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'अब सेफ है चिकन नेक', शुभेंदु अधिकारी के फैसले की तारीफ क्यों? इनसाइड स्टोरी

सिलिगुड़ी कॉरिडोर को भारत का चिकेन नेक कहा जाता है। एक कॉरिडोर के सहारे भारत, पूर्वोत्तर के 7 राज्यों से जुड़ता है। पश्चिम बंगाल सरकार की एक पहल, यहां की तस्वीर बदल सकती है।

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मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, Photo Credit: PTI

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पश्चिम बंगाल की नई सरकार के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने अपने एक महत्वपूर्ण वादे को पूरा कर दिया है। उन्होंने चिकन नेक के नाम से मशहूर सिलिगुड़ी कॉरिडोर में आने वाले कई अहम राष्ट्रीय राजमार्गों को केंद्र सरकार को सौंप दिया है। अब इन सड़कों का रखरखाव, मरम्मत और नई परियोजनाएं, केंद्र के हवाले हैं। 

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर को देश में 'चिकन नेक कॉरिडोर' भी कहते हैं। एक बारीक गलियारे से पूर्वोत्तर के 7 राज्य ऐसे जुड़े हैं कि अगर यहां कोई बाधा पैदा की जाए तो सारे राज्यों से भारत की मुख्य भूमि का संपर्क कट जाएगा। अगर आप भारत के नक्शे में इसे देखें तो आकृति, नाम को सही ठहराती दिखेगी। 

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पश्चिम बंगाल सरकार ने क्या कदम उठाया है?

पश्चिम बंगाल सरकार ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर के सात अहम नेशनल हाईवे के हिस्सों को केंद्रीय एजेंसियों को सौंपने की मंजूरी दे दी है। चिकन नेक कॉरिडोर, देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक माना जाता है। अब यहां दशकों से लंबित सड़क और रेलवे प्रोजेक्ट के लिए राह आसान होने वाली है। पश्चिम बंगाल में 3 दशक तक कम्युनिस्ट, फिर करीब डेढ़ दशक तृणमूल कांग्रेस का राज रहा। यहां के डेवलेपमेंट अलग-अलग सरकारों की वजह से अटकते रहे। अब उम्मीद है कि सरकार यहां के रुके हुए प्रोजेक्ट्स को जल्द पूरा करेगी। 

चिकन नेक क्या है?

भारत के नक्शे पर पूर्वोत्तर के 8 राज्य एक तरह से सिर की तरह जुड़े हुए हैं। इन्हें मुख्य भारत से जोड़ने वाला रास्ता बेहद पतला है। इसे चिकन नेक कहते हैं। सिलिगुड़ी कॉरिडोर की लंबाई करीब 60 किलोमीटर है लेकिन कई जगह पर चौड़ाई सिर्फ 20-22 किलोमीटर रह जाती है। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और चीन की सीमा के पास होने की वजह से यह जगह बेहद संवेदनशील मानी जाती है।

इसी राह के जरिए भारत, अपने 7 उत्तर पूर्वी राज्यों से जुड़ता है। कॉरिडोर के पश्चिम में नेपाल, उत्तर में भूटान, दक्षिण में बांग्लादेश और चीन की चुंबी घाटी है। करीब होने की वजह से, इस हिस्से को भारत के सबसे संवेदनशील जगहों में से एक माना जाता है। यह जमीन, केंद्र ने बहुत पहले मांगी थी, एक साल से आधिकारिक हस्तांतरण की प्रक्रिया अटकी हुई थी। 

क्यों अब तक नहीं बन पा रही थी बात?

नेशनल हाईवे के ये हिस्से, पहले राज्य के लोक निर्माण विभाग (PWD) के तहत आते थे, अब इन्हें भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और राष्ट्रीय राजमार्ग और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास निगम लिमिटेड (NHIDCL) को सौंप दिया गया है। 

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क्या हुआ जो चिकन नेक पर मंडराया खतरा?

चिकन नेक कॉरिडोर को पूर्वोत्तर भारत के लिए जीवन रेखा की तरह है। यहां से ही सड़कें, रेलवे, तेल पाइपलाइन और बिजली की लाइनें जाती हैं। अगर यह रास्ता बंद हो गया तो पूर्वोत्तर के 4 करोड़ से ज्यादा लोग मुख्य भारत से कट जाएंगे। सेना के लिए भी यह सिलिगुड़ी कॉरिडोर का कंट्रोल बेहद जरूरी है। चीन की सीमा के पास होने की वजह से यहां हमेशा खतरा बना रहता है।

सुवेंदु अधिकारी के फैसले से क्या होगा?

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने एनएच-31, एनएच-33, एनएच-312 समेत कुल 7 महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाएं केंद्र को ट्रांसफर कर दी हैं। अब NHAI और NHIDCL इन सड़कों का प्रबंधन संभालेंगे। इनमें कुछ रणनीतिक तौर पर अहम सड़कें भी शामल हैं। 

सेवोक-कोरोनेशन ब्रिज, हासीमारा-जयगांव और चांगराबंधा वाले रास्ते शामिल हैं। ये प्रोजेक्ट करीब एक साल से राज्य सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रहे थे। अब केंद्र इन्हें तेजी से पूरा कर सकेगा। यह फैसला सिलिगुड़ी कॉरिडोर को मजबूत बनाने और विकास कार्यों को तेज करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।


अब क्या हो सकता है?

अब 7 नेशनल हाइवे पर केंद्र का नियंत्रण होगा। NHAI और NHIDCL को राज्य सरकार के इजाजत की जरूरत नहीं पड़ेगी। सड़कें चौड़ी की जा सकेंगी। इस कॉरिडोर पर लंबे समय से सड़कों के चौड़ीकरण के प्रोजेक्ट अटके थे। पश्चिम बंगाल सरकार का कहना है कि अब यहां से रक्षा रसद की आवाजाही दुरुस्त होगी, पर्यटन को बल मिलेगा और पूर्वोत्तर के राज्यों सुरक्षित होंगे। 

कॉरिडोर के इर्दगिर्द जो अवैध घुसपैठिए बसाए गए थे, उन्हें आसानी से हटाया जा सकेगा। शुभेंदु अधिकारी बार-बार दावा करते रहे हैं कि घुसपैठिए, भारत के चिकन नेक को अलग करना चाहते हैं, मुख्यमंत्री हिमंत को भी यही डर सताता था, वह अपनी चुनावी रैलियों में बार-बार कहते थे कि पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतना जरूरी है। अब शुभेंदु ने बीजेपी के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की बागडोर केंद्र को सौंप दी है।  

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क्यों खतरे की बात कही जाती है?

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के तत्कालीन प्रमुख मोहम्मद यूनुस मार्च 2025 में चीन गए थे। उन्होंने बीजिंग में पूर्वोत्तर के राज्यों का जिक्र करते हुए एक विवादित बयान दिया था, जिस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की थी। उन्होंने कहा था, 'भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा पूरी तरह से 'लैंडलॉक्ड' है। इस पूरे इलाके की समुद्र तक पहुंच पूरी तरह से बांग्लादेश द्वारा नियंत्रित होती है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर ही एकमात्र ऐसा रास्ता है जो पूर्वोत्तर को बाकी भारत से जोड़ता है। इस पूरे क्षेत्र के लिए बांग्लादेश ही 'महासागर का एकमात्र संरक्षक' है।' मोहम्मद यूनुस ने चीन से अपील की थी कि वह बांग्लादेश के महासागर वाले क्षेत्र में अपनी दखल बढ़ा दे। 

मोहम्मद यूनुस के इस बयान ने भारत की चिंता बढ़ा दी थी। भारत ने चिंता जताई थी कि अगर मोहम्मद यूनुस चीन को न्योता देते हैं तो यह भारत के हितों के खिलाफ होगा। यह कॉरिडोर सिर्फ 22 किलोमीटर चौड़ा है। चीन डोकलाम तक पहुंच जाता है, वह पहले से ही यहां दखल बढ़ाना चाहता है। बांग्लादेश के भी विरोध में उतरने से भारत रणनीतिक तौर पर कमजरो पड़ सकता है। बांग्लादेश ने चीन को इस क्षेत्र के पास आर्थिक और रणनीतिक पैर पसारने का न्योता देकर भारत की चिंता बढ़ा दी थी। 

क्या चिकन नेक भारत की कमजोर कड़ी है?

सिलीगुड़ी कॉरिडोर को भारत की कमजोर कड़ी है। युद्ध की स्थिति में अगर गलती से यह रास्ता ब्लॉक हुआ, भारत अपने 7 राज्यों के नागरिकों से जमीनी संपर्क से कट जाएगा। दुनिया इसे भारत की कमजोरी के तौर पर देखती है लेकिन अब इसे मजबूत बनाए जाने की कवायद हो रही है। देश के लिए एक खतरा यह भी है कि यहां से ही अवैध घुसपैठ की वजह से बांग्लादेशी घुसपैठिए आसानी से आते हैं। असम के मुख्यमंत्री बार-बार कहते रहे हैं कि यहां की जनसांख्यकी बदल गई है। मोहम्मद यूनुस के इस रुख के बाद सुरक्षा एजेंसियों को लगा कि पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप से यहां स्थितियां तनावपूर्ण हो सकती हैं।

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