को तब के गृह मंत्रालय के जॉइंट सेक्रेटरी वीके जैन का फोन आया। वीके जैन ने फोन पर कहा कि गिल साहब क्या आप पंजाब जाना पसंद करेंगे? गिल ने हामी भर दी लेकिन उन्हें इस बार पंजाब में IG CRPF के रूप में तैनात किया गया था। DGP अब भी Ribeiro ही थे और गिल को बस उनकी मदद करने के लिए भेजा गया था। केपीएस गिल का दफ्तर अमृतसर में था। वही अमृतसर जहां भिंडरवाले को ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान मार गिराया गया था। केपीएस गिल बताते हैं कि जब वो ड्यूटी जॉइन करने के लिए दिल्ली से अमृतसर रवाना हो रहे थे, तब उन्होंने जालंधर-अमृतसर के रास्ते पर दोपहर ढाई बजे सड़क पर एक भी इंसान नहीं देखा। यह उस दौर के पंजाब की तस्वीर बयां कर रहा था, जब लोग आतंक के खौफ से दोपहर के ढाई-तीन बजे ही घर के अंदर छिप जाते थे।
पंजाब पहुंचने के बाद गिल ने महसूस किया कि वहां पंजाब पुलिस और CRPF के बीच काफी मतभेद हैं। पंजाब पुलिस कह रही थी कि CRPF कुछ नहीं करती, जबकि CRPF का कहना था कि पुलिस उन्हें काम नहीं करने देती। केपीएस गिल को लगा कि अगर दोनों के बीच मतभेद रहेंगे तो वे आतंक का सफाया कैसे कर पाएंगे। उन्होंने इसके लिए एक समाधान निकाला और कहा कि जब पंजाब पुलिस जांच करेगी तो उसके साथ एक CRPF का जवान होगा, और जब CRPF गश्त करेगी तो उस समय पंजाब पुलिस का एक जवान उनके साथ रहेगा। इसके बाद दोनों दलों के बीच मतभेद खत्म हो गए और दोनों मिलकर एक साथ काम करने लगे।
इधर पंजाब के डीजीपी रिबेरो, पंजाब पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों का मनोबल बढ़ाने में जुटे हुए थे। वे कहा करते थे 'Bullet for Bullet' यानी हम 'गोली का जवाब गोली से देंगे' रिबेरो के हौसले को पस्त करने के लिए आतंकियों ने 3 अक्टूबर 1986 के दिन पंजाब पुलिस मुख्यालय पर हमला बोल दिया। रिबेरो का बंगला भी वहीं पर था। इस हमले में उन्हें चोट आई और उनकी पत्नी को गोली लगी। गनीमत रही कि इलाज के बाद वो बच गईं लेकिन मौके पर एक गार्ड की जान चली गई। इस हमले ने रिबेरो को अंदर से थोड़ा कमजोर कर दिया था लेकिन वह झुकने को तैयार नहीं थे। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और राज्य में सुरजीत सिंह बरनाला की अकाली सरकार। दोनों अपने-अपने हिसाब से पंजाब के मसले को सुलझाना चाहते थे। दोनों के बीच के इस तकरार की वजह से रिबेरो के हाथ बंधे हुए थे।
बरनाला के 19 महीने के कार्यकाल में पंजाब में आतंकियों ने करीब 783 आम नागरिकों की हत्या कर दी थी, जिनमें 71 पुलिसकर्मी भी शामिल थे। मई 1987 में खबर आई कि केंद्र सरकार ने पंजाब में बिगड़ते हालात को देखते हुए सुरजीत सिंह बरनाला की सरकार को बर्खास्त कर दिया है। सूबे में राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका था और सिद्धार्थ शंकर राय उस वक्त पंजाब के राज्यपाल थे। अब उनके हाथों में पूरे सूबे का कार्यभार आ चुका था।
इस पूरे दौर का ज़िक्र करते हुए केपीएस गिल बताते हैं कि उस समय पंजाब में खालिस्तानी आतंकियों के पास AK-47 जैसे आधुनिक हथियार थे। जबकि पंजाब पुलिस और थानों में अब भी पुराने हथियार इस्तेमाल हो रहे थे। केपीएस गिल और रिबेरो ने केंद्र सरकार से आधुनिक हथियारों की मांग की. गिल याद करते हैं कि पंजाब पुलिस को AK-47 राइफलें दी गईं। इसके अलावा थानों में वर्षों से स्टोर में बंद पड़ी लाइट मशीन गन (LMG) को भी बाहर निकाला गया। यानी रिबेरो और गिल की मांगों के बाद पंजाब पुलिस को आधुनिक हथियार मिल चुके थे लेकिन जैसे ही इन हथियारों का इस्तेमाल शुरू हुआ, तो पुलिस प्रशासन और सरकार के खिलाफ आवाज़ें उठनी शुरू हो गईं। इधर केंद्र सरकार भी समझौते के आधार पर इस पूरे मामले का हल निकालना चाहती थी, लेकिन गिल का मानना था कि समझौतों से आतंकवाद और भी तेजी से फैलेगा। पंजाब में मार्च 1988 में आतंकी घटनाओं में 288 लोगों की मौत हुई, जिनमें 25 पुलिस अधिकारी थे।
अप्रैल 1988 में 259 आम नागरिकों की जान गई, और 25 पुलिसकर्मी भी शहीद हो गए। गिल के मुताबिक यह सब इसलिए हो रहा था क्योंकि सरकार समझौते का रास्ता अपना रही थी, जिससे आतंकियों का मनोबल बढ़ रहा था। इसके अलावा सरकार ने अभी तक पुलिस को आतंकियों से लड़ने के लिए खुली छूट नहीं दी थी। उधर 4 मई 1988 को केंद्र सरकार ने समझौते के तहत 40 हाई-प्रोफाइल खालिस्तानी आतिंकियों को रिहा कर दिया। इनमें एक नाम जसवीर सिंह रोडे का भी था, जो जरनैल सिंह भिंडरावाले का भतीजा था। इन आतंकियों को छोड़े जाने के बाद वो दोबारा स्वर्ण मंदिर के अंदर जा घुसे। यही नहीं SGPC द्वारा जसवीर सिंह रोडे को स्वर्ण मंदिर का जथ्थेदार भी बना दिया गया।
आतंकियों के स्वर्ण मंदिर में एक बार फिर घुसने के बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी को लग रहा था कि अगर मामला जल्दी नहीं संभाला गया तो स्थिति फिर से ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी हो जाएगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि रिबेरो अब पंजाब की स्थिति पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं। इन हालातों को देखते हुए केंद्र सरकार ने केपीएस गिल पर भरोसा करते हुए उनका प्रमोशन कर दिया और उन्हें पंजाब का डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) बना दिया गया और रिबेरो को पंजाब के गवर्नर सिद्धार्थ शंकर राय का सलाहकार नियुक्त कर दिया गया।
ऑपरेशन ब्लैक थंडर
अब आतंकी स्वर्ण मंदिर में घुस चुके थे। राजीव गांधी किसी भी सूरत में इसे आतंकियों से मुक्त कराना चाहते थे। उन्होंने दिल्ली में एक बैठक बुलाई, जिसमें के.पी.एस. गिल, रिबेरो और कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। बैठक में राजीव गांधी ने पूछा कि स्वर्ण मंदिर में घुसे आतंकियों को कैसे बाहर निकाला जाए। उस बैठक में गिल से पद में ऊंचे कई अधिकारी भी शामिल थे, लेकिन किसी ने इस योजना के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा। गिल पहले से ही पूरा होमवर्क करके आए थे। जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने एक नक्शा निकाला और इंटेलिजेंस के जरिए गोल्डन टेंपल के भीतर की पूरी जानकारी साझा की। गिल ने समझाते हुए कहा कि इस इलाके में आतंकियों का कब्ज़ा है। हम एक विशेष द्वार से अंदर घुसेंगे और पंजाब पुलिस तथा पैरामिलिट्री बलों के साथ मिलकर ऑपरेशन को अंजाम देंगे।
के.पी.एस. गिल ने अनुरोध किया कि ऑपरेशन के दौरान सेना को तैनात न किया जाए, जैसा ऑपरेशन ब्लू स्टार में किया गया था। इसके अलावा, गिल ने यह भी प्रस्ताव रखा कि पूरे ऑपरेशन के दौरान मीडिया पर प्रतिबंध न लगाया जाए और उन्हें पूर्ण कवरेज की अनुमति दी जाए। उनका मानना था कि मीडिया कवरेज से अफवाहें नहीं फैलेंगी और लोगों को हालात की सही जानकारी मिलती रहेगी। राजीव गांधी ने के.पी.एस. गिल के सभी प्रस्तावों पर सहमति जताई। पहले तो इस अभियान को गिल प्लान कहा गया लेकिन बाद में इसे ऑप्रेशन ब्लैक थंडर II नाम दिया गया। ऐसा ही एक ऑपरेशन साल 1986 में भी किया गया था जिसे ऑप्रेशन ब्लैक थंडर कहा जाता है।
9 मई 1988 की तारीख और सुबह का वक्त था। अचानक स्वर्ण मंदिर के बाहर छिपे आतंकियों ने गोलियां चलानी शुरु कर दीं। एक गोली CRPF के DIG एस.एस. विर्क को जा लगी। विर्क को फौरन अस्पताल ले जाया गया। जैसे ही ये खबर बाहर आई, मंदिर के चारों ओर तैनात सुरक्षाबलों ने जवाबी फायरिंग शुरू कर दी। हालात बिगड़ते देख दोपहर 3 बजे अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर सरबजीत सिंह ने कर्फ्यू लगा दिया। इसी बीच SSP अरोड़ा ने राज्यपाल के सलाहकार जूलियो रिबेरो से मंदिर के अंदर घुसकर आतंकियों को पकड़ने की इजाज़त मांगी लेकिन उन्हें कहा गया कि वो दिल्ली से आने वाले आदेश का इंतज़ार करें। दिल्ली में उस वक्त गृह मंत्री बूटा सिंह की अध्यक्षता में एक इमरजेंसी मीटिंग चल रही थी। फैसला हुआ कि एनएसजी कमांडो को तुरंत अमृतसर भेजा जाए। उसी रात एनएसजी की टीम सुशील नंदा की अगुवाई में अमृतसर पहुंच गई। उन्होंने मंदिर के पास एक ऊंची इमारत पर मोर्चा संभाल लिया, जहां से पूरा स्वर्ण मंदिर साफ नजर आ रहा था। CRPF और पंजाब पुलिस ने भी पास के ब्रह्मबूटा अखाड़े में डेरा डाल लिया। लेकिन इस बीच पंजाब पुलिस के डीजीपी के.पी.एस. गिल गायब थे।
रिबेरो अपनी आत्मकथा 'Bullet For Bullet' में लिखते हैं कि गिल का इस तरह अचानक ग़ायब हो जाना कोई नई बात नहीं थी। फिलहाल रिबेरो ही पूरी स्थिति संभाल रहे थे। उन्होंने स्थानीय अफसरों के साथ बैठक कर तय किया कि कुछ दिनों तक मंदिर को घेर कर रखा जाएगा ताकि अंदर के आतंकी थक जाएं। जब रिबेरो ये योजना लेकर दिल्ली पहुंचे, तब तक गिल वापस नजर आने लगे। अब पूरे ऑपरेशन की कमान उन्होंने अपने हाथ में ले ली। दिल्ली में एक बड़ी मीटिंग हुई, जिसमें प्रधानमंत्री राजीव गांधी, गृह मंत्री बूटा सिंह और गिल समेत कई बड़े अधिकारी मौजूद थे। फैसला हुआ कि इस बार मंदिर के अंदर सेना नहीं भेजी जाएगी, बल्कि बाहर से ही घेराबंदी की जाएगी। स्वर्ण मंदिर की बिजली और पानी की सप्लाई काट दी गई। पांचवें दिन तक गिल का धैर्य जवाब देने लगा था। तभी एनएसजी ने मंदिर के अंदर मौजूद आतंकियों के मनोबल को तोड़ने के लिए ज़ोरदार धमाके करने वाले हथियारों का इस्तेमाल शुरू किया। चरमपंथी नेता जगीर सिंह और उसके दो साथियों को दूर से गोली मारी गई। उनके शव परिक्रमा के रास्ते पर पड़े रहे, जिससे अंदर के लोग और डर गए।
10 मई 1988 को एक दिन का सीज़फायर घोषित किया गया ताकि मंदिर में फंसे आम श्रद्धालु बाहर आ सकें। आतंकियों ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। लगभग 940 लोग सुरक्षित बाहर निकल आए। इस बार ऑपरेशन को लाइव टीवी पर दिखाया जा रहा था ताकि ब्लू स्टार जैसी अफवाहें न फैलें। 13 मई 1988 तक घेराबंदी जारी रही, लेकिन आतंकियों ने आत्मसमर्पण के कोई संकेत नहीं दिए। ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसे इस बार फोन लाइनें काटी नहीं गई थीं, बल्कि उनसे आतंकियों से बात की जा रही थी। 15 मई को एक बार फिर सीजफायर का ऐलान किया गया और आतंकियों से बाहर आने की अपील की गई।
आखिरकार अंदर बैठे आतंकी टूट गए और कई आतंकियों ने अपने हथियार डाल दिए और परिक्रमा से बाहर निकलकर गुरु रामदास सराय की ओर बढ़ने लगे। लगभग 146 आतंकियों ने निर्देशों का पालन किया, लेकिन 47 आतंकियों ने तय रास्ता छोड़कर हरमंदिर साहिब के अंदर प्रवेश कर लिया। सुरक्षाबलों को हरमंदिर साहिब की तरफ गोली चलाने की सख्त मनाही थी। यहां तक कि ब्लैंक कारतूस तक चलाने की इजाजत नहीं थी। बाद में पूछताछ में पता चला कि करताज सिंह ठंडे नाम का एक आतंकी, जो पहले भारतीय सेना में था, बाकी आतंकियों को धमका रहा था कि अगर वो उसके पीछे नहीं आए तो वो उन्हें गोली मार देगा। ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद उसने सेना छोड़ दी थी। 18 मई 1988 के दिन जब बाकी आतंकियों ने आत्मसमर्पण किया, तब करताज सिंह ने खुद को गोली मार ली। बचे हुए आतंकवादी हाथ ऊपर उठाए एक कतार में बाहर आए, तो पूरा दृश्य टीवी पर दिखाया गया। पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे एक खूनी संघर्ष बिना किसी बड़े नुकसान के खत्म हुआ। ऑपरेशन ब्लैक थंडर ने न सिर्फ पंजाब में शांति बहाल की, बल्कि ये भी साबित कर दिया कि सख़्ती से ज़्यादा समझदारी से लड़ी गई लड़ाई ज़्यादा असरदार होती है और इस कामयाबी का सेहरा पंजाब के डीजीपी केपीएस गिल के सिर सजा।
गिल को बर्खास्त करने के लिए जब उड़ी थी फ्लाइट
ऑपरेशन ब्लैक थंडर खत्म हो चुका था लेकिन इसके बाद के.पी.एस. गिल के खिलाफ दिल्ली के हुक्मरानों के कानों तले एक ऐसी अफवाह पहुँची, जिसके बाद दिल्ली से एक फ्लाइट उड़ी। इस फ्लाइट में तब के होम मिनिस्टर बूटा सिंह, स्टेट होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम और इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर शामिल थे। हुआ ये था कि ऑपरेशन ब्लैक थंडर के बाद राजीव गांधी सरकार चाहती थी कि गोल्डन टेंपल के भीतर की स्थिति को मीडिया में दिखाया जाए लेकिन के.पी.एस. गिल का मानना था कि स्वर्ण मंदिर के भीतर जो नुकसान हुआ है, उसे ठीक करके ही मीडिया को अंदर जाने की अनुमति दी जाए। गिल का यह भी तर्क था कि अंदर की फिलहाल स्थिति देखकर हालात फिर से असामान्य हो सकते हैं।
काफी चर्चा के बाद राजीव गांधी सरकार और के.पी.एस. गिल के बीच यह तय हुआ कि परिसर के अंदर सरकारी टीवी चैनल दूरदर्शन की टीम जाएगी और अंदर के हालात की रिकॉर्डिंग करेगी। लेकिन कुछ दिनों बाद बात दिल्ली पहुंची कि के.पी.एस. गिल ने दूरदर्शन को स्वर्ण मंदिर परिसर की रिकॉर्डिंग करने से मना कर दिया। एक और बात थी जिससे दिल्ली में बैठी सरकार गिल से नाराज़ थी। ऑपरेशन ब्लैक थंडर के बाद अंदर जो भी सोना रखा था, उसे के.पी.एस. गिल SGPC (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी) के हवाले करना चाहते थे। वह नहीं चाहते थे कि इसे पंजाब पुलिस हाथ लगाए या फिर स्टेट ट्रेजरी के पास भेजा जाए, ताकि उन पर यह आरोप न लगे कि स्वर्ण मंदिर के अंदर जितना सोना था, बाहर आने तक वह कम हो गया। गिल का मानना था कि अगर ऐसा आरोप पुलिस पर लगा तो पंजाब के भीतर बैठे खालिस्तानियों को फिर से उपद्रव मचाने का मौका मिल जाएगा।
यह बात भी दिल्ली तक पहुंची और कहा जाने लगा कि के.पी.एस. गिल अपनी मनमानी कर रहे हैं। इन्हीं कारणों से होम मिनिस्टर बूटा सिंह, स्टेट होम मिनिस्टर पी. चिदंबरम और इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर अमृतसर पहुंचे ताकि के.पी.एस. गिल को बर्खास्त किया जा सके। के.पी.एस.गिल को तलब किया गया और मीटिंग के दौरान यह सारी बातें बताई गईं। गिल यह बातें सुनकर तमतमा उठे। उन्होंने कहा कि दूरदर्शन को रिकॉर्डिंग की अनुमति दी गई थी, बस उनके पास बैटरी बैकअप कम था। इसके अलावा उन्होंने गोल्डन टेंपल के भीतर के सोने को SGPC के हवाले करने के पीछे का तर्क भी दिया। दिल्ली से आए मंत्रियों को लगा कि गिल वाकई तार्किक बात कर रहे हैं और उनके खिलाफ दिल्ली में साज़िश के तहत अफवाहें फैलाई गई थीं। इसी बीच बूटा सिंह ने के.पी.एस. गिल से कहा कि वह स्वर्ण मंदिर का मुआयना करना चाहते हैं। गिल ने कहा, 'बिलकुल कर सकते हैं।' बूटा सिंह वहां गए और उन्हें सब कुछ सामान्य नजर आया। दिल्ली पहुंचकर बूटा सिंह और चिदंबरम ने राजीव गांधी को सारी बातें बताईं। गिल को बर्खास्त करने पर जो विचार चल रहा था, उसे रोक लिया गया। के.पी.एस. गिल का मनोबल न टूटे, इसके लिए राजीव गांधी ने कैबिनेट सेक्रेटरी के माध्यम से ऑपरेशन ब्लैक थंडर को सफल बनाने पर उन्हें 'लेटर ऑफ एप्रीसिएशन' भेजा। स्वर्ण मंदिर से जुड़ी कार्रवाइयों का दौर या खत्म हुआ और आतंकियों को खदेड़ने के बाद अब के.पी.एस. गिल के सामने एक नई चुनौती थी पूरे पंजाब की स्थिती को सामन्य करने की चुनौती और इसके लिए राजीव गांधी सरकार ने केपीएस गिल को पूरी छूट दे दी।
खौफ, खून और के.पी.एस. गिल
कहा जाता है कि उस दौर में पंजाब पुलिस के उच्च पदों पर बैठे अधिकारी आतंकियों से पर्दे के पीछे लड़ रहे थे। लेकिन के.पी.एस. गिल ने यह सोच बदल दी। उन्होंने महसूस किया कि जमीनी कर्मचारियों के मनोबल को बढ़ाने के लिए उन्हें सामने जाकर साथ लड़ना होगा। DGP रहते हुए गिल का कार्यालय चंडीगढ़ में था, लेकिन जहां भी आतंकी हमलों की खबर आती, वो हेलीकॉप्टर से तुरंत वहां पहुँच जाते। वह अक्सर खुद थानेदारों और जवानों के साथ मिलकर मोर्चा लेते और सामने से लड़ते। पंजाब के पत्रकार जतिंदर पन्नू बताते हैं कि तरनतारण के पास "लल्लू घूमन” नाम का एक गांव था जहां 72 घंटे से पुलिस और आतंकियों के बीच मुठभेड़ चल रही थी। रात का वक्त था और आतंकी गन्ने के खेतों में छिपकर हमले कर रखे थे। वहीं पुलिस ट्रैक्टरों की हेडलाइटें जलाकर पलटवार कर रही थी। इसी बीच के.पी.एस. गिल वहां पहुंच गए। पत्रकार जतिंदर सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि गिल एक बोरिंग या ट्यूबवेल की छत पर खड़े होकर लाइट मशीन गन से गोलियां चला रहे थे। यही गिल का काम करने का अंदाज था। वह अपने साथी पुलिस कर्मियों का हौंसला बढ़ाने के लिए खुद फ्रंट पर उतर आते थे।
के.पी.एस. गिल पंजाब पुलिस में सुधार लाने की पूरी कोशिश कर रहे थे। उन्हें लगा कि पुलिस के पास Human intelligence यानी मुखबिरों की कमी है। उनका मानना था कि अगर गाँव-गाँव में आम लोग मुखबिर बनकर आतंकियों के ठिकानों की सूचना दें तो आतंकियों का सफाया आसान होगा। लेकिन हालात ऐसे थे कि लोग मुखबिरी करने से डरते थे। गिल ने यहां पैसे का सहारा लिया और घोषणा की कि जो कोई भी आतंकियों की सूचना देगा उसे नकद इनाम दिया जाएगा देखते ही देखते पूरे पंजाब में मुखबिर फैल गए और पुलिस के पास आतंकियों के ठिकानों की सूचनाएँ आने लगीं। गिल ने देखा कि सूचनाएं तो मिल रही हैं पर कार्रवाई में देरी हो रही है। अक्सर सूचना मिलती, थाने से हेडक्वार्टर को बता कर कार्रवाई होती और तब तक बहुत देर हो जाती।
इस समस्या का हल निकालने के लिए केपीएस गिल ने थानों को तीन श्रेणियों में बाँट दिया। पहली श्रेणी में वो थाने जहां आतंकवादी गतिविधियां कम थीं। दूसरी श्रेणी में वो जहाँ गतिविधियां बढ़ रही थीं। तीसरी श्रेणी में वो थाने आते थे जहां आतंकी गतिविधियां सबसे ज़्यादा थीं। जहां गतिविधियां ज़्यादा थीं वहां बल की तैनाती बढ़ा दी गई और तेज़तर्रार अधिकारियों को वहां भेजा गया। इन कदमों से पुलिस Action Time काफी घट गया। साथ ही पुलिस में जवानों की संख्या भी बढ़ाई गई और जब गिल पंजाब के DGP बने तो पुलिस बल लगभग 35 हज़ार था, जिसे बढ़ाकर करीब 60 हज़ार कर दिया गया। इससे पंजाब के नौजवान खालिस्तानियों से प्रभावित होने के बजाय पुलिस की नौकरी में आने के लिए प्रेरित होने लगे।
इधर आतंकियों के पास बुलेटप्रूफ गाड़ियां थीं, लेकिन पंजाब पुलिस के पास ऐसा कुछ नहीं था। इसी वजह से पुलिस अधिकारियों की ज़्यादा जानें जा रही थीं। के.पी.एस. गिल ने दिल्ली के गृह मंत्रालय से बुलेटप्रूफ वाहनों की मांग की, लेकिन उस समय देश में उनका उत्पादन बहुत कम था। मंत्रालय ने कहा कि उत्पादन सीमित है और फिलहाल एस.पी.जी. को ही दिया जा रहा है। गिल के पास इंतज़ार का समय नहीं था। इस चुनौती को पार करने में उनके खास सहयोगी और अधिकारी के.के. अत्री ने मदद की। अत्री ने पंजाब आर्म्ड फोर्सेज के मुख्यालय, जालंधर में एक रिसर्च सेंटर बनवाया। कुछ ही दिनों में उनके नेतृत्व में एक बुलेटप्रूफ ट्रैक्टर और एक बुलेटप्रूफ टॉवर तैयार कर लिया गया। इस टॉवर को कहीं भी आसानी से खड़ा किया जा सकता था और हाइड्रोलिक मशीन की मदद से इसकी ऊँचाई 20-25 फीट तक बढ़ाई जा सकती थी। अब आतंकियों पर ऊंचाई से नजर रखी जा सकती थी। कहा जाता है कि गन्ने के खेतों में छिपे आतंकियों से निपटने में यह बुलेटप्रूफ ट्रैक्टर और टॉवर बहुत काम आए। के.पी.एस. गिल का तरीका साफ और कारगर था। वह जमीन पर उतरकर और प्रणाली में सुधार लाकर पंजाब में शांति बहाल करने के लिए लगातार जुटे रहे।
के.पी.एस. गिल की पुलिसिंग के कई किस्से मशहूर तरीके रहे हैं। उनमें से एक तरीका काफी खास था। के.पी.एस. गिल ने पुलिस पेट्रोलिंग का एक नया तरीका ढूंढा था, जिसे “फोकल पॉइंट पेट्रोलिंग” कहा जाता है। जिन-जिन इलाकों में आतंकियों का गढ़ होता, वहां बीच चौराहे पर गिल देर रात अचानक मीटिंग बुला लेते थे। अब किसी इलाके में सूबे का डी.जी.पी. पहुंचा हो तो ज़ाहिर सी बात है आस-पास के तमाम थानों के लोगों को उस मीटिंग में शामिल होना होता था। अब उस इलाके के हर रास्ते से सिर्फ और सिर्फ पुलिस की गाड़ियों का काफ़िला गुज़रने लगता था। इससे दो फ़ायदे होते थे। एक तो यह कि आतंकियों को लगता कि पुलिस चौकन्नी है। दूसरा, इसका मनोवैज्ञानिक असर आम लोगों पर पड़ता। उन्हें लगता कि पुलिस उनकी सुरक्षा में चौकसी से लगी हुई है। जिससे वो बेफिक्र रहते।
के.पी.एस. गिल ने अब तक जो भी प्रयास किए थे, उसका परिणाम दिखने लगा था। साउथ एशिया में आतंकवाद पर नजर रखने वाली organization SATP (South Asia Terrorism Portal) के मुताबिक साल 1988 के जनवरी से जून महीने के बीच आतंकियों ने जहाँ 1266 नागरिकों की हत्या की थी, वहीं अगले छह महीनों यानी जुलाई से दिसंबर 1988 के बीच यह संख्या घटकर 688 रह गई थी। अभी भी हत्याएँ हो रही थीं, गिल इससे परेशान तो थे, लेकिन दूसरी तरफ हत्याओं पर नियंत्रण पाया जाने लगा था। लाभ सिंह जैसा खूंखार आतंकी, जो अपने नाम के आगे “जनरल” लगाता था, उसे पुलिस ने मार गिराया था। यह वही लाभ सिंह था जो खालिस्तान कमांडो फोर्स का सरगना था। इसी ने के.पी.एस. गिल से पहले पंजाब के डी.जी.पी. रहे रिबेरो की हत्या करने की कोशिश की थी, जिसमें उनकी जान तो बच गई थी लेकिन इससे पंजाब में आतंक को खत्म करने का उनका मनोबल टूट चुका था। जिसका ज़िक्र हम पहले कर चुके हैं। इसी तरह खालिस्तानी आतंकी अवतार सिंह ब्रह्मा को भी पुलिस ने मार गिराया था।
आतंक के कई टॉप पोस्टर बॉय मारे जा चुके थे। के.पी.एस. गिल बताते हैं कि जनवरी 1989 आते-आते पंजाब के सिर्फ तीन ज़िलों में ही आतंकी बचे थे , गुरदासपुर, अमृतसर और फिरोजपुर। अब गिल ने इन तीनों जगह मौजूद आतंकियों को खत्म करने के लिए एक ऑपरेशन लॉन्च किया था, जिसका नाम था “कॉम्पोज़िट स्पेशल ऑपरेशन”। इसमें पंजाब पुलिस के साथ सी.आर.पी.एफ. और बी.एस.एफ. के जवानों ने इन तीनों ज़िलों के करीब 5 हजार से ज्यादा गांवों की तलाशी ली। इसके अलावा करीब 8 हजार से ज्यादा फ़ार्महाउस पर छापा मारा गया। इस हमले के बाद आतंकियों की कमर टूट चुकी थी। उनके हथियार जब्त किए जा चुके थे। ख़ूंखार आतंकियों को मौत की नींद सुला दिया गया था लेकिन यह ऑपरेशन अपने अंतिम दौर में ही था कि केंद्र में सरकार बदल गई। जनता पार्टी की सरकार बनी। विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के नए प्रधानमंत्री बने। गिल बताते हैं कि वी.पी. सिंह पंजाब में आतंकवाद के मामले को लेकर ज़्यादा गंभीर नहीं थे। केपीएस गिल बताते हैं कि वीपी सिंह की सरकार में हमने पहले आतंकवाद को निपटाने के लिए जो कदम उठाए थे वह सुस्त पड़ने लगे। आतंकवादियों का हौसला बढ़ चुका था और पंजाब में आतंकवाद फिर से सर उठाने लगा था।
पीएम चंद्रशेखर ने केपीएस गिल को हटाया
इधर केन्द्र में वी.पी. सिंह की सरकार एक साल का भी कार्यकाल पूरा किए बिना गिर गई। इसके बाद 10 नवम्बर 1990 को देश को एक नए प्रधानमंत्री मिले, चन्द्रशेखर। पंजाब को लेकर चन्द्रशेखर की नीति थी कि मिलिटेंट्स के साथ समझौता किया जाए। वो बातचीत में विश्वास रखते थे लेकिन के.पी.एस. गिल इसके बिल्कुल भी पक्षधर नहीं थे। वह आतंकियों को खून के बदले खून से जवाब देने में विश्वास रखते थे। चन्द्रशेखर ने के.पी.एस. गिल को दिल्ली बुलाया और कहा कि हमारी मुलाकात मिलिटेंट ग्रुप से कराइए। गिल इस बात से बिल्कुल भी खुश नहीं थे, फिर भी उन्होंने समझौते के तहत पंजाब के मिलिटेंट समूहों के साथ संवाद किया।
खालिस्तानी समर्थक गुटों की तरफ से मांग रखी गई कि अगर केपीएस गिल को पंजाब से बाहर कर दिया जाए तो वो सूबे में शांति बहाल कर देंगे। जिसके चलते चन्द्रशेखर सरकार ने 18 दिसम्बर 1990 को के.पी.एस. गिल को दिल्ली बुला लिया। डी.एस. मंगट पंजाब के नए डीजीपी बने। जहां-जहां सेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों जैसे सीआरपीएफ और बीएसएफ की तैनाती थी, उन्हें भी धीरे-धीरे कम कर दिया गया लेकिन खालिस्तानी मिलिटेंट्स ने जो शांति वादा किया था, वैसा बिल्कुल नहीं हुआ। साल 1990 से लेकर 1991 के बीच पंजाब में 6 हजार से ज़्यादा आम नागरिकों की हत्या कर दी गई। आतंकियों ने पंजाब के नए डीजीपी डी.एस. मंगत के डॉक्टर बेटे को भी नहीं छोड़ा। उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया गया। पूरे पंजाब में एक बार फिर आम लोगों का खून बहने लगा।
चंद्रशखर को अभी प्रधानमंत्री बने सात महीने ही हुए थे कि उनकी सरकार गिर गई। देश में एक बार फिर से लोकसभा चुनाव का बिगुल बजा इन्ही चुनावों के दौरान खबर आई कि 21 मई 1991 को देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हो गई। यह खबर सुनकर पूरा देश स्तब्ध रह गया। जैसे-तैसे चुनाव संपन्न हुए। कांग्रेस की सरकार बनी और 21 जून 1991 को पी.वी. नरसिम्हा राव देश के नए प्रधानमंत्री बने।
पीवी नरसिंहा राव ने तय किया कि फरवरी 1992 में पंजाब विधानसभा का चुनाव कराया जाएगा। चुनाव ठीक ढंग से संपन्न हो इसके लिए नरसिम्हा राव पंजाब की स्थिति की समीक्षा कर रहे थे। उन्होंने तब के इंटेलिजेंस ब्यूरो के डायरेक्टर एम.के नारायणन से बात की और नारायणन ने राव से कहा कि पंजाब के हालात को केवल एक ही व्यक्ति संभाल सकता है और वो हैं के.पी.एस. गिल। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि पिछली सरकार ने गिल के साथ जो व्यवहार किया है, उससे वो काफी दुखी हैं। नरसिम्हा राव ने नारायणन से कहा कि आप गिल को पंजाब जाने के लिए मनाइए। नारायणन ने गिल से बात की और आखिरकार गिल एक बार फिर पंजाब में आतंकवाद के सफाए के लिए भेज दिए गए। उधर सुरेन्द्र नाथ को पंजाब का नया गवर्नर नियुक्त किया गया। नरसिम्हा राव ने गिल को खुली छूट दे दी। उन्होंने कहा कि दिल्ली से कोई दखल नहीं दिया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि आतंकियों के साथ कोई भी शांति वार्ता नहीं की जाएगी।
कैसे करवाए चुनाव?
इधर साल 1992 के फरवरी महीने में प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने पंजाब में विधानसभा चुनाव कराने का फैसला किया लेकिन इससे पहले लोकसभा चुनाव के दौरान पंजाब में 26 उम्मीदवारों की हत्या कर दी गई थी। उस वक्त केपीएस गिल पंजाब के डीजीपी नहीं थे लेकिन अब विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों की सुरक्षा उनकी जिम्मेदारी थी। विधानसभा चुनाव के दौरान CRPF और BSF की कुल 220 कंपनी फोर्स ही उम्मीदवारों की सुरक्षा के लिए उपलब्ध थीं। एक कंपनी में 80 से 100 जवान ही होते हैं। ऐसे में गिल को समझ आया कि सभी उम्मीदवारों की सुरक्षा करना मुश्किल होगा। लिहाजा केपीएस गिल ने एक तरकीब निकाली। गिल ने चुनाव में नॉन सीरियस कैंडिडेट्स को चुनाव प्रक्रिया से हटाने के लिए एक प्लान बनाया, जब भी कोई कैंडिडेट नामांकन भरने आता तो उनसे एक अतिरिक्त फॉर्म भरवाया जाता, जिसमें लिखा होता कि सूबे की स्थिति ठीक नहीं है और पिछले चुनाव में 26 लोगों की हत्या हुई थी, क्या आप सचमुच चुनाव लड़ने को तैयार हैं? हां या नहीं? इस एक फॉर्म की वजह से कई ऐसे उम्मीदवार जो नॉन सीरियस थे उन्होंने अपना नामांकन भरने से ही इनकार कर दिया।
इसके अलावा, गिल ने एक और स्कीम निकाली कि चुनाव के दौरान अगर कोई उम्मीदवार पंजाब से बाहर घूमने जाता है तो उसका खर्चा पंजाब पुलिस उठाएगी। नॉन सीरियस और निर्दलिय उम्मीदवारों ने इस ऑप्शन को ऑप्ट किया और उनकी सुरक्षा पुख्ता की जा सकी लेकिन पंजाब के 'अजीत' अखबार ने खबर छाप दी कि गिल उम्मीदवारों को गिरफ्तार करवा रहे हैं। यह खबर पढ़कर पंजाब के उस वक्त के राज्यपाल सुरेंद्रनाथ ने गिल को मिलने के लिए बुलाया। दोनों के बीच लंबी और तीखी बहस हुई। राज्यपाल सुरेंद्रनाथ गिल से कह रहे थे कि वो चुनाव स्थगित करा देंगे लेकिन आखिर में ऐसा नहीं हुआ। चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ी और गिल की रणनीति से गैर-गंभीर उम्मीदवारों की संख्या में वाकई कमी आई, जिससे पुलिस बल का बेहतर उपयोग किया जा सका।
पंजाब विधानसभा चुनाव अब बिलकुल करीब थे। आतंकियों की चाल थी कि पंजाब में मतदान प्रतिशत बेहद कम हो और लोग घरों से बाहर न निकलें। विदेशों में बैठे खालिस्तानी समर्थक पंजाब में चुनावों के खिलाफ थे। चुनाव 19 फरवरी 1992 को होने वाले थे। 8 फरवरी को खबर आई कि आतंकियों ने चुनाव ड्यूटी के लिए सिलेक्टेड तीन शिक्षकों की हत्या कर दी। चुनाव से ठीक दो दिन पहले खालिस्तानी चरमपंथियों ने पंजाब में दो दिन के कर्फ्यू का ऐलान किया और धमकी दी कि जो भी वोट डालने घर से निकलेगा, उसे गोलियों से भून दिया जाएगा।
5 फरवरी से 19 फरवरी के बीच 18 जगहों पर बम धमाके किए गए, जिनमें 16 लोगों की मौत हुई। आतंकियों ने चुनाव को प्रभावित करने की हर संभव कोशिश कीय़ बावजूद इसके पंजाब में चुनाव हुए और मतदान प्रतिशत 23.82 फ़ीसदी रहा, जो आतंकियों की धमकियों के बीच भी एक बड़ी संख्या थी। चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनी और पंजाब को कई सालों बाद एक नया मुख्यमंत्री मिला और उनका नाम बेअंत सिंह था। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद बेअंत सिंह की के.पी.एस. गिल से मुलाकात हुई। बेअंत सिंह ने उन पर भरोसा जताते हुए कहा कि पंजाब से आतंकवाद के सफाए में सरकार पूरी तरह उनका साथ देगी। उन्होंने गिल को अपने तरीके से काम करने की पूरी छूट दे दी।
आतंक का अंत और मुख्यमंत्री की हत्या
साल 1992 की शुरुआत में बेअंत सिंह चाहते थे कि पंजाब में खून-खराबा बंद हो। उन्होंने आतंकवाद का रास्ता अपना चुके नौजवानों सरंडर करने के लिए 13 अप्रैल 1992 यानी बैसाखी तक का समय दिया और ये भी ऐलान किया कि जो भी सरंडर करेगा उनसे अच्छा व्यवहार किया जाएगा। यदि किसी ने बैसाखी के बाद भी आतंक का रास्ता नहीं छोड़ा तो प्रशासन को कड़ा आदेश दिया जाएगा। के.पी.एस. गिल बताते हैं कि बैसाखी तक गोलीबारी बहुत कम हुई। 13 अप्रैल आते-आते सैकड़ों नौजवानों ने आत्मसमर्पण किया लेकिन फिर भी आतंकवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। तब भी कुछ आतंकी पंजाब में घूम रहे थे।
आनंदपुर साहिब से मुख्यमंत्री बेअंत सिंह ने अपने वादे अनुसार, ऐलान किया है कि हमने शांति का रास्ता चुना था लेकिन जिन लोगों ने सरेंडर नहीं किया उन्हें चेताते हुए बेअंत सिंह ने कहा कि अब हम पुलिस प्रशासन को खुली छूट देते हैं कि वह कड़ी से कड़ी कार्रवाई करे। बेअंत सिंह का आदेश आया कि शाम ढलते ही लोग अपने-अपने घरों में ठप हो जाएं और जो सड़क पर निकलेंगे उन्हें पुलिस नहीं छोड़ेगी। उस दौर में लोग सूर्यास्त से पहले ही घर में बंद हो जाते थे। पुलिस को गोली चलाने की शर्तों पर खुली छूट मिल गई। अगले सात माह में पंजाब पुलिस और के.पी.एस. गिल ने पूरे प्रदेश में आतंकियों की कमर तोड़ दी।
आतंकवाद पर नजर रखने वाली organization SATP (South Asia Terrorism Portal) के मुताबिक साल 1992 से 1993 के बीच लगभग 2911 आतंकी मारे गए। इस तरह के.पी.एस. गिल के नेतृत्व में पंजाब से आतंक का काफी हद तक सफाया हो चुका था। खालिस्तान की मांग करने वालों की आवाज दबा दी गई लेकिन सिखों का एक धड़ा बेअंत सिंह और केपीएस गिल से काफी नाराज था। उनका मानना था कि जिन लोगों को पुलिस ने आतंकी बताकर मारा है उनमें से ज्यादातर आम घरों के बेकसूर लड़के थे।
यही वजह रही कि 31 अगस्त 1995 के दिन चंडीगढ़ सिविल सेक्रेटेरियेट के बाहर एक मानव बम के जरिए उनकी हत्या कर दी गई। ये आत्मघाती हमलावर पंजाब पुलिस का ही एक सिपाही था, जिसका नाम दिलावर सिंह था। इस हमले में बेअंत सिंह के साथ वहां मौजूद 17 अन्य लोगों की भी जान चली गई। इस पूरी घटना की जिम्मेदारी 'बब्बर खालसा' ने ली। यह साजिश विदेश में बैठे गिरोहियों ने योजनाबद्ध तरीके से की थी।
जसवंत सिंह खालड़ा का खुलासा
बेअंत सिंह और केपीएस गिल पर कई गंभीर आरोप भी लगाए गए, जिनके मुताबिक केपीएस गिल की पुलिस ने हज़ारों निर्दोष सिंख युवकों को आतंकवाद के खात्मे के नाम पर मौत के घाट उतार दिया था। 'Reduced to Ashes: The Insurgency and Human Rights in Punjab' के मुताबिक 16 जनवरी 1995 को अकाली दल ह्यूमन राइट्स विंग के ऐक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालड़ा (सतलुज फिल्म का मुख्य किरदार) ने चंडीगढ़ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने सनसनीखेज दावा किया कि पंजाब पुलिस ने करीब 2000 लावारिस लाशों का अवैध रूप से अंतिम संस्कार कर दिया है। जसवंत सिंह खालड़ा के इन दावों के पीछे की कहानी काफी चौंकाने वाली थी। दरअसल, जसवंत सिंह खालड़ा के एक करीबी दोस्त दारा सिंह को पुलिस ने गिरफ्तार किया और फिर खबर आई कि पुलिस ने उन्हें आतंकी बताकर एनकाउंटर में मार दिया। यह घटना खालड़ा को बहुत संदिग्ध लगी। उन्होंने अकेले ही इस मामले की जांच शुरू कर दी। जांच के दौरान उन्होंने पाया कि दारा सिंह का अंतिम संस्कार अमृतसर के दुर्ग्याणा मंदिर स्थित श्मशान घाट में अज्ञात शव के रूप में कर दिया गया था। इसके बाद खालड़ा का शक और गहरा गया और उन्होंने पुलिस की इन नाजायज गतिविधियों की तहकीकात तेज कर दी।
उन्होंने दुर्ग्याणा मंदिर श्मशान घाट में हुए अंतिम संस्कारों का रिकॉर्ड खंगालना शुरू किया, जहां से उन्हें हैरान कर देने वाले सबूत मिले। खालड़ा को पता चला कि सिर्फ साल 1992 में ही 300 शवों को अज्ञात बताकर जला दिया गया था। वहीं, अमृतसर के जन्म और मृत्यु रजिस्ट्रार कार्यालय के रिकॉर्ड में 112 शवों के नाम दर्ज थे जिनमें से 41 की मौत गोली लगने से हुई थी। जबकि 259 लोगों की मौत का कारण रिकॉर्ड में दर्ज ही नहीं था और सिर्फ 24 शवों की ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट मौजूद थी।
इसके बाद जसवंत सिंह खालड़ा ने पट्टी और तरनतारन के श्मशान घाटों की भी जांच की। पट्टी में उन्हें लकड़ियों का एक रजिस्टर मिला जिसमें हर शव की पहचान, पता, अंतिम संस्कार की तारीख और अंतिम संस्कार करने वाले व्यक्ति का नाम दर्ज था। रजिस्टर से यह सामने आया कि जनवरी 1991 से अक्टूबर 1994 के बीच पुलिस ने 538 शवों को "Unidentified" या "Unclaimed" बताकर जला दिया। तरनतारन में भी इसी तरह की घटनाएं मिलीं लेकिन वहां रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। इसके बाद 16 जनवरी 1995 को अकाली दल ह्यूमन राइट्स विंग ने चंडीगढ़ में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी जांच रिपोर्ट जारी की, जिस पर जसवंत सिंह खालड़ा और जसवंतपाल सिंह ढिल्लों के हस्ताक्षर थे। रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि साल 1991 से 1992 के बीच पट्टी, दुर्ग्याणा मंदिर और तरनतारन के श्मशान घाटों में जितनी लकड़ियां खरीदी गईं, उनके हिसाब से पट्टी में 400, तरनतारन में 700 और दुर्ग्याणा मंदिर में करीब 2000 शवों का अवैध रूप से अंतिम संस्कार किया गया।
जसवंत सिंह खालड़ा ने गिल और पंजाब पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि अगर इन आंकड़ों को पूरे पंजाब स्तर पर देखा जाए तो लगभग 20 से 25 हजार नौजवान अपने घरों से लापता हुए और कभी वापस नहीं लौटे। हालांकि केपीएस गिल ने इन सारे आरोपों को बेबुनियाद बताया था। लेकिन 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क, जसवंत सिंह खालड़ा को अगवा कर लिया गया। चश्मदीदों के मुताबिक, इन गाड़ियों में कुछ पुलिस अफसर सिविल ड्रेस में थे। इस घटना के बाद 2000 लावारिस लाशों के अवैध अंतिम संस्कार का पर्दाफाश करने का दावा करने वाले जसवंत सिंह खालड़ा हमेशा हमेशा के लिए गायब हो गए और आजतक उनकी लाश बरामद नहीं हुई।
इसके अलावा एमनेस्टी इंटरनेशनल ने के.पी.एस. गिल और पंजाब पुलिस पर सैकड़ों नौजवानों को अवैध तरीके से गिरफ्तार करने और उनकी हत्या करने का आरोप लगाया था। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट ने भी यह दावा किया कि के.पी.एस. गिल के नेतृत्व में पंजाब पुलिस ने आतंकवाद को खत्म करने की आड़ में सैकड़ों नौजवानों को परेशान किया था। साथ-साथ अवैध किलिंग्स के भी आरोप लगे थे।
सुपरकॉप पर दाग
निर्दोषों की हत्याओं के अलावा एक आरोप और था जिससे कोपीएस गिल के कैरेक्टर पर उंगली उठी। ये वो मामला था जब एक महिला IAS ने उनपर सेक्शुअल हैरेसमेंट का इल्ज़ाम लगाया। वो IAS लगातार कोर्ट का दरवाजा़ खटखटाती रही और तब जाकर 17 साल बाद केपीएस गिल को कोर्ट ने सज़ा सुनाई थी। यह बात साल 1988 के जुलाई महीने की है। उस समय केपीएस गिल पंजाब के डीजीपी थे। पंजाब में आतंकवादियों के खिलाफ उनका कहर जारी था। एक दिन पंजाब के गृह सचिव के घर पर एक पार्टी रखी गई थी। इस पार्टी में पंजाब सरकार के कई बड़े अफसर शामिल थे। इन्हीं में केपीएस गिल भी मौजूद थे।
उनके साथ वहां आईएएस अधिकारी रूपन दिओल बजाज भी थीं, जो उस वक्त पंजाब सरकार के वित्त विभाग में स्पेशल सेक्रेटरी के पद पर तैनात थीं। रुपन बजाज एक इंटरव्यू में बताती हैं कि केपीएस गिल ने मुझे बुलाया और कहा कि मेरे बगल वाली कुर्सी पर बैठो। मैं वहां गई और जैसे ही बैठने लगी, उन्होंने अपनी कुर्सी मेरी तरफ खींच ली। मुझे लगा कि कुछ ठीक नहीं है, इसलिए मैं तुरंत उठकर उस समूह में वापस चली गई जहां पहले बैठी हुई थी। करीब दस मिनट बाद केपीएस गिल मेरे पास आकर खड़े हो गए। उनके पैर मेरे घुटनों से बस चार इंच की दूरी पर थे। उन्होंने अपनी उंगली से इशारा करते हुए कहा कि उठो और मेरे साथ चलो। मैंने पूरे साहस के साथ उनके इस व्यवहार पर आपत्ति जताई और कहा कि मिस्टर गिल, आपकी हिम्मत कैसे हुई। आप आपत्तिजनक तरीके से व्यवहार कर रहे हैं। यहां से चले जाइए।
केपीएस गिल ने आदेश देने के अंदाज़ में कहा कि तुम उठो और तुरंत मेरे साथ चलो। मैं डर गई थी, क्योंकि उन्होंने मेरा रास्ता रोक रखा था और मैं उनके शरीर को छुए बिना अपनी कुर्सी से उठ नहीं सकती थी। मैंने अपनी कुर्सी को लगभग डेढ़ फीट पीछे धकेला और बगल में बैठी महिला के पास से निकलने के लिए मुड़ी। तभी केपीएस गिल ने मेरे पीछे के निजी अंग पर हाथ मारा। यह देखकर मैं तुरंत उठकर गृह सचिव के पास गई और कहा कि आपने किस तरह के लोगों को दावत पर बुलाया है। केपीएस गिल वहीं खड़े थे, लेकिन उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था।
रुपन बजाज कहती हैं कि मुझे केपीएस गिल का यह व्यवहार बिल्कुल भी पसंद नहीं आयाष। मैं वास्तव में इस मामले को पुलिस या कोर्ट तक नहीं ले जाना चाहती थी। मैं चाहती थी कि सरकार आचरण संहिता के तहत नैतिक भ्रष्टाचार के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई करे लेकिन उस समय के राज्यपाल एस.एस. रे से लेकर मुख्य सचिव आर.एस. ओझा तक ने इस घटना को बहुत हल्के में लिया। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। मुख्य सचिव आर.एस. ओझा ने तो यहां तक कह दिया कि ऐसी चीजें होती रहती हैं। खुद को खुशकिस्मत समझो, चीजें और खराब हो सकती थीं।
राज्यपाल और मुख्य सचिव के इस रवैये के बाद मैंने अदालत का रुख किया। मामला करीब 17 साल तक कोर्ट में फंसा रहा। लोअर कोर्ट से लड़ते-लड़ते मैं आखिरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची. और अंततः 17 साल बाद, यानी 27 जुलाई 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने केपीएस गिल को दोषी ठहराया. हालांकि कोर्ट ने उन्हें तीन महीने की सजा सुनाई थी, लेकिन बाद में इसे तीन साल की प्रोबेशन अवधि में बदल दिया गया. प्रोबेशन का मतलब था कि उन पर दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया और वे प्रोबेशन अधिकारी की निगरानी में अच्छे व्यवहार की शर्त पर रिहा रहेंगे. रूपन दिओल ने इन दो लाख रुपयों को महिला संगठन को दान कर दिया. लेकिन सोचिए जब ये सब हो रहा था उसके महज़ एक साल बाद 1989 को राजीव गांधी सरकार ने केपीएस गिल को पद्म श्री सम्मान से नवाज़ा था
रिटायर होने के बाद गिल
1995 में रिटायरमेंट के बाद के.पी.एस. गिल सलाहकार के तौर पर लगातार काम करते रहे। साल 2000 में श्रीलंका की तत्कालीन सरकार ने एल.टी.टी.ई. यानी Liberation of Tamil Tigers Elam के खिलाफ रणनीति तैयार करने के लिए भी के.पी.एस. गिल से मदद मांगी थी। साल 2002 में हुए गुजरात दंगों के बाद केंद्र में बैठी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने के.पी.एस. गिल को तब के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के सुरक्षा सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया था। गिल का काम सूबे में बढ़े साम्प्रदायिक तनाव को कम करने के लिए योजनाएं बनाना था। वह इस पद पर साल 2004 तक रहे।
साल 2013 में के.पी.एस. गिल पर एक किताब आई थी, जिसका नाम था “KPS Gill: The Paramount Cop”. इसके लेखक थे राहुल चंदन. इस किताब के प्रमोशन के दौरान दिए एक इंटरव्यू में जब उनसे गुजरात में उनके कार्यकाल के अनुभवों पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने नरेंद्र मोदी को क्लीनचिट देते हुए कहा था कि गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की कोई भूमिका नहीं थी। साल 2003 में केंद्र में बैठी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने के.पी.एस. गिल को असम का राज्यपाल बनाने का प्रस्ताव भेजा था लेकिन जब यह प्रस्ताव उस समय के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के पास पहुंचा, तो उन्होंने इसे ठुकरा दिया। वजह बताई गई कि असम में गिल का कार्यकाल काफी विवादास्पद रहा था।
साल 2006 में नक्सलियों से निपटने के लिए तत्कालीन रमन सिंह सरकार ने छत्तीसगढ़ में के.पी.एस. गिल से सुरक्षा सलाहकार के तौर पर मदद मांगी गई थी। बाद में मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में गिल ने इस भूमिका को लेकर कहा था कि तनख्वाह लो और बैठकर मजे करो। हालांकि, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने गिल के इस बयान को झूठा बताया था और कहा था कि उन्होंने तनख्वाह नहीं ली थी। गिल का कहना था कि पंजाब में मिली उनकी कामयाबी के आधार पर ही उन्हें सुरक्षा सलाहकार बनाया गया था।
अपनी रियाटरमेंट के बाद से ही केपीएस गिल आंतिकियों के निशाने पर थे, जिसके चलते उन्हें रिटायरमेंट के बाद जि़दगी भर z+ श्रेणी की सुरक्षा मुहैया करवाई गई थी। साल 1999 में एक आतंकी रछपाल सिंह को उनकी हत्या की साजिश के लिए गिरफ्तार किया गया था जिसके पास से 2 किलो RDX भी बरामद हुआ था। बकौल केपीएस गिल अतंकियों द्वारा 4-5 बार उन्हें मारने की कोशिश की गई थी लेकिन इन तमाम कोशिशों के बाद भी गिल 82 साल की उम्र तक मूंछों को तांव देते हुए जिए और 26 मई 2017 को यह खबर आई कि के.पी.एस. गिल का अचानक दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया और आज भी उनके इस दुनिया से चले जाने के बाद एक तरफ जहां उन्हें आतंकवाद का सफाया करने वाले सपरकॉप के तौर पर जाना जाता है। वहीं, पंजाब में ऐेसे लोग भी हैं जो उन्हें पंजाब का कसाई बताते हैं। अब किस बात में कितनी सच्चाई है उसका फैसला हम आप पर छोड़ते हैं। तो ये थी केपीएस गिल के जीवन की पूरी कहानी, जिन्हें सतलुज फिल्म में एक 'कसाई', क्रूर पुलिस वाले के रूप में दिखाया गया है।
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