AAP, BJP, कांग्रेस नहीं, शिरोमणि अकाली दल को इन ताकतों से है असली खतरा
पंजाब की राजनीति में अहम खिलाड़ी रहा शिरोमणि अकाली दल अब अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। पार्टी के सामने अब कांग्रेस, AAP और बीजेपी जैसी बड़ी ताकतों के साथ-साथ कई उभरती हुई ताकतें भी हैं।

पंजाब के नेता, Photo Credit: ChatGPT
पंजाब की राजनीति में लंबे समय तक सबसे मजबूत क्षेत्रीय दल माने जाने वाले शिरोमणि अकाली दल अब अपने सफर की सबसे अहम लड़ाई लड़ रहा है। पिछले कई दशकों तक पंजाब की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले प्रकाश सिंह बादल की मौत के बाग अब पार्टी पहला विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। 2017 में सत्ता से बाहर होने के बाद पार्टी को लगातार झटकों का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के अंदर भी टूट हुई है लेकिन अब पार्टी खुद को संभालकर अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है।
पार्टी के प्रधान सुखबीर सिंह बादल लगातार पंजाब में रैलियां कर रहे हैं और अपने पुराने पंथक-ग्रामीण वोटबैंक को अपनी और करने की कोशिश कर रहे हैं। मौजूदा समय में अकाली दल अपने पुराने वोटबैंक को भी साथ जोड़ लेता है तो पार्टी एक मजबूत जनाधार बना लेगी। पार्टी इसी वोटबैंक के जरिए 2007 से 2017 तक सत्ता में रही है। हालांकि, पिछले 5 साल में शिरोमणि अकाली दल के कमजोर होने के बाद पंजाब की राजनीति में बहुत कुछ बदल चुका है। आज के समय अकाली दल को चुनौती देने के लिए कई पंथक ताकतें उभर चुकी हैं।
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कौन है मुख्य चुनौती?
मौजूदा राजनीतिक परिस्थित में अकाली दल के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी पार्टी, बीजेपी या कांग्रेस से नहीं बल्कि छोटे और उभरते सिख तथा पंथक संगठनों को ही माना जा रहा है। पिछले कुछ सालों में अकाली दल का पारंपरिक वोट बैंक लगातार खिसकता दिख रहा है और इसका फायदा कई छोटे दलों और कट्टर पंथक समूहों को मिल रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इसकी एक झलक देखने को भी मिली थी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अकाली दल की सबसे बड़ी चिंता अब गांवों और धार्मिक प्रभाव वाले इलाकों में तेजी से बढ़ रही नई पंथक राजनीति है। खासकर अमृतपाल सिंह से जुड़े वारिस पंजाब दे, सिमरनजीत सिंह मान की शिरोमणि अकाली दल अमृतसर और कुछ किसान संगठनों से जुड़े राजनीतिक समूह अकाली दल के पुराने वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं।
पंथक वोट खिसका
दरअसल पंजाब में अकाली दल की पहचान लंबे समय तक सिख राजनीति और पंथक मुद्दों की सबसे बड़ी आवाज के रूप में रही। पिछले एक दशक में अकाली दल की पंथक छवि को बहुत नुकसान पहुंचा है। बेअदबी मामलों, किसान आंदोलन के दौरान बदली राजनीतिक धारणा और बीजेपी के साथ लंबे गठबंधन के कारण पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचा है। पिछले एक दशक में लगातार पार्टी में आंतरिक गुटबाजी भारी रही है जिससे पार्टी में टूट भी हुई है। प्रकाश सिंह बादल के बाद पार्टी किसी अन्य नेता को स्थापित नहीं कर पाई और उनकी मौत के बाद से दल में लंबे समय तक नेतृत्व संकट रहा। इसके बाद ग्रामीण सिख वोटर का एक हिस्सा धीरे-धीरे दूसरे पंथक विकल्पों की तरफ जाने लगा।
2024 लोकसभा चुनाव में उभरे नए विकल्प
2024 लोकसभा चुनाव के बाद यह चर्चा और तेज हो गई कि पंजाब में पारंपरिक राजनीति के साथ-साथ धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों की राजनीति भी मजबूत हो रही है। खडूर साहिब सीट से अमृतपाल सिंह की जीत ने कई राजनीतिक दलों को चौंकाया था। अमृतपाल सिंह जेल में बंद रहकर भी चुनाव जीत हई थे और वह खुले तौर पर खालिस्तान का समर्थन करते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इसका सबसे ज्यादा असर अकाली दल पर पड़ा क्योंकि यह वही वोट बैंक था जिसे कभी अकाली दल का कोर समर्थन माना जाता था।
2024 लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब सीट से अमृतपाल सिंह ने बतौर निर्दलीय उम्मीदवार 4 लाख 4 हजार 430 वोट हासिल किए थे। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार कुलबीर सिंह जीरा को 1 लाख 97 हजार 120 वोटों के बड़े अंतर से हराया था। इस सीट पर पंथक लहर के बावजूद अकाली दल चौथे नंबर पर रहा था। अकाली दल को बीजेपी से कुछ ही वोट ज्यादा मिले।
वहीं फरीदकोट सीट से भाई सरबजीत सिंह खालसा ने 2 लाख 98 हजार 62 वोट हासिल किए थे। उन्होंने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार करमजीत सिंह अनमोल को 70 हजार 53 वोटों से हराया था। सरबजीत सिंह खालसा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे थे। इस सीट पर भी अकाली दल चौथे नंबर पर रहा।
साथ आए अमृतपाल और सरबजीत सिंह खालसा
लोकसभा चुनाव में पंजाब में एक नई पंथक राजनीति का उभार देखने को मिला और इसके बाद पंजाब की सियासत में बड़ा मोड़ आया। 14 जनवरी 2025 को माघी मेला के दिन अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह दोनों सांसदों और अन्य पंथक ताकतों ने मिलकर शिरोमणि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) बनाया। यह पार्टी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी और इसका सीधा नुकसान अकाली दल को होगा क्योंकि कट्टर पंथक वोट इस दल को मिलने का अनुमान है। पार्टी ने सांसद अमृतपाल को 2027 विधानसभा चुनाव के लिए अपना सीएम उम्मीदवार घोषित कर दिया है।
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यह भी हैं चुनौती
इसी तरह सिमरनजीत सिंह मान भी लगातार खुद को पंथक राजनीति के मजबूत चेहरे के रूप में पेश कर रहे हैं। मालवा और कुछ ग्रामीण इलाकों में उनका प्रभाव पहले की तुलना में बढ़ता दिख रहा है। हालांकि, उनकी पार्टी राज्य स्तर पर बड़ी ताकत नहीं बन सकी है लेकिन अकाली दल के लिए यह चुनौती जरूर बन रही है। इसके अलावा शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) भी पार्टी के लिए चुनौती बना हुआ है। यह दल अमृतपाल सिंह के साथ समझौता कर सकता है। ऐसे में अकाली दल की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ जाएंगी।
करो या मरो की स्थिति
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अकाली दल की समस्या सिर्फ चुनाव हारने तक सीमित नहीं है बल्कि उसकी राजनीतिक पहचान पर भी सवाल उठ रहे हैं। अगले साल होने वाले चुनाव पार्टी के लिए करो या मरो जैसी स्थिति पैदा कर रहे हैं। अगर पार्टी चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई तो उनकी जगह लेने के लिए कई अन्य दल हैं जिनका वोटबैंक और अकाली दल का वोटबैंक एक ही है। अकाली दल अब अपने पुराने रूप में वापसी करने की कोशिश कर रहा है और मुद्दों को जनता के बीच रखने की कोशिश कर रहा है। आगामी चुनाव पार्टी का भविष्य तय करेंगे।
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