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बंगाल, त्रिपुरा अब केरल, हारे तो फिर नहीं लौटे, वामपंथी संसद से भी बाहर होंगे?

लेफ्ट के दलों की हालत अब ऐसी हो चुकी है कि अब उसकी सरकार किसी भी राज्य में नहीं बची है। लोकसभा और राज्यसभा में भी उसकी स्थिति बेहद कमजोर हो गई है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: ChatGPT

एक समय पर देश के वापमंथी दलों की धमक ऐसी थी कि कई राज्यों में उनकी सरकार थी। इतना ही नहीं देश की सत्ता पर काबिज कई सरकारें भी लेफ्ट से चलीं। अब हालात ऐसे हो गए हैं कि किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं है और कुछ ही साल में राज्यसभा में भी वामपंथी सांसदों की संख्या शून्य हो सकती है। इसकी बड़ी वजह यह है कि पिछले एक दशक से कम के वक्त में लेफ्ट ने अपने दो मजबूत किलों यानी कि त्रिपुरा और केरल को गंवा दिया है। त्रिपुरा में लगातार दो बार उसे हार मिल चुकी है और अब केरल की सत्ता से भी वह बाहर हो गया है। संगठन बेहद कमजोर स्थिति में है और गठबंधन के बावजूद बंगाल जैसे राज्य में उसे कोई कामयाबी नहीं मिल पा रही है।

 

मौजूदा समय में लेफ्ट के सांसद केरल, तमिलनाडु, बिहार और राजस्थान तक ही सीमित हैं। वे तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), बिहार में महागठबंधन और केरल में दोनों प्रमुख वापमंथी दलों और कई अन्य दलों के गठबंधन से जीत हासिल हुई है। अभी यानी मई 2026 में लेफ्ट के कुल 8 लोकसभा सांसद और पांच राज्यसभा सांसद हैं। हालांकि, केरल, बिहार, राजस्थान और तमिलनाडु, इन चारों ही राज्यों में राजनीतिक परिस्थितियां जिस तरह से बदली हैं उसके चलते यह कहा जा सकता है कि आने वाले समय में संसद में लेफ्ट के सांसदों की संख्या भी शून्य हो सकती है।

लोकसभा में बेहद कमजोर है लेफ्ट?

लोकसभा में लेफ्ट के कुल 8 सांसद हैं। सबसे ज्यादा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के चार सांसद हैं। इन चार में से दो सांसद तमिलनाडु से और एक-एक सांसद केरल और राजस्थान से हैं। राजस्थान और तमिलनाडु में ये सीटें INDIA गठबंधन का हिस्सा होने के चलते मिली थीं और केरल में अपने बलबूते सीपीएम को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली थी। इसी तरह सीपीआई के दोनों लोकसभा सांसद तमिलनाडु से हैं और वह भी INDIA गठबंधन का हिस्सा थी। तमिलनाडु में जोसेफ विजय का उदय हुआ और कांग्रेस ने तुरंत उसके साथ न सिर्फ सरकार बनाने का फैसला किया बल्कि आगामी चुनाव में साथ लड़ने का एलान कर दिया। 

 

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अगर ऐसा होता है तो 2029 के चुनाव में डीएमके की अगुवाई वाले गठबंधन की स्थिति कमजोर हो सकती है और कई लोकसभा चुनावों से चलता आ रहा उसका वर्चस्व खतरे में पड़ सकता है। इस स्थिति में लेफ्ट को और नुकसान होने की आशंका है। सीपीआई (ML) के दोनों सांसद बिहार से जीतकर आए हैं। 2025 के चुनाव में महागठबंधन की हार के बाद एनडीए एकदम प्रभावी स्थिति में दिख रहा है। ऐसे में 2029 के लोकसभा चुनाव में क्या होगा और उसमें लेफ्ट की क्या भूमिका होगी, इसके बारे में अभी कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।

राज्यसभा से खत्म हो जाएंगे वामपंथी?

बंगाल के बाद त्रिपुरा हार जाने के बाद वामपंथी दलों के लिए एकमात्र उम्मीद सिर्फ और सिर्फ केरल बचा था। वामपंथी दलों के कुल पांच राज्यसभा सांसद हैं। इसमें से तीन सीपीएम के हैं और दो सीपीआई के हैं। रोचक बात है कि ये पांचों सांसद केरल से ही आते हैं। इनमें से दो का कार्यकाल 2027 में, दो का 2028 में और एक का कार्यकाल 2030 में खत्म हो रहा है। केरल के हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजे यह दिखाते हैं कि अब ये सीटें भी वामपंथी दलों के हाथ से जाने वाली हैं। इसकी वजह है केरल में लेफ्ट की ना सिर्फ हार हुई है बल्कि उनके विधायकों की संख्या बहुत कम हो गई है।

 

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हाल में हुए चुनाव में सिर्फ 38 सीटों पर सिमटने के बाद लेफ्ट की सरकार चली गई। इसमें से सीपीएम की खुद की 26 और सीपीआई की कुल 8 सीटें आईं। बाकी की 4 सीटों पर उसके सहयोगी दलों की जीत मिली। केरल में 2027 के अप्रैल महीने में तीन सीटों पर चुनाव होंगे। इन तीन में से दो सीटें अभी लेफ्ट के कब्जे में है और एक पर IUML के सांसद हैं। मौजूदा नंबर के हिसाब से लेफ्ट इसमें से बमुश्किल एक ही सीट जीत सकती है। इसी तरह 2028 में भी 3 सीटों पर चुनाव हैं। इनमें से दो पर कांग्रेस तो एक पर लेफ्ट काबिज है। नंबर गेम के मुताबिक, लेफ्ट इन सीटों को भी गंवा सकती है। 

 

ऐसे में अगले दो ही साल में लेफ्ट के राज्यसभा सांसदों की संख्या पांच से घटकर 1 या 2 पर आ सकती है। एक सांसद पीपी सुनीर का कार्यकाल 2030 तक है और अगर लेफ्ट इसी तरह कमजोर होता रहा तो उसकी यह सीट भी जा सकती है। इस तरह अगले 4 साल में राज्यसभा में लेफ्ट के सांसदों की संख्या शून्य हो सकती है। अगर उसे अपने सांसदों की संख्या बरकरार रखनी है तो उसे कुछ नए राज्यों में अपने संगठन का विस्तार करना होगा या फिर गठबंधन सहयोगियों पर आश्रित रहना होगा।

 

 

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