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कुर्ता फाड़ से होला मोहल्ला तक, जानें पटना में कैसे मनाई जाती है होली

पटना में होली का त्योहार पारंपरिक लोक गीतों, कुर्ता फाड़ मस्ती और सिख समुदाय के वीरता भरे 'होला मोहल्ला' के साथ पूरे उत्साह से मनाया जाता है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Freepik

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बिहार की राजधानी पटना की होली अपनी खास देसी मस्ती के लिए जानी जाती है, जहां रंगों के साथ-साथ लोक गीत और परंपराओं का संगम देखने को मिलता है। होलिका दहन के साथ ही शहर उत्सव के माहौल में डूब जाता है, जहां बुजुर्ग पारंपरिक भोजपुरी 'फाग' गीतों पर झूमते दिखाई देते हैं, वहीं युवा आधुनिक डीजे और रेन डांस का आनंद लेते हैं।

 

शहर के हर कोने में रंगों की फुहार और पकवानों की खुशबू बिखरी हुई नजर आती है। गंगा किनारे होने वाली विशेष पूजा से लेकर गलियों में होने वाली धुरखेली जिसे कीचड़ वाली होली भी कहा जाता है, पटना का हर इलाका अपनी एक अलग कहानी कहता है।

 

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कुर्ता फाड़ होली

पटना की होली का जिक्र हो और कुर्ता फाड़ होली की बात न हो, ऐसा मुमकिन नहीं। इस खास परंपरा में युवा एक-दूसरे के पुराने कुर्ते फाड़कर उन्हें पेड़ों या बिजली के तारों पर लटका देते हैं। 

 

इस परंपरा को लालू प्रसाद यादव के दौर से खास पहचान मिली। आज भी उनके परिवार और तेज प्रताप यादव जैसे नेताओं के आवास पर ढोल-मंजीरे की थाप के साथ इस पारंपरिक होली को जीवित रखा गया है।

पटना साहिब में 'होला मोहल्ला'

पटना की होली सिर्फ रंगों तक सीमित नहीं है। पटना साहिब गुरुद्वारे में सिख समुदाय 'होला मोहल्ला' के रूप में अपनी वीरता का प्रदर्शन भी करता है।

 

यह गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा शुरू की गई एक ऐतिहासिक परंपरा है। इसकी खासियत यह है कि यहां पंज प्यारों के नेतृत्व में भव्य नगर कीर्तन निकाला जाता है और शस्त्रों के दर्शन कराए जाते हैं। यह उत्सव रंगों की जगह शौर्य और वीरता का संदेश देता है, जहां श्रद्धालु लंगर और सेवा में जुटे रहते हैं।

 

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पूजा-पाठ और खान-पान का मेल

होलिका दहन के अवसर पर लोग पवित्र गंगा जल से पूजा करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। 

 

होली के दिन हर घर में मालपुआ, गुजिया और दही-बड़े जैसे पकवान मेहमानों का स्वागत करने के लिए बनाए जाते हैं। शाम में मां-पिता समेत सभी घर के बड़ें लोगों के पैर में अबीर या गुलाल लगाकर सभी छोटे उनका आशीर्वाद लेते हैं। उसके बाद शाम को लोग एक दूसरे के घरों में जाते हैं। 

 

पार्कों और क्लबों में आज के दौर के हिसाब से रेन डांस और पिचकारी वाली मस्ती भी जोरों पर है, जो पटना की राधा-कृष्ण वाली पारंपरिक लीला को आधुनिक रूप दे रही है।

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