कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष
राहुल गांधी
एक बार फिर विदेश दौरे पर हैं। ठीक उस वक्त जब चुनावी राज्यों उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से कांग्रेस के रिश्ते खराब हो रहे हैं और पंजाब में आपकी कलह मची हुई है। बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हो, 2020 में कांग्रेस के स्थापना दिवस का मौका हो या फिर अब कांग्रेस का खुद का कार्यक्रम 'छात्रों की गूंज' हो। कई ऐसे मौके रहे हैं जब राहुल गांधी ऐन वक्त पर विदेश चले गए। अब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) भी उनके इस दौरे पर सवाल उठा रही है। उधर कांग्रेस असमंजस की स्थिति में है। पंजाब में वह फैसला नहीं कर पा रही है और छात्रों का मुद्दा ठंडा पड़ता जा रहा है।
कई बार कांग्रेस की विरोधी बीजेपी ने राहुल गांधी के विदेश दौरे को लेकर सवाल भी उठाए हैं। इसी साल मई के महीने में बीजेपी ने पूछा था कि राहुल गांधी ने पिछले 22 साल में जो 54 विदेश यात्राएं कीं, उन पर खर्च हुए 60 करोड़ रुपये कहां से आए? बीजेपी ने राहुल गांधी की कुल आय 11 करोड़ बताते हुए सवाल उठाए थे कि आखिर राहुल गांधी किसके खर्च पर विदेश जाते रहते हैं? हालांकि, इस बार मुद्दा विपक्ष नहीं खुद उनकी पार्टी का संकट है।
संकट के मौके पर विदेश में राहुल गांधी
इन दिनों पंजाब कांग्रेस में सिर फुटौव्वल चल रही है। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को ही पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए रखने के खिलाफ चरणजीत सिंह चन्नी समेत कई नेता नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। इनमें से कई नेता दिल्ली से संपर्क करने की कोशिश भी कर चुके हैं। चरणजीत चन्नी तो दिल्ली भी आए थे लेकिन उन्हें मिलने का समय नहीं मिला। इसकी वजह थी कि राहुल गांधी देश में हैं नहीं,
सोनिया गांधी
अब राजनीतिक मामलों के बारे में किसी से मिलती नहीं और
प्रियंका गांधी
अभी तक इस मामले में किसी भी तरह का दखल देने से बच रही हैं। इस तरह मामला अटका हुआ है।
पंजाब के अलावा दूसरा सबसे अहम चुनाव उत्तर प्रदेश का होना है। समाजवादी पार्टी के मुखिया
अखिलेश यादव
बार-बार साथ लड़ने की बात कह रहे हैं लेकिन कांग्रेस के राज्य स्तर के नेताओं, सांसदों और प्रभारियों की बयानबाजी सपा के खिलाफ ही जारी है। चुनाव में एक साल से भी कम वक्त बचा है और कांग्रेस ने अभी तक गठबंधन को लेकर कोई स्पष्ट मत नहीं रखा है। कहा जा रहा है कि इसका फैसला राहुल गांधी को ही लेना है लेकिन वह इन दिनों बाहर हैं।
तीसरा मुद्दा 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम का है। चर्चा थी कि राहुल गांधी कई शहरों में जाकर बड़े कार्यक्रम करेंगे। ऐसा एक कार्यक्रम राजस्थान के कोटा में हुआ भी लेकिन प्रयागराज और अन्य शहरों में होने वाले कार्यक्रमों को टाल दिया गया क्योंकि राहुल गांधी विदेश में हैं। ऐसे में पार्टी के पदाधिकारियों से लेकर कार्यकर्ताओं तक का जोश ठंडा है और सब राहुल गांधी के इंतजार में हैं।
पहले भी कई बार ऐसे मौकों पर गए राहुल गांधी
अहम मौकों पर राहुल गांधी के विदेश दौरों की शुरुआत 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से ही हो जाती है। 2014 में कांग्रेस की हार के बाद सबसे अहम मुद्दा भूमि कानून था। उस वक्त राहुल गांधी बाहर थे। आखिरी वक्त में वह लौटे और तब उनका चर्चित 'सूट-बूट की सरकार' वाला भाषण आया था।
साल 2019 में हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव होने थे और उसके ठीक पहले राहुल गांधी विदेश चले गए थे। 2024 में भी जब इन राज्यों के विधानसभा चुनाव होने थे तब राहुल गांधी विदेश दौरे पर गए।
2025 में बिहार के विधानसभा चुनाव होने थे और कुछ महीने पहले ही राहुल गांधी विदेश दौरे पर चले गए थे। सितंबर 2025 में राहुल गांधी ने बिहार में वोटर अधिकार यात्रा निकाली और चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर से विदेश यात्रा पर चले गए। उस चुनाव में कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बीच जबरदस्त मतभेद दिखे और इसका नतीजा चुनावी हार के रूप में सामने आया।
ऐसे में अब एक बार फिर से राहुल गांधी की अनुपस्थिति कांग्रेस के लिए मुसीबत का सबब बनी हुई है। कहा जा रहा है कि राहुल गांधी इस बार संसद सत्र शुरू होने से ठीक पहले लौट सकते हैं। कयास लगाए जा रहे हैं कि संसद सत्र शुरू होने से पहले ही मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल हो सकता है। अगर ऐसा होता है और धर्मेंद्र प्रधान का मंत्रालय बदल भी दिया जाता है तो राहुल गांधी एक मौका गंवा सकते हैं और इसका क्रेडिट
कॉकरोच जनता पार्टी
को जा सकता है और कांग्रेस इसका माइलेज लेने से चूक सकती है।