डॉ. दीपक कुमार, नई दिल्ली: अल्बर्ट कामू ने अपनी किताब 'द मिथ ऑफ सिसिफस' में लिखा है, जीवन में बेमानी का एहसास होना स्वाभाविक है। हमें इस बेमानी को स्वीकार करके जीना चाहिए, जीवन खत्म नहीं करना चाहिए। अल्बर्ट कामू कहते हैं कि दुनिया अपने आप में कोई खास मकसद नहीं रखती। इंसान खुद मकसद बनाकर परेशानी पैदा कर लेता है। जब वह मकसद पूरा नहीं होता तो लगता है कि जीवन बेकार है। इसलिए कुछ लोग आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं।
इंसान कोई मशीन या प्रोडक्ट नहीं है जो सिर्फ एक काम करने के लिए बना हो। जीवन बहुत बड़ा और बहुआयामी है। इंसान में बहुत सारी क्षमताएं हैं। अगर एक काम में असफल हो गए तो जीवन खत्म नहीं करना चाहिए। दूसरा रास्ता खुलता है। एक गणितज्ञ कवि या चित्रकार बन सकता है। एक इंजीनियर संगीतकार या लेखक बन सकता है।
एक असफलता, आपको दे सकती है दूसरी दिशा
दुनिया में ऐसे हजारों उदाहरण हैं जहां लोग एक लक्ष्य में असफल हुए लेकिन दूसरे क्षेत्र में बहुत सफल हुए। दुर्भाग्य से आज का सिस्टम इंसान को सिर्फ नंबर समझता है। हाल ही में प्रवेश परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं में सरकारी लापरवाही के कारण भारत में 13 से ज्यादा छात्रों ने आत्महत्या कर ली। हर छात्र की आत्महत्या शिक्षा व्यवस्था, परिवार, समाज और सरकार की सामूहिक नाकामी है।
छात्रों को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी किसकी?
प्रश्न यह है कि छात्रों में जीवन की सही समझ, मुश्किलों से लड़ने की क्षमता और सकारात्मक सोच कौन विकसित करेगा? माता-पिता, शिक्षक, दोस्त, समाज या सरकार? एक भी आत्महत्या पूरे समाज की असफलता है। इसलिए सभी को मिलकर स्वस्थ माहौल बनाना होगा।
तीन लोग हर व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं-
माता-पिता क्या कर सकते हैं?
माता-पिता बच्चे की पहले और सबसे बड़े शिक्षक होते हैं। वे नैतिक मूल्य और चरित्र बनाते हैं। आजकल कई माता-पिता बच्चों को प्रोजेक्ट समझने लगे हैं। उन्हें अच्छे नंबर, अच्छी नौकरी और परिवार की इज्जत के लिए दबाव डालते हैं। माता-पिता को याद रखना चाहिए कि बच्चे की जान किसी भी लक्ष्य से ज्यादा कीमती है। उन्हें बच्चे को बार-बार आश्वासन देना चाहिए कि तुम्हारा जीवन सबसे महत्वपूर्ण है। सफलता-विफलता जीवन का हिस्सा है, लेकिन तुम्हारा होना इससे भी बड़ा है।

शिक्षक क्या कर सकते हैं?
घर के बाद शिक्षक दूसरी सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। अच्छा शिक्षक छात्र की कमियों को पूरा करता है, उसे सोचने-समझने वाला बनाता है। आज के शिक्षक को सिर्फ पढ़ाई नहीं, छात्रों के मन को भी समझना चाहिए। उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार अलग-अलग तरीके से मार्गदर्शन करना चाहिए। शिक्षक को संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए। शिक्षा का मकसद सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि अच्छा इंसान बनाना भी है।
दोस्त क्या कर सकते हैं?
दोस्त वह है जिसे हम खुद चुनते हैं। माता-पिता और शिक्षक चुनने का अधिकार सीमित होता है, लेकिन दोस्त हम स्वतंत्र रूप से चुन सकते हैं। एक सच्चा दोस्त उन भावनाओं और समस्याओं को समझ सकता है जिन्हें हम माता-पिता या शिक्षक से नहीं कह पाते। अच्छा दोस्त बिना जज किए सुनता है, हौसला बढ़ाता है और जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
माता-पिता और शिक्षकों को बिना दबाव और बिना उम्मीद के प्यार और मार्गदर्शन करना चाहिए। कोई भी काम, पद या लक्ष्य इंसानी जीवन से बड़ा नहीं है। प्रिय छात्रों, जीवन एक सुंदर उपहार है। इसमें उतार-चढ़ाव दोनों आते हैं। खुशियां भी आएंगी और चुनौतियां भी आएंगी। लेकिन जीवन जीने लायक है। आत्महत्या कोई समाधान नहीं है। जीवन को पूरा करो, उसका आनंद लो।
नोट: यह आलेख डॉ. दीपक कुमार ने लिखा है। वह द स्कूल ऑफ लॉ, बेनेट यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और कानून पढ़ाते हैं। वह जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली से पीएचडी और एमफिल के छात्र रहे हैं।