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मजबूती ने तोड़ा, मजबूरी कराएगी शिवसेना के दोनों गुटों का मेल! क्या चल रहा है?

महाराष्ट्र में NCP की तरह ही शिवसेना के भी कुछ नेताओं की चाहत है कि दोनों धड़ों के कुछ नेता एक बार फिर से साथ आ जाएं और साथ मिलकर ही राजनीति करें।

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उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे, Photo Credit: ChatGPT

साल 2022 में यानी अब से ठीक 4 साल पहले शिवेसना अपने चरम पर थी। चरम पर कहने का मतलब है कि शिवसेना सत्ता में थी और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे। तब हुई बगावत ने ना सिर्फ उद्धव ठाकरे का पद छीना बल्कि पार्टी भी टूट गई। अब जैसे-जैसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है, वैसे-वैसे शिवेसना के दोनों धड़ों के नेता एकजुटता की बात करने लगे हैं। भले ही एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना सत्ता में है लेकिन शिवेसना (उद्धव बाला साहब ठाकरे) की तरह ही उसके नेता भी यह महसूस कर रहे हैं कि उसे कमजोर किया जा रहा है।

 

हाल ही में शिवसेना नेता अब्दुल सत्तार ने खुलकर कहा है कि बीजेपी के नेता उनकी पार्टी को कमजोर कर रहे हैं। यही वजह है कि अब्दुल सत्तार के बेटे समीर सत्तार महायुति गठबंधन में होने के बावजूद बीजेपी उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव में उतर गए हैं। उधर कई नेता खुलेआम यह भी कह रहे हैं कि दोनों धड़ों को साथ आ जाना चाहिए। भले ही यह बात दूर की कौड़ी लगती हो लेकिन अगर ऐसा होता है तो महाराष्ट्र की राजनीति में यह देखा जा एगा कि जो शिवसेना कभी मजबूती के दौर में टूट गई थी, अब वह 'मजबूरी' के दिनों में एकजुट हो सकती है।

 

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कहां से शुरू हुई सुगबुगाहट?

दोनों धड़ों के बिखराव को अब 4 साल पूरे होने वाले हैं। इन चार साल में उद्धव ठाकरे को जबरदस्त नुकसान हुआ है। विधानसभा में उनके विधायकों की संख्या घटी है, वह बीएमसी गंवा चुके हैं और उनकी पार्टी का असली निशान पर एकनाथ शिंदे के पास चला गया है। दूसरी तरफ, एकनाथ शिंदे को पहले तो मुख्यमंत्री पद मिला लेकिन बाद में उन्हें डिप्टी सीएम पद से संतोष करना पड़ा। इतना ही नहीं, 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की स्थिति बदल गई है और अब शिवसेना पर बीजेपी का दबाव है। 


अब दोनों धड़ों के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि उनके लिए चुनौती शिवसेना का दूसरा धड़ा नहीं बीजेपी है।  अब सार्वजनिक तौर पर भी मांग उठने लगी है कि दोनों धड़ों को साथ आना चाहिए। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, इन नेताओं का मानना है कि अगर दोनों साथ नहीं आते हैं तो अस्तित्व बचाना भी मुश्किल हो सकता है।

कौन कर रहा है साथ आने की वकालत?

 

बीजेपी के खिलाफ अपने बेटे को उतारने वाले शिवसेना नेता अब्दुल सत्तार के अलावा शिवसेना (UBT) के नेता अंबादास दानवे भी एकजुटता की अपील कर चुके हैं। अंबादास दानवे ने कहा था, 'मैं कई बार इसकी जरूरत महसूस करता हूं लेकिन सिर्फ मेरे चाहने से कुछ नहीं हो सकता है।' वहीं, इसी तरह का बयान देते हुए अब्दुल सत्तार ने कहा है, 'यही सही समय है कि दोनों एक हो जाएं।'

 

रोचक बात है कि दोनों धड़ों के वरिष्ठ नेता ना सिर्फ एकसाथ आने की बात कर रहे हैं बल्कि दोनों ही नेता ह भी कह रहे हैं कि उन्हें अब बीजेपी से ही खतरा है। अंबादास दानवे ने कहा है, 'बड़ी मछली छोटी मछलियों को खा जाती है। बीजेपी ठीक वही काम एनसीपी और शिवसेना के साथ कर रही है।' उन्होंने यह भी कहा है कि बीजेपी शिवेसना को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ही नहीं बल्कि दुश्मन मानती है। उन्होंने आगे कहा, 'बीजेपी का लक्ष्य शिवसेना को खत्म करने का है। मूल शिवसेना को तोड़कर अलग हुए लोग भी अब इसे महसूस कर रहे हैं। बीजेपी एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना को कमजोर करने में लगी हुई है।'

 

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अब्दुल सत्तार ने क्या-क्या कहा?

सत्ता में मौजूद शिवसेना के नेता अब्दुल सत्तार तो अब खुलेआम बगावत पर उतर आए हैं। बीजेपी का नाम लिए बिना ही उन्होंने कहा कि अगर हमारा बड़ा भाई ही हमें खत्म कर रहा है तो साथ आने का कोई मतलब नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर एकनाथ शिंदे चाह लें तो बहुत जल्द ही दोनों साथ आ सकते हैं और इसमें कोई देरी भी नहीं होगी।

 

बता दें कि इस पूरी कवायद के पीछे बीजेपी के कुछ प्रयास और कमजोर होती शिवसेना है। 2024 में सत्ता में आने के बाद से ही बीजेपी लगातार कोशिश कर रही है कि वह उन इलाकों में खुद को मजबूत करे जो पारंपरिक रूप से एनसीपी या शिवसेना के गढ़ रहे हैं। इसी कोशिश में वह औरंगाबाद जैसे इलाकों में भी अपने उम्मीदवार उतार रही है जबकि एक समय पर वह शिवसेना का गढ़ हुआ करता था। शिवसेना के कई नेताओं को डर सता रहा है कि अगर ऐसे ही बीजेपी अपना विस्तार करती रही तो आगामी चुनावों में उनकी सीट मांगने की क्षमता कम हो जाएगी और वे अपना अस्तित्व खो देंगे।

 

हालांकि, एक बात यह भी है कि दोनों धड़ों के बीच कड़वाहट काफी बढ़ चुकी है। एक समय पर उद्धव ठाकरे के बेहद करीबी लोगों में रहे एकनाथ शिंदे की बगावत के चलते ही आज शिवसेना का यह हश्र हुआ है। यह कड़वाहट इतनी है कि दोनों ना तो कभी एक-दूसरे से मिलते हैं और ना ही बात करते दिखते हैं। सार्वजनिक मंचों पर भी दोनों एक-दूसरे से बचते ही दिखाई देते हैं।


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