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PM बनने का ख्वाब, CM भी नहीं रहे, 4 नेताओं के हश्र से BJP-कांग्रेस खुश क्यों?

एक समय पर प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देखने वाले नेता अब मुख्यमंत्री पद तक गंवा बैठे हैं। इनके दलों की हालत अब ऐसी है कि अब वे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रहे हैं।

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केसीआर, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और नीतीश कुमार, Photo Credit: ChatGPT

देश के तमाम क्षेत्रीय दल एक के बाद एक करके सिमटते जा रहे हैं। इन दलों के कई नेता ऐसे हैं जो कभी प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे थे और अब उनका मुख्यमंत्री पद तक नहीं बचा। सत्ता गंवाने के बाद इनमें से ज्यादातर दल अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे हैं। रोचक बात है कि केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ-साथ कांग्रेस भी इन नेताओं के हश्र से खुश है। इनमें अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और के चंद्रशेखर राव का नाम शामिल है जो कभी न कभी केंद्र में नरेंद्र मोदी को चुनौती देने का अभियान चला चुके हैं। अब नेशनल डेमोक्रैटिक अलायंस (NDA) में शामिल हो चुके चंद्रबाबू नायडू ने भी ऐसी ही कोशिश की थी लेकिन अब वह NDA के साथ खुश हैं और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं।

 

ममता बनर्जी, के चंद्रशेखर राव, नीतीश कुमार, चंद्रबाबू नायडू और अरविंद केजरीवाल ने अलग-अलग समय पर नरेंद्र मोदी और बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिए तमाम कोशिशें कीं। INDIA गठबंधन की नींव ही नीतीश कुमार ने रखी थी लेकिन इसे अपने हिसाब से न बनता देख वह NDA में शामिल हो गए। इसी तरह चंद्रबाबू नायडू ने भी कोशिश की लेकिन आखिर में वह NDA में शामिल हुए, बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बने और अब केंद्र की एनडीए सरकार उनके सहयोग से चल रही है। तीन धुर विरोधी यानी ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और के चंद्रशेखर राव अपने-अपने राज्य में विधानसभा चुनाव हारकर बाहर हो चुके हैं और तीनों की ही पार्टी बेहद कमजोर स्थिति में आ गई है।

नीतीश कुमार

2024 के अप्रैल-मई महीने में लोकसभा के चुनाव होने थे। इससे कुछ महीने पहले तक नीतीश कुमार बीजेपी के धुर विरोधी और नरेंद्र मोदी के विरोधी खेमे के अगुवा के तौर पर नजर आ रहे थे। उनकी कोशिश थी कि वह INDIA गठबंधन के संयोजक या यूं कहें कि विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार हों। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ और नाराजगी बढ़ने लगी। बिहार का मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे नीतीश ने आखिर में विपक्ष को ही गच्चा दे दिया। 

नीतीश कुमार ने जनवरी 2024 में एक बार फिर से पाला बदला। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन को गच्चा दिया और एक बार फिर से एनडीए के साथ नजर आने लगे। चंद महीने पहले नरेंद्र मोदी के खिलाफ लामबंदी कर रहे नीतीश कुमार अब अचानक से उन्हीं नरेंद्र मोदी के साथ खड़े हो गए।

 

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2025 में नीतीश कुमार की अगुवाई में ही बिहार में एनडीए को जीत मिली लेकिन आखिर में ना चाहते हुए भी उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। अब वह राज्यसभा के सांसद हैं और कहा जा रहा है कि वह केंद्र सरकार में मंत्री भी बन सकते हैं। दूसरी तरफ उनकी पार्टी को अब अपना वजूद बचाए रखने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। शायद यही वजह रही कि परिवारवाद के धुर विरोधी नीतीश कुमार अपने ही बेटे निशांत कुमार को ना सिर्फ राजनीति में लाए बल्कि उन्हें बिहार सरकार में मंत्री भी बनवा दिया।

 

के चंद्रशेखर राव

एक समय पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव यानी केसीआर ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका को बड़ा करने का फैसला किया था। इसी कोशिश में उन्होंने अपनी पार्टी यानी तेलंगाना राष्ट्र समिति का नाम बदलकर भारत राष्ट्र समिति कर दिया। वह बिहार आकर नीतीश कुमार से भी मिले थे लेकिन मंच पर ही दिख गया था कि केमिस्ट्री कुछ जम नहीं रही है। इसकी बड़ी वजह थी कि जो लक्ष्य केसीआर का था, कमोबेश वही लक्ष्य नीतीश कुमार का भी था। यहां से केसीआर बैरंग लौट गए और अपनी सत्ता बचाने में लग गए। 2023 में जब विधानसभा के चुनाव हुए तो केसीआर के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

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तेलंगाना आंदोलन के नेता रहे केसीआर की पार्टी विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार गई और कांग्रेस ने उन्हें पटखनी दे दी। नतीजतन उनकी पार्टी टूटने लगी। यह पार्टी ऐसे टूटी कि केसीआर की ही बेटी के कविता को निकाल दिया गया और अब उन्होंने अपनी नई पार्टी बना ली है। केसीआर खुद सत्ता से तो गए ही, अब वह राजनीतिक रूप से बेहद कम सक्रिय हो गए हैं।

 

अरविंद केजरीवाल

खुद अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी (AAP) की महत्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं हैं। कभी वह कांग्रेस को छोड़कर एक अलग मोर्चा बनाने की अपील करते हैं तो कभी कांग्रेस के साथ ही गठबंधन करके चुनाव लड़ते हैं। इस सबके बीच अरविंद केजरीवाल आबकारी नीति में जेल गए और जब लौटे तो दिल्ली में अपनी पार्टी की सरकार नहीं बचा पाए। दो बार 90 प्रतिशत से ज्यादा सीटें जीतने वाली AAP के सभी बड़े नेता चुनाव हार गए।

 

एक समय पर एलान करके शीला दीक्षित को हराने वाले अरविंद केजरीवाल अपनी ही विधानसभा सीट नई दिल्ली से चुनाव हार गए और उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। AAP के कई बड़े नेताओं ने उसका साथ छोड़ दिया और अब राज्यसभा सांसदों ने भी पाला बदल लिया है। अब AAP के पास सिर्फ पंजाब बचा है और अगर वहां भी उसे हार मिलती है तो अरविंद केजरीवाल के लिए पार्टी का वजूद बचाना मुश्किल हो जाएगा।

 

ममता बनर्जी

कहा जाता है कि अब INDIA गठबंधन की बात करने वाली ममता बनर्जी कभी भी इसे लेकर सहज नहीं रहीं। बड़ी वजह थी कि वह नरेंद्र मोदी के सामने खुद को प्रोजेक्ट करवाना चाहती थीं लेकिन कांग्रेस समेत कई अन्य नेता इसके लिए कभी राजी नहीं थे। लेफ्ट और कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न देने वाली ममता बनर्जी हाल ही में बंगाल विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हारी हैं। उन्होंने अपनी सत्ता तो गंवाई ही, वह खुद अपनी विधानसभा सीट हार गईं। ऐसे में उनके प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब को भी बड़ा झटका लगा है।

 

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इन चार नेताओं के बारे में एक चीज कॉमन है कि चारों के ही हश्र से बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस भी खुश है। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने का सीधा फायदा बीजेपी को हुआ है और पहली बार वह बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने में कामयाब हुई है। साथ ही, कांग्रेस के सामने से एक ऐसा नेता हट गया जिसकी छवि सेक्युलर रही है। 

 

केसीआर को खुद कांग्रेस ने हराया और तेलंगाना में पैर जमाने की कोशिश कर रही बीजेपी को भी इसकी खुशी है। बीजेपी को लगता है कि कांग्रेस से सीधे मुकाबले में वह अच्छा प्रदर्शन कर सकती है। इसी तरह अरविंद केजरीवाल को बीजेपी ने हराया लेकिन कांग्रेस खुश है क्योंकि AAP जहां-जहां मजबूत हुई है, वहां उसने कांग्रेस को ही खत्म किया है। दिल्ली और पंजाब के बाद गोवा और गुजरात में भी देखा गया है कि AAP ने कांग्रेस के वोटबैंक में जबरदस्त सेंध लगाई और कांग्रेस चाहती है कि AAP अब सत्ता में वापसी न कर पाए।

 

ममता बनर्जी की हार में कांग्रेस अपनी जीत देख रही है क्योंकि उसे लगता है कि इस बहाने टीएमसी के तेवर ढीले होंगे और बंगाल में कांग्रेस का भी स्पेस बनेगा। अभी तक ममता बनर्जी कांग्रेस को एक भी सीट देने को तैयार नहीं थीं लेकिन चुनाव हारते ही वह इंडिया गठबंधन की बात करने लगी हैं। 


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