तृणमूल कांग्रेस की राज्य अध्यक्ष पद से चंद्रिमा भट्टाचार्य ने इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष
ममता बनर्जी
को चिट्ठी लिखकर बताया कि 3 जून को उन्हें जो पद दिया गया था, उससे वह इस्तीफा दे रही हैं। चंद्रिमा ने सिर्फ अध्यक्ष पद ही नहीं छोड़ा, बल्कि पार्टी और उसकी अलग-अलग शाखाओं के बैंक खातों पर साइन करने का अधिकार भी छोड़ दिया।
चंद्रिमा भट्टाचार्य, अब बैंक लेन-देन पर साइन नहीं करेंगी। चुनाव आयोग में तृणमूल की तरफ से प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी से भी उन्होंने खुद को अलग कर लिया है। चंद्रिमा भट्टाचार्य, ममता बनर्जी की सबसे मजबूत सिपाही थीं। पार्टी में वह दूसरी सबसे मजबूत नेता मानी जाती थीं। अब उन्होंने भी ममता से राहें अलग कर ली हैं।
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क्यों ममता बनर्जी का साथ छोड़ा?
चंद्रिमा भट्टाचार्य के बेटे सौरभ बोस ने हाल ही में ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल के विद्रोही गुट में शामिल हो गए थे। इसके बाद यह अटकलें लगने लगी थीं कि उनकी मां चंद्रिमा भी अब ममता बनर्जी से अपनी राहें अलग करेंगी। अब इन अटकलों पर विराम लग गया है। वह ममता बनर्जी का साथ छोड़ चुकी हैं। शनिवार को चंद्रिमा ने ममता को चिट्ठी लिखकर सभी पदों से इस्तीफा दे दिया।
ऋतब्रत बनर्जी के खेमे में जाएंगी?
ऋतब्रत बनर्जी ने चंद्रिमा भट्टाचार्य के इस्तीफे पर कहा है, 'प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह अब पार्टी नहीं चलेगी। लोग अब उस संस्कृति में रहना नहीं चाहते।'
कौन हैं चंद्रिमा भट्टाचार्य?
चंद्रिमा ममता बनर्जी की बेहद करीबी नेता मानी जाती थीं। ममता के मंत्रिमंडल में वह दूसरे नंबर की महत्वपूर्ण नेता थीं। वित्त और स्वास्थ्य जैसे बड़े विभागों में वे उपमंत्री रह चुकी हैं। ममता उन पर बहुत भरोसा करती थीं। अभी तक चंद्रिमा ने अपने फैसले पर कुछ भी नहीं कहा है। पार्टी के अन्य नेता भी चिट्ठी देखे बिना कुछ कहने से बच रहे हैं। चंद्रिमा भट्टाचार्य की उम्र करीब 75 साल है। वह लंबे समय से ममता बनर्जी की सबसे भरोसेमंद मंत्रियों में शुमार रही हैं। वह भी ममता बनर्जी की तरह वकील थीं और जब राजनीति में आईं तो केंद्रीय भूमिका मिल गई।
2011 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर दम दम उत्तर सीट से जीत हासिल कर उन्होंने विधायक के रूप में राजनीतिक करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने कांति दक्षिण और फिर दोबारा दम दम उत्तर से चुनाव जीता। 2012 में ममता बनर्जी के मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में उन्हें राज्य मंत्री बनाया गया। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, भूमि एवं भूमि सुधार, शरणार्थी एवं पुनर्वास विभागों में राज्य मंत्री के रूप में काम करने के बाद उन्हें स्वतंत्र प्रभार के साथ वित्त विभाग सौंपा गया। 2021 से 2026 तक वह वित्त (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी संभालती रहीं। कानून एवं न्याय विभाग में भी कैबिनेट मंत्री के रूप में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं।
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कब बंगाल की कमान मिली?
जून 2026 में उन्हें पश्चिम बंगाल तृणमूल कांग्रेस की राज्य अध्यक्ष बनाया गया। यह जिम्मेदारी सिर्फ एक महीने तक चली। अब वह पार्टी से ही अलग हो चुकी हैं।