उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के बीच समन्वय बढ़ने के साथ टिकट को लेकर जमीनी फीडबैक भी अहम होता जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों को लेकर मिले फीडबैक और टिकट दोहराने के फैसले की चर्चा के बाद इस बार संघ की रिपोर्ट को खास महत्व दिए जाने की बात सामने आ रही है। पार्टी स्तर पर विधानसभा क्षेत्रों में विधायकों और संभावित दावेदारों के बारे में फीडबैक जुटाया जा रहा है। माना जा रहा है कि जिस सीट पर रिपोर्ट लगातार खराब रही, वहां मौजूदा चेहरे या दावेदार को टिकट की दौड़ से बाहर किया जा सकता है।
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने बड़ी संख्या में अपने मौजूदा सांसदों को दोबारा मैदान में उतारा था। मार्च 2024 की पहली सूची में ही जीती हुई 44 सीटों पर मौजूदा सांसदों को फिर टिकट दिया गया था। बीजेपी ने इसे सांसदों के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी न होने के संकेत के तौर पर पेश किया था लेकिन चुनाव परिणाम ने इस रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए। 2019 में यूपी की 80 लोकसभा सीटों में बीजेपी ने 62 सीटें जीती थीं, जबकि 2024 में उसकी सीटें घटकर 33 रह गईं। चुनाव के बाद बीजेपी की समीक्षा बैठकों में प्रत्याशी दोहराने को भी हार के कारणों में गिनाया गया। पार्टी पदाधिकारियों ने संगठन के शीर्ष नेतृत्व के सामने कहा था कि कई क्षेत्रों में प्रत्याशियों को लेकर जनता और कार्यकर्ताओं में नाराजगी थी और प्रत्याशी रिपीट करने से नुकसान हुआ।
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संघ ने कई चेहरों पर जताई थी असहमति
2024 के चुनाव के बाद संघ से जुड़े सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि कौशांबी, सीतापुर, रायबरेली, कानपुर, बस्ती, अंबेडकरनगर, जौनपुर और प्रतापगढ़ समेत करीब 25 सीटों पर संघ उम्मीदवारों से असहमत था। प्रत्याशियों के चयन और चुनावी रणनीति में संघ से अपेक्षित संवाद नहीं हुआ। चुनाव के बाद बीजेपी की अपनी समीक्षा में भी टिकट दोहराए जाने और प्रत्याशियों की एंटी-इनकंबेंसी जैसे मुद्दे सामने आए। हारी हुई सीटों पर भेजी गई प्राथमिक रिपोर्टों में स्थानीय संगठन, प्रत्याशी और भितरघात से जुड़े कारणों की पड़ताल की गई थी।
2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए इस बार तस्वीर अलग दिखाई दे रही है। बीजेपी प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में जमीनी फीडबैक जुटा रही है। मौजूदा विधायकों के कामकाज, क्षेत्र में उनकी स्वीकार्यता, स्थानीय संगठन से तालमेल और सत्ता विरोधी माहौल जैसे पहलुओं को टिकट के फैसले से जोड़कर देखा जा रहा है। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक, पार्टी के सर्वे में जीतने की क्षमता को प्रमुख आधार बनाया जा रहा है और खराब फीडबैक वाले मौजूदा विधायकों का टिकट काटे जाने की संभावना पर भी मंथन है।
संघ-बीजेपी समन्वय बैठकों में भी विधायकों, मंत्रियों और सांसदों को लेकर मिले नकारात्मक फीडबैक पर चर्चा होने की बात सामने आई है। सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में बीजेपी और संघ के बीच मिशन-2027 को लेकर बैठकों का दौर चल रहा है और कई क्षेत्रों की सर्वे रिपोर्ट पार्टी के लिए चिंता का कारण बताई गई है।
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संगठन और संघ का फीडबैक होगा अहम
बीजेपी के लिए अब चुनौती केवल मौजूदा विधायक का टिकट बनाए रखने की नहीं, बल्कि हर सीट पर ऐसा चेहरा चुनने की है जिसे स्थानीय संगठन और जमीनी कार्यकर्ता स्वीकार करते हों। 2024 में कई सीटों पर टिकट दोहराने के बाद सामने आए परिणाम ने इस बहस को और मजबूत किया है कि केवल मौजूदा सांसद या विधायक होना टिकट की गारंटी नहीं हो सकता। ऐसे में 2027 के लिए टिकट वितरण से पहले पार्टी के आंतरिक सर्वे, स्थानीय संगठन की राय और संघ से मिलने वाले जमीनी फीडबैक को एक साथ देखा जा सकता है। रिपोर्ट खराब होने पर दावेदारी कमजोर पड़ना और मौजूदा चेहरे के टिकट पर भी पुनर्विचार होना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।