एक वक्त था जब राघव चड्ढा अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद सिपाही होते थे। जब भी पार्टी पर कोई बड़ा संकट आता था तब राघव चड्ढा ढाल बनकर खड़े होते थे। अपने सौम्य अंदाज से बीजेपी के हर आरोपों का करारा जवाब देने वाले राघव चड्ढा के आम आदमी पार्टी से जाने की हर तरफ चर्चा है। पार्टी की रणनीति से चुनाव की कमान तक संभालने वाले राघव चड्ढा ने आप पर रास्ते से भटकने का आरोप लगाया और इसी को पार्टी से जुदा होने की वजह बताई। मगर अब सवाल उठ रहा है कि राघव चड्ढा का जाना आम आदमी पार्टी के लिए कितना बड़ा झटका है?
सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के आंदोलन के वक्त अरविंद केजरीवाल की राघव चड्ढा से मुलाकात हुई थी। राघव 2012 से आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़कर लौटे राघव चड्ढा को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली जनलोकपाल बिल का ड्राफ्ट तैयार करने का काम सौंपा था। उन्हें अधिवक्ता राहुल मेहरा की मदद करनी थी। यह आम आदमी पार्टी में राघव चड्ढा का पहला पॉलिटिकल असाइनमेंट था।
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धीरे-धीरे राघव चड्ढा पर भरोसा बढ़ा तो पार्टी के भीतर उनका पद और रुतबा भी बढ़ने लगा। जल्द ही अरविंद केजरीवाल ने उन्हें पार्टी प्रवक्ता की जिम्मेदारी सौंप दी। वह आप के सबसे युवा प्रवक्ता बने। 26 साल की उम्र में पार्टी का कोषाध्यक्ष बना दिया गया। 2013 में आम आदमी पार्टी का घोषणा पत्र बनाने वाली टीम में भी जगह मिली।
2020 विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल ने राघव चड्ढा को राजिंदर नगर से चुनाव मैदान में उतारा। चुनाव जीत चड्ढा न केवल विधायक बने, बल्कि उन्हें दिल्ली जल बोर्ड का उपाध्यक्ष भी नियुक्त किया गया। 2022 में अरविंद केजरीवाल ने राघव चड्ढा को पंजाब की जिम्मेदारी सौंपी। उन्हें पार्टी ने सह-प्रभारी बनाकर भेजा। राघव चड्ढा ने पंजाब चुनाव की शानदार रणनीति तैयार की। नतीजा यह हुआ कि कुल 117 विधानसभा सीटों में से 92 सीटों पर आप को जीत मिली।
पंजाब में राघव चड्ढा की रणनीति ने आप संयोजक अरविंद केजरीवाल को काफी प्रभावित किया। पंजाब के बाद उन्हें गुजरात का सह-प्रभारी बनाया गया। आम आदमी पार्टी ने पहली बार यहां 5 सीटों पर जीत हासिल की। जल्द ही पंजाब में मिली जीत और गुजरात में अच्छे प्रदर्शन का इनाम राघव चड्ढा को मिला। 2022 में ही उन्हें पंजाब से राज्यसभा भेजा गया। राघव चड्ढा महज 33 साल की उम्र में राज्यसभा पहुंचने वाले सबसे युवा सांसद बने। बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने उन्हें अपने सलाहकार पैनल का मुखिया बनाया।
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राघव चड्ढा के रुतबे का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि पंजाब में विपक्ष उन पर 'सुपर सीएम' होने का आरोप लगाता रहा है। उनके काफिले में दर्जनों गाड़ियां और पुलिस लाव लश्कर चलता था। दिल्ली से पंजाब और गुजरात तक राघव चड्ढा आप संयोजक अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार थे। मगर आम आदमी पार्टी में बतौर वालंटियर शुरू हुआ राघव चड्ढा का सियासी सफर राज्यसभा में डिप्टी लीडर के पद से हटाए जाने के बाद 24 अप्रैल 2026 को खत्म हो गया।
राघव चड्ढा का जाना आम आदमी पार्टी के लिए कोई साधारण घटना नहीं है। शुरुआत से अभी तक पार्टी की हर गतिविधि, आयोजन, रणनीति और उतार चढ़ाव की जानकारी राघव चड्ढा के पास भलीभांति है, क्योंकि आदमी जितना भरोसेमंद होता है। उसके पास संसाधनों और जानकारी तक उतनी ही अधिक पहुंच होती है। अरविंद केजरीवाल के बाद राघव चड्ढा पार्टी के इकलौते नेता थे, जिनका दिल्ली से पंजाब तक बराबर दखल था।
पार्टी के अंदरूनी मामलों की जानकारी दर्जनों नेताओं से ज्यादा राघव चड्ढा के पास होगी। एक समय ऐसा भी था जब कोई भी नेता पहले राघव चड्ढा से मिलता था और बाद में उसकी पहुंच अरविंद केजरीवाल तक होती थी। इससे साफ है कि केजरीवाल और पार्टी के तमाम नेताओं के बीच राघव चड्ढा एक अहम कड़ी थे। पार्टी के तमाम नेताओं के साथ उनके सीधे संबंध थे। उनकी इसी सियासी पकड़ की झलक शनिवार को भी दिखी। जब उन्होंने राज्यसभा में आप के 10 सांसदों में से 7 को तोड़ लिया और पार्टी को इसी भनक तक नहीं लगी। अगर भनक लगी होती तो राज्यसभा में आप राघव चड्ढा की जगह अशोक मित्तल को डिप्टी लीडर न नियुक्त करती।