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BNP की जीत से खुश नहीं, सतर्क रहना होगा, इन मुद्दों पर अब बढ़ सकता है तनाव

तारिक रहमान की जीत की भारत में खूब चर्चा है। लोगों को उम्मीद है कि अब बांग्लादेश के साथ रिश्ते बेहतर होंगे। कुछ संकेत तारिक रहमान भी दिए हैं, लेकिन कुछ मुद्दों पर भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते तनाव भरे रह सकते हैं।

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पीएम मोदी और तारिक रहमान। ( Photo Credit: Social Media)

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25 दिसंबर 2025 को तारिक रहमान 17 साल बाद बांग्लादेश लौटे। पांच दिन बाद यानी उनकी मां और बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का निधन हो गया। अब करीब 54 दिन बाद यानी 17 फरवरी को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे। 35 साल बाद बांग्लादेश को पुरुष प्रधानमंत्री मिलेगा। तारिक रहमान की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को मिली प्रचंड जीत की भारत में खूब चर्चा है।

 

मंथन इस बात का चल रहा है कि तारिक रहमान की अगुवाई में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते कैसे होंगे? वे अलग राह पकड़ेंगे या यूनुस की खींची लकीर पर चलेंगे। हालांकि तारिक रहमान ने अपने कुछ बयान से बांग्लादेश की विदेश नीति की झलक दिखाने की कोशिश की है। मगर पूरी तस्वीर शपथ ग्रहण के बाद आने की उम्मीद है। 17 फरवरी को ढाका में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में भारत से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला शामिल होंगे। तारिक रहमान भले ही अपने पड़ोसी देशों के साथ समान रिश्ते की बात करते हैं, लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जहां दोनों देशों के बीच मतभेद देखने को मिल सकता है। आइये जानते हैं उनके बारे में... 

 

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कट्टरता: बांग्लादेश में भारत की सबसे बड़ी चिंता बढ़ती कट्टरता है। तारिक रहमान के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती होगी। 2001 से 2006 तक बीएनपी के सरकार में कट्टरपंथियों का खूब बोलबाला हो गया था। लश्कर-ए-तैयबा ने बांग्लादेश को अपना गढ़ बना लिया था। सीमावर्ती क्षेत्र समेत पूर्वोत्तर राज्यों में सुरक्षा चुनौतियां पैदा हुई थीं। भारत की पूरी कोशिश है कि तारिक रहमान के शासन में यह दोहराया न जाए। 

 

हिंदुओं की रक्षा: चुनाव जीतने के बाद अपने पहले संबोधन में तारिक रहमान ने कहा कि यह देश सबका है। सभी यहां आजाद हैं। किसी के खिलाफ कोई हिंसा नहीं होगी। मगर असली परीक्षा यह है कि वे अपने शब्दों पर खरे उतर पाते हैं या नहीं। अगर मोहम्मद यूनुस शासन की तर्ज पर ही बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का सिलसिला जारी रहा तो भारत के साथ बांग्लादेश के रिश्ते पटरी पर आना लगभग नामुमकिन होगा।

 

शेख हसीना की वापसी: दोनों देशों के बीच टकराव की सबसे बड़ी वजह शेख हसीना को नई दिल्ली में शरण देना भी है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने इस मुद्दे पर भारत के साथ रिश्तों को बेहद खराब किया और अपनी जनता के सामने नई दिल्ली को खलनायक के तौर पर पेश किया। अब तारिक रहमान के सामने इस मुद्दे पर भारत से रिश्ते सामान्य बनाने पर अपनी जनता का दबाव भी झेलना पड़ सकता है। अगर जनभावना के आधार पर फैसला लेने की कोशिश की तो रिश्ते बिगड़ने बिल्कुल तय है।

 

नदी जल बंटवारा: बीएनपी ने घोषणा पत्र में तीस्ता और पद्मा नदी का मुद्दा उठाया था। इसमें कहा गया कि दोनों नदियों से पानी का उचित हिस्सा मिलना अस्तित्व का मुद्दा है। भारत के साथ यह मुद्दा लंबे समय से चला आ रहा था। रहमान का कहना है कि भारत के साथ साझा होने वाली 54 नदियों का पानी अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत एक कानूनी अधिकार है। उन्होंने वादा किया है कि सत्ता में आने के बाद पद्मा बैराज प्रोजेक्ट और चीन समर्थित तीस्ता नदी मास्टर प्लान को लागू करेंगे। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर भारत के साथ टकराव हो सकता है।

 

बांग्लादेश फर्स्ट: तारिक रहमान का कहना है कि उनके नेतृत्व में बांग्लादेश भारत, चीन और पाकिस्तान के साथ समान रिश्ते रखेगी। उनका तर्क है कि देश की विदेश नीति जनता के हितों के हिसाब से तय की जाएगी। 'बांग्लादेश फर्स्ट' पॉलिसी को अहमियत दी जाएगी। रहमान का कहना है कि वे पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते चाहते हैं, लेकिन गैर-बराबरी का समझौता या व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनकी यह नीति भी भारत के साथ रिश्ते बेहतर बनाने में आड़े आ सकती है।

 

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रहमान के सलाहकार के बयान से क्या संकेत मिल रहे?

कुछ विश्वेषकों का मानना है कि तारिक रहमान की अगुवाई में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते मोहम्मद यूनुस की तुलना में बेहतर होंगे, लेकिन शेख हसीना की भरपाई नहीं हो सकेगी। रहमान की अगुवाई में बांग्लादेश भारत से संयमित और बराबरी के रिश्ते चाहता है। जहां एक ओर भारत को कुछ मुद्दों पर आपत्ति है तो वहीं कुछ मुद्दों पर बांग्लादेश को भी।

 

तारिक रहमान के सलाहकार हुमायूं कबीर के एक बयान से भी इसकी झलक मिलती है। हूमायूं कबीर का कहना है कि बीएनपी सरकार भारत समेत सभी देशों से संतुलित संबंध बनाने की कोशिश करेगी। हम संतुलित संबंध चाहते हैं। अपने संबंधों को किसी एक देश तक सीमित नहीं रखेंगे। खास बात यह है कि उन्होंने शेख हसीना सरकार की आलोचना इसलिए की, क्योंकि वह नई दिल्ली की तरफ अधिक झुकी थी। इतना ही नहीं कबीर ने भारत में बढ़ते हिंदू कट्टरपंथ का भी मुद्दा उठाया। 

 

 


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