उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की नजर, ब्राह्मणों के बाद अब दलित वोट बैंक पर हैं। राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने 'ब्राह्मण भला न वेश्या', वाले बयान के बाद पार्टी की मुश्किलें बढाईं थीं, पार्टी के अपने ब्राह्मण नेता ही नाराज हो गए थे। अखिलेश यादव ने भी चुप्पी साधी थी। अब विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी की नजर, बहुजन समाज पार्टी (BSP) के कोर वोट बैंक पर है। ब्राहमण संगठनों के साथ बीएसपी और भारतीय जनता पार्टी ने भी इस बयान का विरोध किया। राजकुमार भाटी ने बाद में माफी मांग ली, लेकिन ब्राह्मणों के प्रति उनका रुख अभी भी नहीं बदला। माहौल बिगड़ता देख समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों ने बैठक की और फैसला लिया कि फिलहाल ब्राह्मण कार्ड को छोड़ दिया जाए।
अब पार्टी दलितों को साधने की तैयारी में जुट गई है। रविवार को अखिलेश यादव ने पार्टी की बैठक की। पिछड़ा, दलित और अल्पसख्यक (PDA) वोटबैंक को मजबूत करने के आदेश दिए। अब समाजवादी पार्टी के सपा के दलित सांसद, विधायक, पूर्व जनप्रतिनिधि और संगठन के कार्यकर्ता अब दलित बहुल इलाकों में जाएंगे। समाजवादी नेता, अब चौपाल लगाकर दलित समाज से आने वाले लोगों से बात करेंगे। वे दलितों को पीडीए का मतलब समझाएंगे और समानता का संदेश देंगे। पार्टी दलितों को यह भरोसा दिलाएगी कि समाजवादी पार्टी उनकी हितैषी है, पार्टी में उनका सम्मान कम नहीं होगा और उन्हें अच्छा प्रतिनिधित्व भी मिलेगा।
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दलित बाहुल जिले कौन से हैं?
जनपद सीतापुर, कौशांभी में सर्वाधिक अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं। जनपद प्रयागराज, हरदोई, सोनभद्र,लखीमपुर खीरी,बलिया, कुशीनगर,श्रावस्ती, आगरा, आजमगढ़, बहराइच, बाराबंकी, गजियाबाद,शाहजहांपुर, सहारनपुर में भी अनुसूचित जाति की अधिक आबादी है। बागपत में सबसे कम अनुसूचित जाति के लोग रहते है। जनपद शामली में एक सीट भी सुरक्षित नहीं है।
प्रदेश की 84 विधानसभा सीटेंं हैं आरक्षित
यूपी में 22 फीसदी अनुसूचित जाति की आबादी है। अनुसूचित जनजाति की 0.6 प्रतिशत आबादी है। प्रदेश की 403 विधानसभाओं में 84 सीटे अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है। प्रदेश की सभी विभानसभाओं में दस से बीस हजार दलित मतदाता हैं। बहुजन समाज पार्टी, यूपी में दलित राजनीति करती है लेकिन अब समीकरण बदल रहे हैं। कठेरिया और वाल्मीकि समुदाय के मतदताओं ने बहुजन समाज पार्टी से दूरी बना ली थी।
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2024 लोक सभा में दलितों की भागीदारी से जीती थी 37 सीटें
2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने गठबंधन किया था और चुनाव लड़ा था। राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने प्रचार के दौरान बीजेपी पर संविधान बदलने का आरोप लगाया था। दलित समुदाय के मतदाता भी भ्रमित हो गए। आधे से अधिक मतदाताओं ने संविधान बदलने की बात को सही मानकर समाजवादी पार्टी के पक्ष में मतदान किया था। दलित वर्ग का समर्थन मिलने से बीजेपी को पटकनी देकर प्रदेश में 80 में 37 सीटें हासिल कर ली थीं। अब अखिलेश, एक बार फिर इसी आधार को मजबूत करने की कवायद कर रहे हैं।