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‘जब हिंदी में गिनती गिनने के लिए पड़ी थी डांट’, मशहूर पत्रकार मार्क टली का निधन

मार्क टली को भारत सरकार ने पद्म भूषण और पद्म श्री पुरस्कारों से नवाजा था। उन्होंने अयोध्या में हुए बाबरी मस्जिद ध्वंस की रिपोर्टिंग की थी।

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मार्क टली । Photo Credit: Social Media

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प्रसिद्ध पत्रकार और ब्रॉडकास्टर मार्क टली का 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्हें बीबीसी की 'भारत की आवाज़' कहा जाता था। यह घटना रविवार को हुई। दशकों तक उनकी खास आवाज़ ब्रिटेन, भारत और दुनिया भर के लोगों में खासी मशहूर थी। वह भारत पर गहरी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते थे।

 

बीबीसी में लंबे समय तक काम करते हुए मार्क टली ने भारत के कई मुश्किल और उथल-पुथल वाले समय को कवर किया। उन्होंने युद्ध, अकाल, दंगे और राजनीतिक हत्याओं की खबरें दीं। उन्होंने भोपाल गैस त्रासदी और अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर भारतीय सेना के हमले की भी रिपोर्टिंग की। उनकी रिपोर्टिंग को कुछ लोगों द्वारा काफी पसंद भी किया जाता था।

 

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मिला था पद्म भूषण

मार्क टली को भारत सरकार ने दो बड़े सम्मान दिए: पद्म श्री और पद्म भूषण। ब्रिटेन ने भी उन्हें 2002 में नाइट की उपाधि दी, जो पत्रकारिता और ब्रॉडकास्ट के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए थी। टली ने इसे 'भारत के लिए सम्मान' बताया था।

 

1992 में अयोध्या में रिपोर्टिंग करते समय वह बड़े खतरे में फंस गए थे। भीड़ में कुछ लोगों ने बीबीसी पर शक करते हुए उन्हें धमकाया और 'मार्क टली मुर्दाबाद' के नारे लगाए। उन्हें कई घंटों तक एक बंद कमरे में रखा गया। बाद में एक स्थानीय अधिकारी और हिंदू पुजारी ने उन्हें बचाया।

कलकत्ता में हुआ था जन्म

मार्क टली का जन्म 1935 में कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश राज में था। उनके पिता एक व्यापारी थे और मां बंगाल में पैदा हुई थीं। बचपन में एक अंग्रेज नैनी ने उनकी परवरिश की।

 

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक एक बार नैनी ने उन्हें ड्राइवर से हिंदी में गिनती सीखने की वजह से डांटा था उन्होंने कहा था, 'यह नौकरों की भाषा है, तुम्हारी नहीं।' लेकिन बाद में टली ने हिंदी बहुत अच्छी तरह सीख ली, जो दिल्ली में विदेशी पत्रकारों के लिए बेहद असामान्य बात थी।

 

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सीखी थी हिंदी

हिंदी आने से वे आम लोगों और बड़े नेताओं दोनों से आसानी से जुड़ पाते थे। बहुत से भारतीय उन्हें प्यार से 'टली साहब' कहते थे।

 

भारत के लिए उनका प्यार इतना गहरा था कि राजनेता, संपादक और सामाजिक कार्यकर्ता सब उन पर भरोसा करते थे। उनके लिए वह सिर्फ एक रिपोर्टर नहीं, बल्कि भारत और बाकी दुनिया के बीच एक ब्रिज जैसे थे।

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