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यूपी में सिखों से मेल-जोल क्यों बढ़ा रहे अखिलेश? सियासी ताकत समझिए

यूपी के कई विधानसभा सीटों पर सिख समाज निर्णायक स्थिति में है। चुनाव से पहले सरदारों की कवायद में अखिलेश यादव क्यों जुटे, समझिए।

Akhilesh Yadav

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, सिख समाज के साथ। Photo Credit: AkhileshYadav/FB

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सिख (सरदार) समुदाय चर्चा के केंद्र में है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में विभिन्न सामाजिक और व्यापारिक वर्गों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की, जिसमें सिख समाज के लोगों की मौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा है कि आखिर यूपी में सिख समुदाय की राजनीतिक ताकत कितनी है और 2027 के विधानसभा चुनाव में उसकी भूमिका कितनी अहम हो सकती है।

उत्तर प्रदेश में सिख समुदाय की आबादी अनुमानित 7 से 8 लाख के बीच मानी जाती है। संख्या के लिहाज से यह समुदाय बड़ा नहीं है, लेकिन प्रदेश के कई जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में इसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव उल्लेखनीय माना जाता है। खासकर तराई और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिख समाज खेती, व्यापार, परिवहन और उद्योग से जुड़े होने के कारण मजबूत आर्थिक और सामाजिक पहचान रखता है।

इन जिलों में सबसे अधिक प्रभाव

सिख समुदाय की अच्छी-खासी मौजूदगी लखीमपुर खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, बरेली, रामपुर, बिजनौर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, लखनऊ, कानपुर नगर और गोरखपुर जैसे जिलों में है। इनमें से कई विधानसभा सीटों पर चुनावी मुकाबला बेहद करीबी होता है, जहां कुछ हजार वोट भी परिणाम बदल सकते हैं।

 

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चुनाव में क्यों बढ़ जाती है अहमियत?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिख समाज का वोट कई क्षेत्रों में निर्णायक साबित हो सकता है। यही वजह है कि चुनाव आते ही सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस समुदाय के साथ संवाद बढ़ाने और उनका विश्वास जीतने की कोशिश करते हैं। बीजेपी, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य दल समय-समय पर सिख समाज के धार्मिक, सामाजिक और व्यापारिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी करते रहे हैं।

अखिलेश की बैठक के क्या हैं मायने?

अखिलेश यादव की हालिया बैठक को 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी विभिन्न सामाजिक और व्यापारिक वर्गों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। सिख समाज के प्रतिनिधियों की मौजूदगी को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक संदेश साफ है कि समाजवादी पार्टी किसी भी प्रभावशाली वर्ग को अपने राजनीतिक अभियान से दूर नहीं रखना चाहती।

 

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क्या किसी एक दल के साथ जाएगा सिख समाज?

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह मान लेना सही नहीं होगा कि पूरा सिख समुदाय किसी एक दल के साथ जाएगा। अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, सरकार का प्रदर्शन और क्षेत्रीय समीकरण मतदान को प्रभावित करते हैं। इसलिए चुनावी नतीजे कई कारकों पर निर्भर करेंगे।फिलहाल इतना तय है कि 2027 का चुनाव नजदीक आते ही सिख समाज समेत हर प्रभावशाली वर्ग को साधने की राजनीतिक कोशिशें तेज होंगी और उत्तर प्रदेश की चुनावी रणनीति में इस समुदाय की भूमिका पर सभी दलों की नजर बनी रहेगी।


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