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लोकसभा में बढ़ेगी सांसदों की संख्या, नॉर्थ vs साउथ क्यों होने लगा?

गुरुवार से शुरू हो रहे संसद के विशेष सत्र में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के साथ-साथ परिसीमन के फॉर्मूले पर भी चर्चा होनी है। दक्षिण के राज्य इसी का विरोध कर रहे हैं।

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विरोध में उतरे दक्षिण के राज्य, Photo Credit: Khabargaon

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संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के लिए विशेष सत्र बुलाया गया है। इसी के साथ नए सिरे से परिसीमन भी किया जाना है। परिसमीन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 हो जाएगी। अब दक्षिण भारत के राज्यों के कई नेता सीटों की संख्या बढ़ाने के फॉर्मूले का विरोध कर रहे हैं। तेलंगाना में सरकार चला रहे रेवंत रेड्डी, तमिलनाडु में सरकार चला रहे एम के स्टालिन और कई अन्य नेता परिसीमन के फॉर्मूले के खिलाफ हैं। नई नवेली पार्टी बनाने वाले थलपति विजय ने भी इसका विरोध किया है। दक्षिण के नेताओं का कहना है कि इस तरह से सीटें बढ़ाने से दक्षिण के राज्य कमजोर हैं और उनकी वित्तीय शक्ति भी घट जाएगी।

 

नए प्रस्ताव के मुताबिक, राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या 815 हो जाएगी और केंद्र शासित प्रदेशों की लोकसभा सीटों की संख्या 35 हो जाएगी। इसमें लगभग डेढ़ गुना सीटें बढ़नी है। हर राज्य में मौजूदा सीटों की संख्या की तुलना में सीटों की संख्या डेढ़ गुना बढ़ने की उम्मीद है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में अभी 80 लोकसभा सीटें हैं और परिसीमन के बाद यह संख्या 120 या उससे भी ज्यादा की जा सकती है। इसी तरह अन्य राजों में भी सीटों की संख्या बढ़ाई जाएगी। अब दक्षिण के राज्यों का कहना है कि आनुपातिक रूप से देखें तो उत्तर भारत में सीटों की संख्या ज्यादा हो जाएगी और दक्षिण भारत में सीटों की संख्या कम हो जाएगी।

 

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क्या है सरकारी की तैयारी?

संसद के इस विशेष सत्र में महिलाओं को आरक्षण देने के लिए जो संविधान में संशोधन होना है। इसी को 131वां संशोधन नाम दिया गया है। इसके साथ ही, डीलिमिटेशन बिल 2026 भी पेश किया जाना है जिसके जरिए लोकसभा सीटों की संख्या 850 हो जाएगी। प्रस्ताव के मुताबिक, 2029 के लोकसभा चुनाव के बाद ही यह व्यवस्था लागू हो सकती है लेकिन इसका विरोध कई स्तर पर हो रहा है। कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी ने भी इसके विरोध में एक लेख लिखा था और इसे संविधान के खिलाफ बताया था।

 

क्यों परेशान हैं दक्षिण के राज्य?

इस मामले में सीटों की संख्या भले ही हर राज्य में उसी अनुपात में बढ़ रही हो लेकिन संख्या का अंतर बढ़ जा रहा है। दक्षिण के राज्यों की ओर से एक उदाहरण दिया जा रहा है। यह उदाहरण है- यूपी में अभी 80 सीटें हैं और तमिलनाडु में सीटों की संख्या 39 है। अंतर 41 का है। बाद में सीटों की संख्या अगर यूपी में 120 होती है और तमिलनाडु में 59 होती है तो दोनों का अंतर 61 का हो जाएगा। इसी अंतर को लेकर दक्षिण भारत के राज्य सवाल उठा रहे हैं। इतना ही नहीं, इन राज्यों का यह भी कहना है कि इसी अनुपात में उनका बजट आवंटन भी होगा जो कम साबित होगा।

 

बता दें कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन, केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, कर्नाटक के सीएम सिद्धारमैया और तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी इसका विरोध कर रहे हैं। वहीं, तमिनलाडु में एनडीए का हिस्सा AIADMK और आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी चंद्रबाबू नायडू इसके समर्थन में हैं।

 

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दक्षिण के राज्यों को एक तर्क यह है कि उन्होंने परिवार नियोजन के उपायों को अच्छे से लागू किया है और उनकी जनसंख्या कम बढ़ी है। वहीं, उत्तर के राज्यों की जनसंख्या ज्यादा बढ़ी है। इसी को लेकर दक्षिण के राज्यों का कहना है कि जनसंख्या के हिसाब से सीटों का निर्धारण होने पर उत्तर के राज्यों का फायदा होगा और दक्षिण के राज्यों का नुकसान होगा।

आंदोलन की धमकी दे रहे स्टालिन

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने राज्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर चर्चा करने के लिए बुधवार को द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सांसदों की एक आपात बैठक बुलाई है। स्टालिन ने मंगलवार को चेतावनी दी थी कि अगर परिसीमन प्रक्रिया में राज्य के हित को नुकसान पहुंचाने वाला कोई कदम उठाया गया या उत्तरी राज्यों की राजनीतिक ताकत में अनुचित बढ़ोतरी की गई तो तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर आंदोलन होंगे और  पूरी ताकत से विरोध प्रदर्शन होंगे जिससे राज्य ठप पड़ सकता है। स्टालिन ने कहा कि देश को एक बार फिर 1950 और 1960 के दशक की द्रमुक देखने को मिल सकती है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर पार्टी के शुरुआती दौर की ओर इशारा किया जिसमें पार्टी ने राज्य के अधिकारों और हिंदी को कथित रूप से थोपे जाने के खिलाफ कई आंदोलनों का नेतृत्व किया था।</p><p>द्रमुक की स्थापना 1949 में द्रविड़ विचारधारा के दिग्गज नेता सी एन अन्नादुराई ने की थी।

 

उधर, तेलंगाना के अपने समकक्ष रेवंत रेड्डी द्वारा परिसीमन पर पत्र लिखे जाने के बाद मंगलवार को स्टालिन ने उन्हें संदेश दिया, 'हमारी एकता हमारे राज्य के अधिकारों की रक्षा करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक न्यायपूर्ण और समान भविष्य सुनिश्चित करने के लिए है। दक्षिण एकजुट होकर खड़ा रहेगा, एक स्वर में बोलेगा और संघवाद की सच्ची भावना को कायम रखेगा।'

 

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इससे पहले रेवंत रेड्डी ने दक्षिणी राज्यों और पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर एक 'हाइब्रिड मॉडल' का प्रस्ताव रखा है जिसके तहत प्रस्तावित अतिरिक्त सीट में से 50 प्रतिशत सीट आनुपातिक आधार पर आवंटित की जाएंगी और शेष सीट जीएसडीपी (सकल राज्य घरेलू उत्पाद) और अन्य मानदंडों के आधार पर आवंटित की जाएंगी।

विजय भी कर रहे विरोध

 

तमिलनाडु में पहली बार चुनाव लड़ रहे थलपति विजय ने भी परिसीमन का विरोध किया है। महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए विजय ने कहा है कि परिसीमन से दक्षिण के राज्यों के साथ आनुपातिक असमानता और बढ़ जाएगी। उन्होंने यह भा कहा है कि अगर ऐसा होता है तो भाषा, संस्कृति, राज्यों के अधिकारों और केंद्र के नीति निर्धारण में दक्षिण के राज्यों को प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा और उत्तर के राज्यों का बढ़ जाएगा।। उनका कहना है कि यह बिल पास होना एक तरह से ऐसा होगा कि जो राज्य कई पीढ़ियों से केंद्र सरकार के एलानों का समर्थन करते रहे हैं, उन्हें सजा मिलेगी और जो विरोध करते रहे हैं, उन्हें इनाम मिलेगा।

 

 

विजय ने आगे कहा है, 'अगर यह बिल पास हो जाता है तो इसके वित्तीय प्रभाव भी होंगे। लोकसभा सांसदों की संख्या आनुपातिक तौर पर कम होने से राज्य को मिलने वाले पैसे भी कम हो जाएंगे। तमिलनाडु की राज्य सरकार पहले से ही केंद्र सरकार पर आरोप लगाती रही है कि वह उसे आर्थिक नुकासन पहुंचा रही है। ऐसी स्थिति में मैं मांग करता हूं कि इन प्रयासों को रोका जाए और पुरानी व्यवस्था ही चलने दी जाए।'


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