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पाकिस्तान और मियां मुस्लिम पर अटकी असम की राजनीति, राज्य के असल मुद्दे कहां हैं?

असम की राजनीति में हाल के दिनों में पाकिस्तान और मियां मुस्लिम जैसे मुद्दों पर काफी जोर दिया जा रहा है। इस राजनीतिक बहस को खुद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा हवा दे रहे हैं।

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खेतों में काम करती महिलाएं। Photo Credit- PTI

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पूर्वोत्तर भारत के सबसे बड़ा और समृद्ध राज्य असम में अगले कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनाव आयोग इसको लेकर घोषणा करेगा। चुनाव को देखते हुए सत्ताधारी भारतीय जानता पार्टी और कांग्रेस पूरे दमखम के साथ सक्रिय हो गए हैं। असम की राजनीति में हाल के महीनों में पाकिस्तान और मियां मुस्लिम जैसे मुद्दों पर काफी जोर दिया जा रहा है। इस राजनीतिक बहस को खुद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा हवा दे रहे हैं। इसके साथ ही हिमंता सरमा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और सांसद गौरव गोगोई पर पाकिस्तान से कथित संबंध होने के आरोप लगा रहे हैं।

 

मुख्यमंत्री हिमंता सरमा ने गौरव गोगोई की पत्नी के पाकिस्तान से कथित लिंक को लेकर जांच भी बैठाई है। असम में बीजेपी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताकर उठा रही है। वह मियां मुस्लिम समुदाय को अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के तौर पर बता रहे हैं। अपने हालिया बयान में सीएम ने कहा भी कि 'मियां समुदाय को परेशान करके उन्हें राज्य से बाहर करने की जरूरत है।' उनके इस बयान के बाद सियासी विवाद बढ़ गया है।

 

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राज्य में ध्रुवीकरण की राजनीति?

असम में कांग्रेस सहित राज्य स्तर की पार्टियां सीएम हिमंता के इन बातों और मुद्दों को हिंदू वोटों में बंटवारा करके उन्हें एकजुट करने साजिश बता रहे हैं। साथ ही कहा है कि इन मुद्दों से राजनीति करके बीजेपी असम में ध्रुवीकरण कर रही है। 

 

 

मगर, इन सबके बीच असम के असली और जरूरी मुद्दे पीछे छूट रहे हैं, जिनसे जनता का हकीकत में जरूरत है। दरअसल, असम की आबादी तकरीबन 3.5 करोड़ है। राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से चाय, तेल, और अब उभरते सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों पर निर्भर है। इसके अलावा असम में प्रमुख समस्याओं में राज्य का विकास, पर्यावरण, और बाढ़ से जैसे मुद्दे हैं। मगर, इन मुद्दों पर कोई बात नहीं हो रही है। 

 

ऐसे में आइए जानते हैं कि असम के असल में वह मुद्दे कहां हैं, जो वाकई में जनता को प्रभावित करेंगे...

बाढ़ और पर्यावरणीय संकट

असम में लगभग हर साल बारिश के मौसम में बाढ़ आती है, जो राज्य के लाखों लोगों को प्रभावित करती है। यह बाढ़ ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों से मैदानी इलाकों में आती है। इसकी वजह से प्रभावित होकर लोग बेघर होते हैं और बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान पहुंचाता है। इस विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री हिमंता सरमा ने बाढ़ पर एक बार भी बात नहीं की है। विपक्ष बाढ़ को सरकारी योजना की कमी की वजह से आया संकट मानता है। दरअसल, राज्य में हो रहे जलवायु परिवर्तन की वजह से राज्य में बाढ़ हर साल और गंभीर हो रहा है। अवैध वनों की कटाई और भूमि अतिक्रमण पर्यावरण को और खराब कर रहे हैं।

असम में बेरोजगारी और असमानता

असम में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। यह समस्या कई सालों से असम में बनी हुई है। राज्य में युवा आबादी बड़े पैमाने पर है, जिनके सामने नौकरी का संकट है। महंगाई भी एक प्रमुख मुद्दा है, जो आम लोगों को प्रभावित कर रही है। हालांकि सरकार चाय निर्यात और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में प्रगति का दावा करती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में विकास उस हद तक नहीं पहुंचा है, जैसा पहुंचना चाहिए। 

 

 

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जनजातीय अधिकार और भूमि मुद्दे

असम में जनजातीय अधिकार और भूमि मुद्दे काफी संवेदनशील हैं। राज्य की जनसंख्या में अनुसूचित जनजातियां का हिस्सा काफी है। इनमें बोडो, कार्बी, मिसिंग, राभा, तिवा, दिमासा, हाजोंग आदि प्रमुख हैं। यह जातियां बड़े पैनामे पर वोट भी करती हैं, जो प्रमुख रूप से पहाड़ी और कुछ मैदानी क्षेत्रों में रहती हैं। असम में आदिवासी जातियों की जमीनों पर आतिक्रमण करने के आरोप लगते रहे हैं।

 

दीमा हसाओ जिले में 3,000 बीघा से ज्यादा जमीन JK लक्ष्मी और अडानी जैसी सीमेंट कंपनियों को आवंटित की गई है। बाद में मामला बढ़ने की वजह से गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सवाल उठाए। मगर, यह मुद्दे इस विधानसभा चुनाव से गायब दिखाई दे रहे हैं।

 

इसके अलावा असम में इस बार मतदाता सूची और चुनावी हेरफेर और स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचा जैसे बुनियादी मुद्दे हैं।


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