नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने छोड़ी कांग्रेस, यूपी में कितनी बड़ी ताकत रहे हैं?
नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बड़ी तादात में अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। हालांकि, उन्होंने यह कदम क्यों उठाया फिलहाल इसका खुलासा नहीं किया है।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी। Photo Credit- Social Media
उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख खिलाड़ी और मायावती सरकार में एक साथ 18 मंत्रालयों का जिम्मा संभालने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने साथियों के साथ शनिवार को कांग्रेस छोड़ दी। 10 मई 2017 को बहुतन समाज पार्टी की सुप्रीमों मायावती ने उनको पार्टी से निकाल दिया था, जिसके बाद वह फरवरी 2018 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। तब से वह कांग्रेस में थे और पार्टी में रहते हुए उन्होंने 2019 लोकसभा, 2022 यूपी विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए काम किया। मगर, आठ साल कांग्रेस में रहने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया।
उनके इस्तीफा देने की जैसे ही खबर मिली यूपी कांग्रेस के प्रभारी अविनाश पांडे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय उनकों मनाने पहुंचे, लेकिन बात नहीं बन सकी। उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में सियासी जमीन तलाश रही कांग्रेस को यह बड़ा झटका है। क्योंकि सिद्दीकी राज्य के बड़े मुस्लिम नेताओं में शुमार किए जाते हैं। उन्होंने हमेशा से संगठन में काम किया है। ऐसे में आइए जानते हैं कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी उत्तर प्रदेश में कितनी बड़ी ताकत हैं?
अविनाश पांडे और अजय राय मनाने पहुंचे
कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद जब अविनाश पांडे और अजय राय के पूर्व विधायक नसीमुद्दीन सिद्दीकी से मिलने पहुंचे तो इसके बाद उन्होंने मीडिया से कहा, 'कोई मीटिंग नहीं हुई। यह एक शिष्टाचार मुलाकात थी। मुलाकात हुई और वह लोग चले गए। मैं जमीन से जुड़ा आदमी हूं। जिसे पद चाहिए वह पद ले ले, लेकिन मुझे कोई पद नहीं चाहिए। मैं एक कार्यकर्ता हूं, और कार्यकर्ता ही सब कुछ है। पिछले आठ सालों में मुझे लगा कि मेरा ज़मीनी स्तर पर काम करने के तरीके का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं हो रहा था।
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इस्तीफे के बाद क्या कहा?
उन्होंने कहा, 'मेरे इस्तीफे से कोई क्यों हैरान होगा? कांग्रेस में मैं अकेला नहीं हूं जो पार्टी छोड़ रहा हैं। आज, बीजेपी में सेंट्रल और स्टेट लेवल पर, ऐसे मिनिस्टर हैं जो कभी राहुल गांधी के करीबी दोस्त माने जाते थे। उनमें से कुछ तो भ्रष्टाचार के लिए जेल भी गए। उनमें से आज वे नेता बीजेपी में मंत्री और मुख्यमंत्री मिनिस्टर हैं। तो, अगर उनके जाने से कोई फर्क नहीं पड़ा, तो मेरे जाने से क्या फर्क पड़ेगा?' हालांकि, उन्होंने किसी अन्य दूसरी पार्टी में शामिल होने से फिलहाल इनकार करते हुए कहा, 'किसी दल में शामिल होना है या अपनी पार्टी बनानी है... इसपर फैसला अपने करीबी नेताओं से बैठक करके तय करेंगे।'
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नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस में पश्चिमी क्षेत्र के प्रांतीय अध्यक्ष पद पर काम कर रहे थे। हालांकि, उनके पार्टी छोड़ने की वजह फिलहाल साफ नहीं है। उन्होंने इतना जरूर कहा, 'मैं न कभी नाराज था और न मैंने कभी कहा। मुझे सम्मान नहीं काम चाहिए।' उनके इस बयान से साफ है कि वह काफी समय से कांग्रेस में हाशिए पर चल रहे थे। कभी बसपा में नंबर दो की हैसियत रखने वाला नेता कांग्रेस में आने के बाद साथ छोड़ गए।
एक चर्चा आम है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी पार्टी में अहमियत ना मिलने की वजह से नाराज चल रहे थे। बीते दिनों जब राहुल गांधी रायबरेली आए थे तो लखनऊ एयरपोर्ट पर कई बड़े नेता मौजूद थे, इस समय नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी एयरपोर्ट पर मौजूद थे, लेकिन राहुल गांधी का स्वागत करने के लिए चुनिंदा नेताओं को ही अनुमति मिली थी। सिद्दीकी राहुल गांधई से नहीं मिल पाए।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी की ताकत
नसीमुद्दीन सिद्दीकी उत्तर प्रदेश की अलग-अलग सरकारों में 4 बार मंत्री रहे हैं। वह सबसे पहली बार 1997 में 6 महीने के लिए मायावती सरकार में यूपी के कृषि मंत्री बनाए गए थे। इसके बाद वह कल्याण सिंह सरकार में मंत्री बने। 2002 से 2003 वाली मायावती सरकार में एक बार फिर से नसीमुद्दीन सिद्दीकी तीन मंत्रालयों के मंत्री बनाए गए। इसके बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी का गोल्डन समय आया, जब बीएसपी सुप्रीमों और तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उन्हें खुद से भी ज्यादा मंत्रालयों के विभाग सौंप दिए। रिकॉर्ड 18 मंत्रालय दे दिए। यह भारत के इतिहास में नहीं हुआ था। उस समय नसीमुद्दीन की ऐसी पावर थी कि वह बसपा और सरकार दोनों में नंबर दो की हैसियत रखते थे। उन्हें सुपर सीएम बोला जाता था।
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1991 से लेकर 2017 तक लगातार विधायक
नसीमुद्दीन सिद्दीकी 1991 से लेकर 2017 तक लगातार विधायक रहे। सिद्दीकी ने शुरू से ही पूर्व सीएम मायावती के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। साल 1984 में वह बहुजन समाज पार्टी में शामिल हुए थे। वह 2017 तक बीएसपी में रहे। उन्होंने यूपी के हर कोने और इलाके में काम करने का अनुभव है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी मुस्लिम बैकग्राउंड से जरूर आते हैं, मगर उन्हें दलित, महादलिल, पिछड़ों, सवर्ण गरीबों और मुस्लिमों के बीच रहकर काम करने का अनुभव है।
मगर, 2017 के विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद मायावती ने सिद्दीकी को बसपा से निकाल दिया। यूपी की सियासत के मंझे हुए इस नेता ने 22 फरवरी को नई दिल्ली में कांग्रेस ऑफिस में अपने 35,000 से ज्यादा समर्थकों और उत्तर प्रदेश के कई पूर्व सांसदों और विधायकों के कांग्रेस में शामिल हो गए। ऐसे में 22 फरवरी को नई दिल्ली में कांग्रेस ऑफिस में अपने 35,000 से ज्यादा समर्थकों और उत्तर प्रदेश के कई पूर्व सांसदों और विधायकों के कांग्रेस में शामिल हो गए। ऐसे में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का पार्टी छोड़ना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा सकता है।
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