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BJP या अकाली दल, गठंबधन से किस पार्टी को होगा ज्यादा फायदा? समझिए पूरा गणित

पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात ने फिर से गठबंधन को लेकर चर्चा शुरू कर दी है। समझिए इस गठबंधन से किस पार्टी को फायदा होगा और किस पार्टी को नुकसान।

Sukhbir Badal and PM Modi

पीएम मोदी और सुखबीर बादल, Photo Credit: Social Media

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संसद के मानसून सत्र के दौरान शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष और पूर्व डिप्टी सीएम सुखबीर बादल ने पीएम मोदी से मुलाकात की है। इस मुलाकात में क्या चर्चा हुई इस बारे में तो अब तक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई लेकिन इस मुलाकात के बाद भारतीय जनता पार्टी के पुराने सहयोगी के एनडीए में शामिल होने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। पंजाब में करीब 6 महीने बाद ही चुनाव हैं और इन चुनावों में अब तक दोनों दलों का रुख रहा है कि वे अकेले-अकेले चुनाव लड़ेंगे। इस मुलाकात के बाद चर्चा है कि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की चर्चा हो रही है। 

 

पंजाब में बीजेपी और अकाली दल दशकों तक एक साथ रहा है। इसे एक हिंदू-सिख गठबंधन के तौर पर भी देखा जाता था। 2007 से 2017 तक लगातार पार्टी सत्ता में भी रही। हालांकि, 2017 में हार के बाद 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी को झटका लगा। इसके बावजूद हरसिमरत कौर बादल को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली। इसके बाद 2020 में किसान कानूनों को लेकर अकाली दल ने बीजेपी से रिश्ता तोड़ लिया और गठबंधन और सरकार दोनों से अलग हो गए।

 

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गठबंधन को लेकर अब क्या रुख?

गठबंधन 2022 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में दोनों दल साथ नहीं आए। इसके बाद हुए चुनाव में दोनों दलों ने अकेले-अकेले चुनाव लड़ा। भारतीय जनता पार्टी भी अब पंजाब में अपने संगठन का विस्तार कर रही है और नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बना रही है। पार्टी के सीनियर नेताओं ने साफ कर दिया है कि अकाली दल के साथ कोई गठबंधन नहीं होगा। हालांकि, अकाली दल के नेता गठबंधन करना चाह रहे हैं। 

क्या गठबंधन ना करने से बीजेपी को फायदा?

इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में पंजाब बीजेपी के अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने बताया कि पार्टी आलाकमान ने उन्हें सभी 117 सीटों पर चुनाव की तैयारी के निर्देश दिए हैं। उन्होंने अकाली दल के साथ गठबंधन पर कहा कि जिस समय अकाली दल के साथ गठबंधन था उस समय बीजेपी को लोकसभा की 13 में से 3 सीटें और विधानसभा की 117 में से 23 सीटें मिलती थी। इससे पार्टी को अपने संगठन का विस्तार करने का मौका नहीं मिला। हालांकि, इसके बाद अब पार्टी ने गांवों में भी अपने संगठन का विस्तार कर लिया है। बीजेपी को लगता है कि अकाली दल की छाया में पार्टी कभी पंजाब में संगठन का विस्तार नहीं कर पाएगी। अकाली दल बीजेपी को ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका नहीं दे रहा और इसी कारण 2024 के लोकसभा चुनाव में चर्चा के बावजूद गठबंधन नहीं हो पाया था। अकाली दल से गठबंधन ना करने से बीजीपे के पास कई कारण हैं। 

  • बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में पहले की तुलना में ज्यादा वोट हासिल किए, भले ही सीट ना मिली हो लेकिन 19 प्रतिशत वोट हासिल किया।
  • बीजेपी पंजाब में लगातार अपने कैडर का विस्तार कर रही है।
  • बीजेपी के पास नेताओं की भरमार है भले ही वे दूसरे दलों से आए हैं।
  • बीजेपी अब नए सामाजिक समीकरण बना रही है। 

अकाली दल से गठबंधन में बीजेपी को एक हिंदू पार्टी के रूप में पेश किया जाता था लेकिन अब बीजेपी ने एक सिख चेहरे को प्रधान बनाकर संदेश दे दिया है कि वह सिर्फ हिंदुओं की पार्टी नहीं है। इसके साथ ही पार्टी अब शहरी इलाकों से निकलकर ग्रामीण इलाकों में पकड़ मजबूत कर रही है। अकाली दल के साथ गठबंधन में पार्टी कुछ शहरी इलाकों तक ही सिमट कर रह जाती थी और अकाली दल ही मुख्य रूप से चुनाव लड़ता था। हालांकि, बीजेपी अब अपने दम पर पंजाब में राजनीतिक शक्ति बनने का प्लान बना रही है। 

 

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क्या अकाली दल को होगा नुकसान?

अकाली दल को कई बार सत्ता तक पहुंचाने में बीजेपी का अहम योगदान रहा है। अकाली दल एक पंथिक पार्टी के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर चुकी है ऐसे में करीह 38 प्रतिशत हिंदुं आबादी के लिए पार्टी बीजेपी पर निर्भर थी। अब बीजेपी के चले जाने से पार्टी के पास इन 38 प्रतिशत हिंदुओं के लिए कुछ खास प्लान नहीं है। नेतृत्व भी सिख चेहरों तक ही सिमटा हुआ है और अभी पार्टी अपने पुराने वोटबैंक पर ही फोकस कर रही है जबकि कई पंथिक पार्टियां पंजाब में विस्तार कर चुकी हैं। अमृतपाल की पार्टी एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी है। ऐसे में अकाली दल को एक मजबूत सहयोगी चाहिए जो उसके लिए एक मजबूत वोटबैंक ला सके। 

 

हालांकि, बीजेपी के साथ ना रहने से अकाली दल को कुछ फायदे भी हैं। बीजेपी एक राष्ट्रीय पार्टी है और पंजाब की राजनीति को जानने वाले इस बात पर सहमत हैं कि लंबे समय से पंजाब का रुख केंद्र की सत्ता के खिलाफ रहा है। फिर चाहे वह 2007 और 2012 में कांग्रेस हो हराना हो या अन्य मुद्दों पर केंद्र सरकार का विरोध करना हो। ऐसे में बीजेपी के जाने से अकाली दल खुलकर क्षेत्रिय मुद्दों पर राजनीति कर सकता है। चंडीगढ़, पंजाब के पानी, बंदी सिखों की रिहाई समेत तमाम मु्द्दों पर बीजेपी के साथ रहने से अकाली दल असहज स्थित में रहता लेकिन गठबंधन से अलग होकर अकाली दल इन मु्द्दों पर विस्तार कर सकता है। इसके साथ ही बीजेपी के साथ कट्टर पंथिक वोट अकाली दल के साथ नहीं जुड़ पा रहा था और पार्टी भी इन मुद्दों पर नरम रुख रखती थी लेकिन अब पार्टी अपनी पुरानी नीति को फिर से लागू कर सकती है। ऐसे में इस गठबंधन से दोनों पार्टियों को अगर कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं। 


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