बहुजन समाज पार्टी (BSP) इन दिनों उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी करने को लेकर नहीं बल्कि आपसी लड़ाई की वजह से चर्चा का विषय बनी हुई है। इसके अलावा बीएसपी जमीन, मीडिया और सोशल मीडिया पर अपनी निष्क्रियता को लेकर भी चर्चा में है। सियासी गलियारों में चर्चाएं हो रही हैं कि पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गिरता जा रहा है, बावजूद इसके बीएसपी किसी भी राज्य में सक्रिय नहीं है। यह सक्रियता उत्तर प्रदेश में खासतौर से नहीं है, जहां पार्टी सबसे अधिक मजबूत है।
साल 2007 में 206 सीट पाकर 2012 तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने वाली बीएसपी। 2012 का विधानसभा चुनाव हार गई और 206 से गिरकर 80 सीटों पर आ गई। मगर, पार्टी का वोट शेयर 26 प्रतिशते के साथ बरकरार रहा। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी की सीटें गिरकर 19 पर आ गईं और उसका वोट शेयर 22.23 फीसदी पर आ गया। पिछले चुनाव 2022 में बीएसपी का और भी बुरा हाल हो गया और चुनाव में उसे महज एक सीट मिली। इस चुनाव में पार्टी का वोट शेयर गिरकर 12.88 फीसदी पर आ गया।
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कार्यकर्ताओं का मनोबल नीचे गिर रहा
अब 2027 के विधानसभा चुनाव सर पर हैं लेकिन बीएसपी चीफ मायावती और उनके बड़े नेता ना तो जमीन पर कार्यकर्ताओं में जोश भरते और ना ही पार्टी की नीतियां जनता को बताते हुए दिखाई देते हैं। ऐसे में बीएसपी कार्यकर्ताओं का मनोबल लगातार नीचे गिर रहा है। इन सभी हारों के बीच बीएसपी अभी भी अपने उसी पुराने ढर्रे पर जनता से संवाद कर रहा है। मायावती का मीडिया के सामने आना और अपनी बात रखना और साथ ही डोर टू जोर प्रचार करना।
तकनीक में पीछे है बीएसपी
मगर, बीते सालों में जैसे-जैसे तकनीक बदली देशभर की पार्टियों ने उस तकनीक का सहारा लिया और उससे जनता के बीच अपनी बात पहुंचाई। राष्ट्रीय से लेकर राज्य स्तरीय दलों ने तकनीकी रूप से अपने को ढालते हुए अपनी सोच, जनता से वादा, पुराने काम और अपने नेता का प्रभाव मीडिया-सोशल मीडिया पर दिखा रहे हैं। इसी सोशल मीडिया पर पार्टियां खुद अपने हैंडल से लिखकर, दूसरों से लिखवा-बुलवाकर जनता के बीच अपना नैरेटिव सेट कर रही हैं।
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इंस्टाग्राम, फेसबुक पर पार्टी गैरमौजूद
इन सबके बीच बीएसपी की मौजूदगी एक्स, इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब पर ना के बराबर है। जबकि बीजेपी, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की मौजूदगी इन प्लेटफॉर्म पर जबरदस्त तरीके से है। इन्हीं प्लेटफॉर्म के लिए इन पार्टियों ने अपने लोग काम पर रखे हुए हैं। इसके अलावा विचारधारा के लोग इनके लिए लिख-बोलकर नैरेटिव बना रहे हैं।
बीएसपी का नैरेटिव जनता तक कैसे पहुंचे?
बीएसपी के इन प्लेटफॉर्म पर गैरमौजूदगी से झटका लग रहा है। नए वोटरों तक पार्टी और पार्टी प्रमुख की बातें नहीं पहुंच पा रही हैं। यह कहीं ना कहीं पार्टी को नुकसान पहुंचा रहा है। जबकि पार्टी नेता आकाश आनंद पार्टी की इस कार्यशैली में बदलाव को लेकर बयान दे चुके हैं। पिछले दिनों उन्होंने पार्टी के पुराने नेताओं को लेकर कहा था, 'ये लोग वाद संवाद के आधुनिक माध्यमों का इस्तेमाल नहीं करने दे रहे हैं, मीडिया सोशल मीडिया की महत्ता को समझ ही नहीं रहे हैं।'
कुल मिलाकर अगर बीएसपी को नए वोटरों और खिसके हुए वोट बैंक को पाना है तो उसे सबसे पहले सोशल मीडिया के इन प्लेटफॉर्म पर अपनी मौजूदगी दर्द करवानी होगी। यहीं से पार्टी को अपना नैरेटिव फिर से बनाने का मौका मिल सकता है।