बिल्डर, सोसायटी या बैंक, आग में जल गया फ्लैट तो कौन देगा पैसे? अपने अधिकार जानिए
हाल ही में गाजियाबाद की एक हाउसिंग सोसायटी में लगी आग में कई फ्लैट जल गए। इस हादसे के बाद फ्लैट खरीदने वाले लोगों के अधिकारों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: ChatGPT
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके की गौर ग्रीन एवेन्यू सोसायटी के रेसिडेंशियल फ्लैट में 29 अप्रैल को भीषण आग लग गई। महज एक घंटे के भीतर इस आग ने 8 से 12 फ्लैट्स को भारी नुकसान पहुंचाया। करोड़ों के सामान और हाउसहोल्ड आइटम्स जलकर खाक हो गए। बिल्डिंग को भी काफी नुकसान हुआ। यह सिर्फ एक सोसायटी की एक घटना है लेकिन आए दिन हम खबरों में देखते हैं कि किसी हाई-राइज़ सोसायटी की बिल्डिंग में भीषण आग लग गई। टीवी स्क्रीन पर लपटें दिखती हैं, दमकल की गाड़ियां दिखती हैं और फिर दिखता है सब कुछ जलकर खाक हो चुका एक फ्लैट। खबर वहीं खत्म हो जाती है लेकिन असली संघर्ष उन परिवारों के लिए वहीं से शुरू होता है।
करोड़ों का घर, जीवन भर की कमाई से सजाया गया इंटीरियर, सब कुछ कुछ ही घंटों में राख हो जाता है। इसके बाद एक बड़ा सवाल उठता है कि अब क्या? क्या बिल्डर नया घर देगा? क्या सोसायटी मरम्मत कराएगी या फिर आपकी पूरी जमा-पूंजी उस आग के साथ हमेशा के लिए खत्म हो गई? आज हम उन तकनीकी और कानूनी बारीकियों को भी समझेंगे, जिन्हें एक रेजिडेंट जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई लगाकर किसी टाउनशिप में अपना एक आशियाना बनाया है, उन्हें जानना बहुत जरूरी है।
नियमों को समझिए
आग से हुए नुकसान, खासकर हाईराइज़ बिल्डिंग्स की भरपाई कौन करेगा, इसे समझने के लिए पहले आपको इन रेसिडेंशियल बिल्डिंग्स के बारे में कुछ बातें जाननी होगी। किसी भी रेसिडेंशियल बिल्डिंग के बनने से लेकर रेसिडेंट्स को चाबियां सौंपने तक का पूरा प्रोसेस काफी लंबा और टेक्निकल होता है। इसमें बिल्डर को कई लीगल और सेक्योरिटी मेजर्स को पूरा करना पड़ता है। इसमें सबसे जरूरी होती है- आग और पानी से जुड़ी अनुमतियां (फायर एंड वॉटर अप्रूवल्स), इसमें क्या होता है? बिल्डिंग का ढांचा खड़ा होने के बाद, बिल्डर को स्थानीय अधिकारियों से कुछ 'क्लियरेंसेज' लेने होते हैं। इनमें से एक होता है- फायर एनओसी (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट): यह सबसे जरूरी अप्रूवल है।
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फायर डिपार्टमेंट आकर जांच करता है कि क्या बिल्डिंग में हाइड्रेंट, स्प्रिंकलर, फायर अलार्म और स्मोक डिटेक्टर सही तरीके से काम कर रहे हैं। इसके बिना बिल्डिंग को रहने लायक नहीं माना जाता। जब सब कुछ स्टैंडर्ड्स के हिसाब से तैयार होता है, तब अथॉरिटी ओसी यानी ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जारी करती है। इसका मतलब है कि अब बिल्डिंग कानूनी रूप से रहने के लिए सुरक्षित है। इन्हीं सर्टिफिकेट्स के साथ आता है बिल्डिंग का इंश्योरेंस। रेरा ऐक्ट 2017 के बाद अब हर बिल्डिंग का इंश्योरेंस मैंडेटरी है। अब इंश्योरेंस तो जरूरी है लेकिन इंश्योरेंस मिलेगा, इसके लिए बिल्डिंग को कुछ शर्तें पूरी करना जरूरी है।
मसलन यूपी में कानूनन अगर कोई भी इमारत 15 मीटर से ज़्यादा ऊंचाई की है तो उसे फायर एनओसी लेना मैंडेटरी है लेकिन यह एनओसी और इंश्योरेंस लेगा कौन? रेरा की धाराओं में इसके भी नियम बनाए गए हैं। ऐक्ट की धारा 16 के तहत बिल्डर को जमीन के टाइटल और पूरी कंस्ट्रक्शन का बीमा कराना मैंडेटरी है और बिल्डर को पजेशन देने से पहले इस बीमा के सभी प्रीमियम और चार्जेस भरने होते हैं। हालांकि, पजेशन के समय या एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) बनने पर, बिल्डर ये सभी बीमा दस्तावेज और लाभ रेसिडेंट्स की संस्था को ट्रांसफर कर देता है। RWA- रेसिडेंट्स वेलफेयर असोसिएशन रेसिडेंट्स की एक संस्था होती है। जब किसी हाउसिंग प्रोजेक्ट का निर्माण पूरा हो जाता है और लोग वहां रहने लगते हैं, तो कानूनन (रेरा के तहत) बिल्डर को रेसिडेंट्स की एक संस्था बनानी पड़ती है, जिसे आरडब्ल्यूए कहते हैं। सोसायटी में क्या नियम होंगे, सिक्योरिटी कैसी होगी, और कौन सा वेंडर काम करेगा, ये सब अब आरडब्ल्यूए तय करती है, बिल्डर नहीं। आरडब्ल्यूए बनने के बाद बिल्डर को सोसायटी के सभी कॉमन एरिया (पार्क, क्लब हाउस, लिफ्ट), फंड और ओरिजिनल दस्तावेज (जैसे फायर एनओसी, इंश्योरेंस) आरडब्ल्यूए को सौंपने होते हैं।
कौन होगा जिम्मेदार?
यहां यह समझना भी जरूरी है कि बिल्डिंग में होने वाली किसी भी अनहोनी या फिर किसी भी मेंटेनेंस के लिए जिम्मेदारी किसकी होगी, बिल्डर की या फिर आरडब्ल्यूए की? साथ ही मेंटेनेंस का पैसा लेने का हक किसे होता है आरडब्ल्यूए को या बिल्डर को? इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि सोसायटी किस 'स्टेज' पर है। मसलन: शुरुआत में जब बिल्डिंग नई होती है और आरडब्ल्यूए का गठन नहीं हुआ होता, तब बिल्डर ही मेंटेनेंस का पैसा लेता है। आमतौर पर पजेशन के समय बिल्डर 1 या 2 साल का एडवांस मेंटेनेंस चार्ज भी जमा करा लेता है। इस दौरान साफ-सफाई, बिजली और पानी की जिम्मेदारी बिल्डर की होती है। एक बार जब आरडब्ल्यूए का गठन हो जाता है और बिल्डर 'हैंडओवर' की प्रक्रिया पूरी कर लेता है, तब मेंबर (रेसिडेंट्स) ही मेंटेनेंस का पैसा लेते हैं। बिल्डर को बचा हुआ मेंटेनेंस फंड (यदि कोई हो) और आईएफएमएस (इंटरेस्ट-फ्री मेंटेनेंस सिक्योरिटी) का पैसा आरडब्ल्यूए के बैंक खाते में ट्रांसफर करना होता है। इसके बाद, हर महीने का मेंटेनेंस चार्ज आरडब्ल्यूए तय करती है और उसे सोसायटी के बैंक खाते में जमा किया जाता है।
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यहीं से शुरू होती है मिस अंडरस्टैंडिंग जिसका पता रेसिडेंट्स को तब लगता है जब उनके साथ कोई हादसा होता है। दरअसल, ज्यादातर रेसिडेंट्स इस गलतफहमी में रहते हैं कि वे जो मोटा मेंटेनेंस चार्ज देते हैं, उसमें उनके घर का इंश्योरेंस भी शामिल है लेकिन सच थोड़ा कड़वा है। आमतौर पर, आपकी रेसिडेंशियल वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) या हाउसिंग सोसायटी जो इंश्योरेंस लेती है, वह केवल बिल्डिंग के ढांचे (स्ट्रक्चर) और साझा क्षेत्रों (कॉमन एरियाज) के लिए होता है।
क्या कवर होता है: सीढ़ियां, लिफ्ट, कॉरिडोर, क्लब हाउस, बेसमेंट, साझा वायरिंग और बिल्डिंग का बाहरी ढांचा (पिलर और दीवारें)।
क्या कवर नहीं होता: आपके घर के अंदर की महंगी फिटिंग्स, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स, गहने, कपड़े और आपका कस्टमाइज्ड इंटीरियर।
आसान शब्दों में कहें तो, आरडब्ल्यूए का इंश्योरेंस उस 'कंकाल' (स्केलेटन) को बचाने के लिए है जिसमें आप रहते हैं लेकिन उस ढांचे के अंदर आपने जो 'अपनी दुनिया' बसाई है, उसे बचाने की जिम्मेदारी आपकी अपनी है लेकिन इसकी भरपाई करेगा कौन?
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
यही नियम और कानून की बारीकी समझने के लिए हमने एथेना लीगल की प्रिंसिपल एसोसिएट एडवोकेट नेहा गुप्ता से बात की। उन्होंने बताया कि आग लगने की स्थिति में नुकसान की भरपाई कौन करेगा, यह इन तीन बातों पर निर्भर करता है:
बिल्डर/डेवलपर की लायबिलिटी: अगर पजेशन मिलने के एक तय समय (स्पेसिफिक पीरियड) के अंदर आग लगती है और उसकी वजह खराब कंस्ट्रक्शन (फॉल्टी कंस्ट्रक्शन) या वायरिंग का घटिया काम (पुअर इलेक्ट्रिकल वर्क) है, तो नुकसान की भरपाई के लिए बिल्डर जिम्मेदार होगा।
आरडब्ल्यूए/मैनेजमेंट की जिम्मेदारी: सोसायटी में आग के कारणों (जैसे शॉर्ट सर्किट) को रोकने के लिए यह सुनिश्चित करना आरडब्ल्यूए की जिम्मेदारी है कि तार (वायर्स) और केबल अच्छी स्थिति में हों। अगर जांच में यह पाया गया कि फायर सेफ्टी नॉर्म्स का उल्लंघन हुआ है, तो बिल्डिंग मैनेजमेंट या आरडब्ल्यूए को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। उन्हें रेसिडेंट को हुए संपत्ति के नुकसान और सामान (लॉस्ट बिलॉन्गिंग्स) के साथ-साथ उसे हुई मानसिक प्रताड़ना (मेंटल एगोनी एंड हैरासमेंट) का मुआवजा देना होगा। हालांकि, इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि हादसा सोसायटी मैनेजमेंट की लापरवाही, फायर सेफ्टी इक्विपमेंट की कमी या कॉम्प्लेक्स का सही इंश्योरेंस न होने की वजह से हुआ है।
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बीमा का बंटवारा (इंश्योरेंस कवरेज): आमतौर पर सोसायटी का इंश्योरेंस केवल कॉमन एरियाज के स्ट्रक्चरल रिपेयर को कवर करता है। बीमा कंपनियां क्लेम केवल तभी पास करती हैं जब नुकसान का कारण (कॉज) ली गई पॉलिसी के नियमों के तहत कवर होता हो। वहीं, घर के अंदर के निजी सामान के नुकसान की भरपाई के लिए रेसिडेंट के पास अपनी खुद की इंडिविजुअल होम इंश्योरेंस पॉलिसी होनी चाहिए। इसके अलावा, अगर जांच में यह सामने आता है कि आग के दौरान सुरक्षा प्रणालियों को नजरअंदाज किया गया था या वे खराब थीं, तो बीमा कंपनियां क्लेम देने से इनकार कर सकती हैं। साथ ही अगर आग किसी एक फ्लैट से शुरू होकर दूसरे फ्लैटों तक फैलती है, तो अक्सर 'आग किसने शुरू की' का मुद्दा उठता है। ऐसे में अगर किसी एक फ्लैट मालिक की गलती से दूसरे को नुकसान होता है, तो बीमा कंपनियों के सामने लायबिलिटी के कानूनी पेच फंस सकते हैं।
कर्नाटक वाला केस आंखें खोल देगा
बिल्डर, सोसायटी और बीमा कंपनी के बीच जवाबदेही और भरपाई की जिम्मेदारी की इस चकल्लस को समझने के लिए कर्नाटक रेरा का एक केस देखिए। 29 नवंबर, 2025 को के-रेरा ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया जो आगे आने वाले ऐसे मामलों के लिए एक नज़ीर बन चुका है। क्या हुआ था? बेंगलुरू का एक इलाका है - कनकपुरा। यहीं एक हाउसिंग प्रोजेक्ट का कंस्ट्रक्शन 2018 में ही पूरा होता है। जिसके बाद बिल्डर ने 2 नवंबर, 2019 को मेंटेनेंस का काम अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) को सौंप दिया। इसी सोसायटी में एक क्लब हाउस भी था। जिसमें लेडीज वॉशरूम में सॉना बाथ की फैसिलिटी थी। इसी सॉना रूम में 30 जनवरी 2024 को आग लगी। आग से काफी नुकसान भी हुआ। शुरूआती जांच में पता चला कि ये आग सॉना हीटर के ओवरहीटिंग की वजह से लगी।
रेसिडेंट्स ने इसे लेकर आवाज़ उठाई। बिना किसी वकील के खुद ही केस लड़ा। उन्होंने रेरा एक्ट के सेक्शन 31 के तहत शिकायत की कि बिल्डर क्लब हाउस की मरम्मत कराए और सेक्शन 16 के तहत अनिवार्य इंश्योरेंस की कॉपी उन्हें सौंपे लेकिन बिल्डर ने मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया। बिल्डर का कहना था कि मेंटेनेंस 2019 में ही हैंडओवर कर दी गई थी, इसलिए अब उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है। बिल्डर ने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए आग लगने के बाद जो जांच हुई उसकी कॉपी पेश की। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि आग किसी कंस्ट्रक्शन डिफेक्ट की वजह से नहीं बल्कि हीटर के ओवरहीटिंग के कारण लगी थी। दोनों पक्षों की तरफ से खूब दलीलें पेश हुईं। के-रेरा ने सारे पक्ष सुने और एनालिसिस के बाद 29 नवंबर, 2025 फैसला सुनाया।
अथॉरिटी ने आदेश में 3 बड़ी बातें कहीं:
मेंटेनेंस पर बिल्डर को राहत: के-रेरा ने माना कि आग लगने की वजह कोई स्ट्रक्चरल या इलेक्ट्रिकल डिफेक्ट नहीं थी। मेंटेनेंस पहले ही ट्रांसफर हो चुका था, इसलिए रोजमर्रा के रखरखाव के लिए बिल्डर जिम्मेदार नहीं है।
सेक्शन 16 (अनिवार्य बीमा) को लेकर था: यहां केस पूरी तरह बदल गया। रेरा ने कहा कि रेरा एक्ट का सेक्शन 16 बिल्डर पर यह स्टैट्यूटरी ऑब्लिगेशन (वैधानिक जिम्मेदारी) डालता है कि वह पूरे प्रोजेक्ट का इंश्योरेंस कराए, प्रीमियम भरे और उसे आरडब्ल्यूए को ट्रांसफर करे। यह जिम्मेदारी इस बात से बिल्कुल अलग है कि मेंटेनेंस कौन देख रहा है।
अंतिम फैसला (द जजमेंट): बिल्डर यह साबित नहीं कर पाया कि उसने इंश्योरेंस लिया था या उसके पेपर्स सोसायटी को दिए थे। इसलिए कोर्ट ने बिल्डर को 30 दिनों के अंदर इंश्योरेंस पॉलिसी की कॉपी, प्रीमियम रसीद और ट्रांसफर के सबूत एसोसिएशन को देने का आदेश दिया। साथ ही ये भी कहा कि अगर बिल्डर ये पेपर्स नहीं दे पाता है, तो क्लब हाउस की मरम्मत का पूरा खर्च खुद बिल्डर को उठाना होगा।
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इस केस से यह साफ हो गया कि बिल्डर सिर्फ पजेशन या मेंटेनेंस देकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकता। अगर नियम के मुताबिक प्रोजेक्ट इंश्योरेंस नहीं कराया गया है या उसे ट्रांसफर नहीं किया गया है, तो भविष्य में होने वाले किसी भी हादसे के नुकसान की भरपाई बिल्डर को ही करनी होगी। एडवोकेट नेहा से हमने ये भी जानने की कोशिश की कि आग से होने वाले नुकसान की रिकवरी के लिए रेसिडेंट्स के पास क्या ऑप्शन्स होते हैं। क्या उनके पास कोई लीगल रास्ता भी होता है? बकौल नेहा - अगर लापरवाही की वजह से आपका नुकसान होता है, तो आप ये तीन कदम उठा सकते हैं:
एफआईआर दर्ज कराना: एक रेसिडेंट लापरवाही बरतने वाले बिल्डर, आरडब्ल्यूए या मैनेजमेंट कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा सकता है। यह प्रॉपर्टी के नुकसान, बिल्डिंग रिपेयर में लापरवाही, दूसरों की जान खतरे में डालने और नुकसान पहुंचाने वाली शरारत (मिसचीफ) जैसी धाराओं में हो सकती है।
मुआवजे के लिए सिविल सूट (सिविल सूट फॉर डैमेजेस): आप सिविल कोर्ट में हर्जाने और मुआवजे के लिए केस फाइल कर सकते हैं। यह उन लोगों के खिलाफ होता है जिनकी जिम्मेदारी सोसायटी की सेफ्टी, सिक्योरिटी और रखरखाव (अपकीप) सुनिश्चित करने की थी लेकिन उनकी लापरवाही से आपका नुकसान हुआ।
कंज्यूमर कंप्लेंट (कंज्यूमर कंप्लेंट): आप अलग-अलग कंज्यूमर फोरम्स में शिकायत दर्ज कर सकते हैं क्योंकि आप मेंटेनेंस देते हैं इसलिए आप एक ग्राहक (कंज्यूमर) हैं। अगर मैनेजमेंट ने सुरक्षा और मेंटेनेंस देने में कोताही की है, तो आप अपने प्रॉपर्टी और सामान के नुकसान की भरपाई के लिए क्लेम कर सकते हैं।
आग का कारण है बेहद अहम
हालांकि, यहां भी एक बात निर्णायक की भूमिका में है- कॉज ऑफ फायर। माने आग लगने की वजह। बकौल एडवोकेट नेहा- अगर किसी एक रेसिडेंट की अपनी गलती से आग लगती है, मसलन वह सेफ्टी मेजर्स को दरकिनार कर कुछ काम करा रहा हो या फिर जानबूझकर घर में आग लगाई हो और वह आग उसके फ्लैट से निकलकर दूसरे फ्लैट या फ्लोर तक पहुंच जाए तो ऐसे में बिल्डर, आरडब्ल्यूए और दूसरे रेसिडेंट्स उस रेसिडेंट पर भी अपने नुकसान का क्लेम कर सकते हैं। कुल मिलाकर बात यह है कि आग लगी कैसे यह सबसे बड़ा और निर्णायक सवाल है जिसका जवाब ही यह तय करता है कि नुकसान की भरपाई किसके सिर माथे होगी।
यह तो हुई वेल स्टैब्लिश्ड और आरडब्ल्यूए की मेंटेनेंस के अंडर आने वाली हाई राइज़ बिल्डिंग्स की बात लेकिन मेट्रो सीटीज़ में इंडिपेंडेंट बिल्डर्स फ्लैट का भी खूब कल्चर है। ये ऐसी छोटी बिल्डिंग्स होती हैं, जिसे बिल्डर बना कर बेच कर चल देता है। फ्लैट्स बिकने के बाद उसका उस मकान या फ्लैट से कोई वास्ता नहीं होता। ऐसे में अगर इन फ्लैट्स में कुछ भी अनहोनी होती है तो यहां किसी भी थर्ड पार्टी की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। यहां सारा नुकसान खुद ही ओनर को ही उठाना होता है।
खैर गाजियाबाद के गौर ग्रीन एवेन्यू सोसायटी में लगी आग के पीछे का कारण क्या है यह अभी जांच का विषय है। अब तक यही कयास लगाए जा रहे हैं कि आग लगने की वजह शॉर्ट सर्किट या फ्लैट में चल रहा रेनोवेशन वर्क है। जांच अभी जारी है। प्रशासन की रिपोर्ट के बाद ही तय होगा कि क्या रेसिडेंट्स को मुआवजा मिलेगा, या नहीं, और अगर मिलेगा तो कौन देगा, बिल्डर, आरडब्ल्यूए या बीमा कंपनी।
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