केंद्रीय चुनाव आयोग ने 37 राज्यसभा सीटों पर चुनावों की घोषणा की है। इन 37 सीटों में दो सीटें तेलंगाना की और 5 सीटें बिहार की भी शामिल हैं। इन दोनों राज्यों में पक्ष और विपक्ष दोनों रणनीति बनाने में जुट गए हैं। बिहार में 4 सीटों पर एनडीए की जीत तय मानी जा रही है और पांचवी सीट के लिए विपक्ष उम्मीदवार उतारेगा। वहीं, तेलंगाना में एक सीट पर कांग्रेस पार्टी की जीत तय मानी जा रही है लेकिन दूसरी सीट के लिए पार्टी के पास जरूरी विधायकों का समर्थन नहीं है। इन दोनों राज्यों में हैदराबाद से सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन औवैसी की भूमिका अहम मानी जा रही है।
बिहार में बीते साल हुए विधानसभा चुनाव में औवैसी की पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 5 सीटों पर जीत दर्ज की थी। महागठबंधन को चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा था। विपक्ष का हाल बिहार में अब ऐसा है कि एक राज्यसभा सीट पर चुनाव जीतने के लिए महागठबंधन के सभी दलों को मिलाकर भी जरूरी नंबर नहीं बन रहे। तेलंगाना में कांग्रेस के पास दूसरी सीट के लिए जरूरी वोट नहीं हैं।
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बीआरएस ने बढ़ाई चिंता
तेलंगाना में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति मजबूत नहीं है। ऐसे में मुख्य मुकाबल कांग्रेस और बीआरएस के बीच दिख रहा है। भारत राष्ट्र समिति के नेता के. चंद्रशेखर राव ने एक उम्मीदवार खड़ा करने का फैसला लिया है। इससे पहले दोनों सीटों पर कांग्रेस के लिए जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी लेकिन अब कांग्रेस की परेशानी बढ़ गई है। अब कांग्रेस के पास विधायकों की संख्या पर्याप्त नहीं है।
तेलंगाना में नंबर गेम समझिए
तेलंगाना में एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 41 विधायकों के समर्थन की जरूरत है। आधिकारिक तौर पर बीआरएस के पास 37 विधायक हैं लेकिन पार्टी के 10 विधायक पहले ही कांग्रेस के खेमे में जा चुके हैं, जिनको लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। अगर बीआरएस के दावे के अनुसार, सभी 37 विधआयक पार्टी के साथ रहते हैं तो पार्टी को सिर्फ 4 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। कांग्रेस पार्टी के पास 66 विधायक हैं। इसके अलावा सीपीआई के भी एक विधायक का कांग्रेस को समर्थन है। बीजेपी के पास 8 विधायक और औवैसी की पार्टी के पास 7 विधायक हैं।
बिहार में भी होगा खेल?
बिहार में एनडीए के पास कुल 202 विधायक हैं। इतने विधायकों के दम पर एनडीए चार सीटों पर जीत दर्ज कर सकता है लेकिन पांचवी सीट के लिए विधायक कम पड़ जाएंगे। महागठबंधन के सभी दलों को मिलाकर कुल 35 विधायक हैं। पार्टी को एक सीट जीतने के लिए भी अन्य दलों के साथ की जरूरत होगी ऐसे में औवैसी की पार्टी के पांच विधायकों पर पार्टी की नजर है। बहुजन समाज पार्टी के पास भी एक विधायक है, जो अभी तक दोनों गठबंधनों से बाहर है।
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औवैसी बने किंग मेकर?
बिहार और तेलंगाना में अब सबकी नजर औवैसी पर है। औवैसी की पार्टी के विधायक दोनों राज्यों में खेल कर सकते हैं। बिहार में अगर औवैसी की पार्टी महागठबंधन के उम्मीदवार का साथ देती है तो विपक्ष एनडीए का मुकाबला करने की स्थिति में आ सकता है। एनडीए को सीट जीतने के लिए तीन तो महागठबंधन को 6 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी। ऐसे में औवैसी की पार्टी किंग मेकर की भूमिका में है। आरजेडी की ओर से दिवंगत मोहम्मद शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब पार्टी की उम्मीदवार हो सकती है। हिना के साथ औवैसी के रिश्ते मजबूत हैं। ऐसी स्थिति में आरजेडी को औवैसी की पार्टी के समर्थन की उम्मीद है।

तेलंगाना में बीआरएस के चुनावी मैदान में कूदने से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ती हुई नजर आ रही हैं। कांग्रेस को अब औवैसी के साथ की जरूरत पड़ सकती है। केसीआर की पार्टी के पास भी जरूरी विधायक नहीं है। बीआरएस के साथ बीजेपी और औवैसी की पार्टी दोनों नहीं जाएंगी क्योंकि इससे कांग्रेस उनके खिलाफ नैरेटिव बना सकती है। ऐसे में औवैसी की पार्टी का कांग्रेस की और झुकाव हो सकता है। औवैसी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के बीच दोस्ताना रिश्ते हैं और हाल ही में हुए उपचुनाव में एआईएमआईएम ने कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन किया था। ऐसे में अब सबकी निगाहें औवैसी पर हैं।