ईरान-अमेरिका के तनाव का असर मध्य पूर्व के कई देशों पर पड़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिका ने कतर स्थित अल उदीद एयरबेस समेत कई अन्य सैन्य अड्डों से अपने सैनिकों को निकालना शुरू कर दिया था। यह कदम ईरान की धमकी के बाद उठाया गया। जिसमें तेहरान ने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और तुर्की को अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमले की धमकी दी थी।
इराक सीमा पर बुधवार की पूरी रात अज्ञात फाइटर प्लेन सक्रिय होने से रियाद से अंकारा तक गहमा गहमी का माहौल था। इजरायल, सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की और इराक को ईरानी हमले का डर सताने लगा। माना जा रहा है कि इन्हीं सुरक्षा चिंताओं के कारण ट्रंप ने अभी तक हमले का फैसला नहीं किया है। ईरान पर अमेरिका हमला करेगा या नहीं, अभी तक स्पष्ट तौर पर किसी को कुछ नहीं मालूम है। मगर जानते हैं कि इन देशों को ईरानी हमले की चिंता क्यों सता रही है?
मध्य पूर्व में अमेरिका की सैन्य तैनाती बेहद मजबूत है। यहां लगभग 40,000 से 50,000 सैनिकों की तैनाती है। आठ देशों में स्थायी समेत कुल 19 ठिकानों से अमेरिका की वायु और नौसेना पूरे मध्य पूर्व में नजर रखती है। यही कारण है कि इरान के साथ जंग होने की स्थिति में पूरा मध्य पूर्व इसकी जद में आ सकता है।
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इजरायल: इजरायल और ईरान के बीच दुश्मनी काफी पुरानी है। पिछले साल जून महीने में दोनों के बीच 12 दिनों की जंग हो चुकी है। ईरान अभी इजरायल पर विरोध प्रदर्शन भड़काने का आरोप लगा रहा है। अगर अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो तेहरान के निशाने पर सबसे पहले इजरायल होगा। हाल ही में ईरान ने खुलकर धमकी दी कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो इजरायल पर अटैक करके उसका जवाब दिया जाएगा। यही कारण है कि इजरायल सिर्फ पूरे घटनाक्रम पर निगाह रख रहा है, उकसावे वाली कोई हरकत नहीं की है।
कतर: इजरायल के बाद सबसे अधिक डर के साए में कतर है। दरअसल, कतर में स्थित अल उदैद बेस मध्य पूर्व में अमेरिका सेना का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है। पिछले साल इजरायल के साथ जंग के दौरान ईरान ने इसी बेस पर मिसाइलें दागी थीं। ईरान की ताजा धमकी के बाद अमेरिका ने बुधवार को यहां से सैनिकों को निकालना शुरू कर दिया था। कतर को हमले का डर इतना सता रहा था कि उसने अपना एयरस्पेस अस्थायी तौर पर बंद कर दिया। 1996 में अमेरिका ने दोहा के करीब लगभग 24 हेक्टेयर क्षेत्रफल में बेस की स्थापना की थी।
कुवैत: यहां के आरिफजान और अली अल सलेम एयरफोर्स स्टेशन पर अमेरिकी मौजदूगी है। यह सैन्य अड्डा राजधानी कुवैत सिटी से करीब 55 किमी दूर स्थित है। साल 1999 में इसकी स्थापना हुई। यह स्टेशन सीरिया और इराक में अमेरिकी सेना के परिचालन में मदद प्रदान करता है।
संयुक्त अरब अमीरात: आबू धाबी के नजदीक यूएई का वायुसेना स्टेशन है। इस स्टेशन को अमेरिका भी शेयर करता है। यहां पर ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और एफ-22 रैप्टर जैसे फाइटर प्लेन तैनात हैं। आईएसआईएस के खिलाफ जंग में इस एयरबेस ने बेहद अहम भूमिका निभाई थी। इसके अलावा दुबई के जेबेल अली बंदरगाह में अमेरिकी एयरक्रॉफ्ट कैरियर ठहरते हैं। यह मध्य पूर्व में अमेरिकी नौसेना का सबसे बड़ा बंदरगाह है।
इराक: इराक के एरबिल और अनबार प्रांत में स्थित ऐन अल असद एयरपोर्ट पर अमेरिकी सेना की मौजूदगी है। इन दोनों स्थानों से अमेरिकी सैनिक सीरिया और इराक में कुर्द लड़ाकों को मदद पहुंचाते हैं। वहीं एरबिल वायुसेना स्टेशन पर अमेरिका अपने गठबंधन बलों को ट्रेनिंग देता है। 2020 में अमेरिकी हमले में ईरान के जनरल कासिम सुलेमानी को मार गिराया गया था। इसके जवाब में ईरान ने ऐन अल असद बेस पर हमला किया था।
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यहां भी अमेरिकी बेस: सऊदी अरब की राजधानी रियाद से करीब 60 किमी दूर प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर अमेरिकी सेना तैनात है। यहां पर थाड और पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी लगा है। व्हाइट हाउस के मुताबिक सऊदी अरब में करीब 2321 अमेरिकी सैनिकों की तैनाती है। सऊदी अरब के अलावा जॉर्डन की राजधानी अम्मान के करीब मुवफ्फाक अल साल्टी वायु सेना बेस में अमेरिकी मौजूदगी है।
तुर्की के अदाना प्रांत स्थित इंसिरलिक वायु सेना बेस का अमेरिका और अंकारा साझे तौर पर संचालन करते हैं। यहां पर अमेरिकी परमाणु बम के अलावा 1400 से अधिक अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। बहरीन में अमेरिका की सेना एक नौसैनिक अड्डे का भी संचालन करती है। यहां करीब नौ हजार सैनिकों की तैनाती है।