कर्नाटक के पूर्व सीएम
सिद्धारमैया
ने बड़ा ऐलान किया। उनका कहना है कि आज सियासत भ्रष्ट हो गई। लोगों के सुख-दुख की आवाज बनूंगा। मगर 2028 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ूंगा। सिद्धारमैया ने अपनी उम्र का हवाला दिया और कहा कि अब पहले जोश और उत्साह के साथ काम करना संभव नहीं है।
उनका कहना है कि आज चुनाव लड़ने के बदले लोगों को पैसे देने पड़ते हैं। ईमानदार सियासत की अब कोई जगह नहीं बची है। इसी कारण से भविष्य में कोई चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है। मांड्या जिले के के.आर. पेट में शनिवार को आयोजित एक निजी कार्यक्रम में सिद्धारमैया ने यह ऐलान किया।
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एक दिन बाद यानी रविवार को उनके एक्स अकाउंट से एक लंबा चौड़ा पोस्ट किया गया। इसमें लिखा, आज राजनीति भ्रष्ट हो गई है। इसलिए मैं 2028 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ूंगा। हालांकि सियासत में सक्रिय रहते हुए लोगों के सुख-दुख की आवाज बनता रहूंगा।'
आगे कहा कि पांच दशकों तक प्रदेश की जनता ने मुझे अपने ही बीच का एक व्यक्ति माना और प्यार से मेरा मार्गदर्शन किया। मुझ पर उनका यह कर्ज है। इसलिए मेरा भविष्य का जीवन भी जनसेवा को ही समर्पित रहेगा।
'अब मैं कोई चुनाव नहीं लडूंगा'
उन्होंने आगे बताया, 'वरुणा विधानसभा के लोग एक बार फिर मुझसे चुनाव लड़ने का आग्रह कर रहे हैं। लेकिन मैंने तय किया है कि अब मैं कोई चुनाव नहीं लड़ूंगा। पहले जब मैं चुनाव लड़ता था तो निर्वाचन क्षेत्र के लोग ही हमें पैसे देते थे और हमारी जीत तय करते थे। लेकिन आज वैसी स्थिति नहीं रही।'
मेरी सेहत अब वैसी नहीं रही: सिद्धारमैया
सिद्धारमैया ने अपने फैसले के पीछे भ्रष्टाचार के अलावा बढ़ती उम्र का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा, 'मैं अब 79 साल का हो गया हूं। हमारी सरकार का कार्यकाल अभी डेढ़ साल और बाकी है। तब तक मैं 81-82 साल का हो जाऊंगा। मेरी सेहत अब वैसी नहीं रही जैसी पहले होती थी। अब पहले जैसा जोश और उत्साह के साथ काम करना संभव नहीं है।'
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'ईमानदार राजनीति की कोई जगह नहीं'
कर्नाटक के पूर्व सीएम ने कहा कि अब ऐसा समय आ गया है कि अगर हम चुनाव लड़ते हैं तो हमें लोगों को पैसे देने होंगे। आज की राजनीति पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुकी है। ईमानदार राजनीति के लिए कोई जगह नहीं बची है। इसी माहौल को देखते हुए मैंने भविष्य में चुनाव न लड़ने का फैसला किया है।
'कभी अपनी अंतरात्मा को धोखा नहीं दिया'
उन्होंने आगे कहा कि 2028 तक मैं 82 साल का हो जाऊंगा। तब मेरे राजनीतिक जीवन के 50 साल पूरे हो जाएंगे। मैंने 1978 में तालुक बोर्ड सदस्य के तौर पर अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था। मैंने हार और जीत दोनों देखी हैं। लेकिन मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने कभी उन सिद्धांतों के खिलाफ काम नहीं किया जिनमें मेरा विश्वास था और न ही कभी अपनी अंतरात्मा के साथ धोखा किया।