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योगी पर कटाक्ष या प्रेशर बनाने की राजनीति? क्या है बृजभूषण शरण सिंह का एजेंडा

यूपी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह इन दिनों सपा मुखिया अखिलेश यादव की तारीफ और सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान पर कटाक्ष कर रहे हैं। इसको लेकर सियासी गलियारों में चर्चा तेज हो गई है।

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पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह। Photo Credit Social Media

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में हैं। पिछले कुछ समय से वह लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं, जिन्हें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लाइन से अलग माना जा रहा है।

 

कभी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की सार्वजनिक रूप से तारीफ, कभी उन्हें 'श्रीकृष्ण का वंशज' बताना और अब हनुमानगढ़ी से जुड़े बयान पर मुख्यमंत्री के दावे से अलग राय रखना- इन घटनाओं ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बृजभूषण सिर्फ अपनी राय रख रहे हैं या फिर यह बीजेपी नेतृत्व पर दबाव बनाने की राजनीतिक रणनीति है?

 

हनुमानगढ़ी विवाद पर योगी के बयान से अलग रखी राय

 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 जुलाई को एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि हनुमानगढ़ी मंदिर की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ी गई थी। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि विपक्ष खुद को वास्तव में सेकुलर मानता है तो क्या किसी जामा मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ कराया जा सकता है। मुख्यमंत्री के इस बयान के ठीक सात दिन बाद बृजभूषण शरण सिंह ने अलग रुख अपनाया।

 

उन्होंने कहा कि हनुमानगढ़ी में कभी नमाज नहीं पढ़ी गई और ऐसा दावा सही नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर के निर्माण में एक मुस्लिम का योगदान रहा था और वहां आज भी उससे जुड़ा शिलालेख मौजूद है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई कि बीजेपी के भीतर अलग-अलग स्वर क्यों सुनाई दे रहे हैं।

 

अखिलेश यादव की खुलकर कर चुके हैं तारीफ

 

हनुमानगढ़ी का मामला पहला नहीं है। पिछले कुछ महीनों में बृजभूषण शरण सिंह कई बार समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की तारीफ करते दिखाई दिए। उन्होंने अखिलेश को "श्रीकृष्ण का वंशज" तक बताया और कई मौकों पर उनके राजनीतिक व्यवहार की सराहना की। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता द्वारा विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे की सार्वजनिक प्रशंसा को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

 

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दो साल में कई बार दिखे अलग तेवर

 

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पिछले करीब दो सालों में बृजभूषण शरण सिंह के कई बयान बीजेपी की आधिकारिक राजनीतिक लाइन से अलग रहे हैं। उन्होंने समय-समय पर संगठन, टिकट वितरण, स्थानीय राजनीति और कई अन्य मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। उनके बयानों ने कई बार विपक्ष को भी भाजपा पर हमला करने का अवसर दिया।

 

योगी और बृजभूषण का पुराना रिश्ता

 

बृजभूषण शरण सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दोनों का संबंध गोरक्षपीठ से रहा है। दोनों महंत अवैद्यनाथ के शिष्य रहे हैं। राजनीतिक हलकों में आज भी एक पुराना प्रसंग चर्चा में रहता है कि लोकसभा में भाषण के दौरान जब तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ भावुक हो गए थे तो उनके बगल में बैठे बृजभूषण शरण सिंह ने उन्हें अपना रूमाल दिया था। दोनों नेताओं के पुराने व्यक्तिगत संबंधों के बावजूद आज सार्वजनिक बयानों में मतभेद चर्चा का विषय बन रहे हैं।

 

बीजेपी छोड़ चुके हैं, सपा का भी कर चुके हैं सफर

 

बृजभूषण शरण सिंह का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। वर्ष 2008 में बीजेपी से अलग होने के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थामा और 2009 का लोकसभा चुनाव सपा के टिकट पर जीता। दिलचस्प बात यह रही कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कराया था, लेकिन बाद में वही समाजवादी पार्टी उनके लिए राजनीतिक ठिकाना बनी।

 

क्या है 'प्रेशर पॉलिटिक्स' की रणनीति?

 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बृजभूषण शरण सिंह प्रदेश के उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिनका प्रभाव सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं माना जाता। गोंडा, बहराइच, बलरामपुर, बस्ती और आसपास के इलाकों की करीब 20 विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव माना जाता है, जबकि पूर्वांचल की कई अन्य सीटों पर भी उनका समर्थक आधार है। इसी कारण उनके हर बयान को राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जाता है।

 

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव की तारीफ और बीजेपी की लाइन से अलग बयान देना राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है, ताकि यह संदेश जाए कि उनके लिए राजनीतिक विकल्प पूरी तरह बंद नहीं हैं। हालांकि बृजभूषण शरण सिंह ने स्वयं ऐसा कोई दावा नहीं किया है।

 

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बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा नजरअंदाज करना

 

बीजेपी लंबे समय से परिवारवाद के खिलाफ अपनी राजनीतिक लाइन रखती रही है, लेकिन बृजभूषण शरण सिंह के परिवार के कई सदस्यों को भी समय-समय पर चुनावी जिम्मेदारियां मिली हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनके क्षेत्रीय प्रभाव और समर्थक आधार को देखते हुए बीजेपी भी उन्हें पूरी तरह नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं है।


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